श्री विंध्यवासिनी चालीसा
पाठ
गणपति-गिरिजा-सुत सुमिर, करूँ मातु गुणगान। विंध्यवासिनी वंदना, देहु अभय वरदान॥
जय विंध्यवासिनी जगदम्बा। विंध्याचल-वासिनि अवलम्बा॥
जागृत शक्तिपीठ कहलाई। भक्तन की सब आस पुजाई॥
अष्टभुजा शस्त्र-धारी। सिंह-वाहिनी छवि अति न्यारी॥
शुम्भ-निशुम्भ संहार किया तुम। देवन का भय दूर किया तुम॥
मनोकामना पूर्ण कराती। वर-दायिनी जग में कहलाती॥
जो जन तुमको नित ही ध्यावै। मनवांछित फल सहज वह पावै॥
त्रिकोण-परिक्रमा जग जाने। अष्टभुजा-कालीखोह माने॥
विंध्याचल-धाम सुहावन तेरा। भक्त-गण नित दरस को घेरा॥
जो नर श्रद्धा से तुम्हें ध्यावै। रोग-शोक भय निकट न आवै॥
नवरात्रि व्रत जो जन धारे। सुख-समृद्धि माँ ता पर वारे॥
दीन-दुखी की सुनत पुकारा। पल में करती बेड़ा पारा॥
जो जन तुमको शीश नवावै। भय-संकट से मुक्ति पावै॥
चुनरी-पुष्प भक्त चढ़ावैं। श्रद्धा से माँ को रिझावैं॥
रोग-दोष सब दूर भगाती। सुख-समृद्धि घर में लाती॥
जो नर निशदिन ध्यान लगावै। विंध्या-कृपा सहज वह पावै॥
मंगल-कारी विघ्न-विनाशिनि। भय-हारिणि तुम सुख-प्रदायिनि॥
योगमाया रूप तुम धारा। कृष्ण-जन्म में जग को तारा॥
जो श्रद्धा से माँ को ध्यावै। ता के सब बिगड़े बन जावै॥
जो यह विंध्या चालीसा गावै। भय-संकट सब दूर नसावै॥
नित प्रति पाठ करे जो कोई। ता पर कृपा विंध्या की होई॥
मन-इच्छित फल सब जन पावैं। सुख-समृद्धि घर में लावैं॥
विंध्या-कृपा जिन पर होई। ता को कष्ट सतावे न कोई॥
जय माता दी जयकारा गूँजे। भक्त-गण माँ के दर पूजे॥
जो सत भाव करे यह सेवा। रीझत तुरत विंध्या देवा॥
संकट-मोचनि नाम तुम्हारा। भक्त-हृदय में नित्य निवारा॥
महिमा तुम्हरी अति अपारा। वेद-पुराण करत विस्तारा॥
साहस-बल तुम भक्तन देती। निर्भयता का वर तुम देती॥
घर-घर ज्योति तुम्हारी जागै। नर-नारी सब तुमको पागै॥
दुःख-संकट जो जन पीड़े। तुम्हें सुमिर कर सब दुख छीड़े॥
विंध्या-स्तुति जो जन गावै। रोग-शोक सब दूर भगावै॥
विंध्याचल-धाम की महिमा भारी। भव-तारिणि तुम जग-हितकारी॥
मनोकामना सब पूर्ण कराती। श्रद्धा-शक्ति का बल बताती॥
आदिशक्ति तुम जग-जननी। भव-तारिणि तुम सुख-दायिनी॥
जो जन विंध्या गुण गावै। पाप-ताप सब दूर भगावै॥
विंध्या-वंदन जो जन गावै। इहलोक-परलोक सुख पावै॥
सुख-समृद्धि घर में आवै। भक्ति-शक्ति-संतोष बढ़ावै॥
भय-संकट सब दूर हटावै। विंध्या जो जन नित ध्यावै॥
मनोकामना वह सहज वह पावै। विंध्या-नाम जो जन गावै॥
शक्ति-सुख-शान्ति घर में लावै। भक्ति-साहस सब बढ़ावै॥
जय जय जय विंध्या महारानी। भव-तारिणि तुम जग-कल्याणी॥
विंध्या चालीसा सरल यह, पढ़े प्रेम मन लाय। भय-संकट-मनोकामना, सहज मिटैं-मिलैं सदाय॥
अर्थ (हिन्दी)
- गिरिजा-पुत्र गणपति का स्मरण कर मैं माता का गुणगान करता हूँ; हे विंध्यवासिनी, वंदना स्वीकार कर अभय वरदान दीजिए।
- हे विंध्यवासिनी जगदम्बा, आपकी जय हो; विंध्याचल पर्वत पर निवास करने वाली आप सबकी आधार हैं।
- आप जागृत शक्तिपीठ कहलाती हैं और भक्तों की समस्त आशा पूर्ण करती हैं।
- आठ भुजाओं वाली व शस्त्र धारण किए; सिंह पर सवार आपकी छवि अति अनुपम है।
- आपने शुम्भ-निशुम्भ का संहार किया और देवताओं का भय दूर किया।
- आप मनोकामना पूर्ण कराती हैं और जगत में वर-दायिनी कहलाती हैं।
- जो जन नित्य आपका ध्यान करता है, वह सहज ही मनोवांछित फल पाता है।
- त्रिकोण-परिक्रमा को जगत जानता है — विंध्यवासिनी, अष्टभुजा व कालीखोह की परिक्रमा प्रसिद्ध है।
- विंध्याचल-धाम आपका सुहावना स्थान है; भक्तगण नित्य दर्शन को आते हैं।
