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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री वैष्णो देवी आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता। त्रिकूट पर्वत वासिनि, तू जग की दाता॥

2

महाकाली महालक्ष्मी, महासरस्वती रूपा। तीन पिण्डियों में विराजे, ज्योति-स्वरूपा॥

3

भैरव संग विराजे, गुफा अति पावन। शेर सवारी करती, हरती भक्तन के अघन॥

4

जो जन शरण में आता, खाली नहीं जाता। मनवांछित फल देती, हे जग की माता॥

5

वैष्णो माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-संकट सब मिटते, सुख-सम्पति पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे वैष्णवी माता, आपकी जय हो! त्रिकूट पर्वत पर निवास करने वाली आप समस्त जगत को देने वाली हैं।
  2. महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के रूप में आप तीन पिण्डियों में ज्योति-स्वरूप विराजमान हैं।
  3. भैरव बाबा के संग अति पवित्र गुफा में आप विराजती हैं; सिंह की सवारी करती हुई आप भक्तों के पाप हर लेती हैं।
  4. जो भी आपकी शरण में आता है, वह खाली नहीं लौटता; हे जगत की माता, आप मनोवांछित फल देती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से वैष्णो माँ की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह सुख-सम्पत्ति प्राप्त करता है।

लाभ

  • भय, संकट व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
  • श्रद्धा व विश्वास से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • मन में भक्ति, साहस व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

कब करें पाठ

नवरात्रि में · मंगलवार व शुक्रवार को · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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