- जो मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, उसके निकट रोग, शोक व भय नहीं आते।
- जो नवरात्रि का व्रत धारण करता है, हे माँ, आप उस पर सुख-समृद्धि न्योछावर करती हैं।
- आप दीन-दुखियों की पुकार सुनते ही पल भर में उनका बेड़ा पार कर देती हैं।
- जो जन आपको शीश नवाता है, वह भय व संकट से मुक्ति पाता है।
- भक्त लाल चुनरी व पुष्प चढ़ाते हैं और श्रद्धा से माँ को रिझाते हैं।
- आप समस्त रोग-दोष दूर भगाती हैं और घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।
- जो मनुष्य दिन-रात ध्यान लगाता है, वह सहज ही विंध्यवासिनी-कृपा प्राप्त करता है।
- आप मंगलकारी व विघ्नों की विनाशिनी हैं; भय हरकर सुख प्रदान करती हैं।
- आपने योगमाया रूप धारण किया और कृष्ण-जन्म के समय जगत को तारा।
- जो श्रद्धा से माँ का ध्यान करता है, उसके सब बिगड़े कार्य बन जाते हैं।
- जो यह विंध्यवासिनी चालीसा गाता है, उसके भय व संकट सब दूर नष्ट हो जाते हैं।
- जो कोई नित्य पाठ करता है, उस पर माँ विंध्यवासिनी की कृपा होती है।
- सब जन मन-इच्छित फल पाते हैं और घर में सुख-समृद्धि लाते हैं।
- जिन पर माँ विंध्यवासिनी की कृपा होती है, उन्हें कोई कष्ट नहीं सताता।
- "जय माता दी" का जयकारा गूँजता है; भक्तगण माँ के द्वार पर पूजते हैं।
- जो सच्चे भाव से यह सेवा करता है, उस पर माँ विंध्यवासिनी तुरंत रीझ (प्रसन्न हो) जाती हैं।
- आपका नाम संकट-मोचनी है; आप भक्तों के हृदय में नित्य निवास कर कष्ट दूर करती हैं।
- आपकी महिमा अति अपार है, जिसका विस्तार वेद-पुराण करते हैं।
- आप भक्तों को साहस व बल देती हैं और निर्भयता का वरदान देती हैं।
- घर-घर में आपकी ज्योति जगती है; नर-नारी सब आपमें अनुरक्त हो जाते हैं।
- जो जन दुःख-संकट से पीड़ित हैं, वे आपका स्मरण कर समस्त दुःख दूर कर लेते हैं।
- जो जन विंध्यवासिनी-स्तुति गाता है, वह समस्त रोग-शोक दूर भगा देता है।
- विंध्याचल-धाम की महिमा अति महान है; आप भव-तारिणी व जगत-हितकारी हैं।
- आप समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण कराती हैं और श्रद्धा व शक्ति का बल बताती हैं।
- आप आदिशक्ति व जगत-जननी हैं; भव-तारिणी व सुख देने वाली हैं।
- जो जन विंध्यवासिनी के गुण गाता है, वह समस्त पाप-ताप दूर भगा देता है।
- जो जन विंध्यवासिनी-वंदना गाता है, वह इस लोक व परलोक दोनों में सुख पाता है।
- घर में सुख-समृद्धि आती है और भक्ति, शक्ति व संतोष बढ़ता है।
- जो जन विंध्यवासिनी का नित्य ध्यान करता है, वह भय व संकट सब दूर हटा देता है।
- जो जन विंध्यवासिनी-नाम गाता है, वह सहज ही अपनी मनोकामना पा लेता है।
- घर में शक्ति, सुख व शांति आती है और भक्ति व साहस बढ़ता है।
- हे विंध्यवासिनी महारानी, आपकी जय हो; आप भव-तारिणी व जगत की कल्याणी हैं।
- जो प्रेमपूर्वक मन लगाकर यह सरल विंध्यवासिनी चालीसा पढ़ता है, उसके भय-संकट सदा मिटते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
लाभ
- भय, शत्रु व संकट से रक्षा होती है।
- श्रद्धा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- भक्ति, शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
- घर में सुख-समृद्धि व देवी-कृपा बनी रहती है।
कब करें पाठ
नवरात्रि में · मंगलवार व शुक्रवार को · प्रातः व संध्या पूजा में
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक विंध्यवासिनी चालीसा · गीता प्रेस, गोरखपुर — चालीसा संग्रह
