श्री विंध्यवासिनी चालीसा

śrī viṃdhyavāsinī cālīsā

Vindhyavasini (Vindhyeshwari) Chalisa

समय
7–9 मिनट
श्लोक/चौपाई
39
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
नवरात्रि; मंगलवार व शुक्रवार
उद्देश्य:संकट-निवारण (Relief from troubles)ऋण-मुक्ति (Freedom from debt)संतान-सुख (Blessing of children)
✓ संपूर्ण (38/38 श्लोक)

श्री विंध्यवासिनी चालीसा — जिसे अधिकांश प्रकाशक "विन्ध्येश्वरी चालीसा" नाम से छापते हैं — एक दोहे से आरंभ होकर अड़तीस चौपाइयों में चलती है: "नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब"। इसका पहला भाग देवी के नामों की लंबी माला है, और दूसरा भाग फलश्रुति — ऋण, रोग, बंदीगृह और संतान के लिए पाठ की संख्या और विधि।

परिचय

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

स्रोत: माँ विंध्यवासिनी — विंध्याचल, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश); "विन्ध्येश्वरी चालीसा" नाम से भी प्रचलित

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री विंध्यवासिनी चालीसा
IASTśrī viṃdhyavāsinī cālīsā
देवतामाँ दुर्गा
मूल स्रोतमाँ विंध्यवासिनी — विंध्याचल, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश); "विन्ध्येश्वरी चालीसा" नाम से भी प्रचलित
शुभ दिननवरात्रि; मंगलवार व शुक्रवार
पाठ समय7–9 मिनट
कठिनाईसरल

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह चालीसा दो साफ़ भागों में बँटी है — पहले नाम, फिर उपाय।

विन्ध्याचल की रानी (चौपाई 1, 17, 36). पहली ही चौपाई देवी को "विन्ध्याचल रानी" कहती है, चौपाई 17 में "आयु रक्षिनी विन्ध्यवासिनी", और चौपाई 36 पाठ को "यह श्री विन्ध्याचल चालीसा" कहती है। विंध्य पर्वत पर देवी के निवास का प्रसंग दुर्गा सप्तशती में स्वयं देवी के वचन में है — नन्द-गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर "विन्ध्याचलनिवासिनी" होने का (अध्याय 11, श्लोक 42)।

नामों की माला (चौपाई 8–19). बारह चौपाइयाँ केवल यह कहती हैं कि सब देवियाँ एक ही हैं — "तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी, तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी" (8)। रमा, राधिका, श्यामा, काली, उमा, चण्डी, हिंगलाज, शीतला, दुर्गा, लक्ष्मी, जाह्नवी, वाराही, चौंसठ योगिनियाँ, भद्रकाली, जया-विजया — और अंत में स्वीकार: "नाम अनन्त तुम्हारि भवानी, वरनै किमि मानुष अज्ञानी" (19)।

फलश्रुति (चौपाई 22–35). यहाँ चालीसा बहुत ठोस है — ऋण हो तो सौ बार पाठ (24), बंदीगृह में हो तो हज़ार बार (28), और संतान के लिए पाँच वर्ष पाठ करवाकर नवरात्रों में ब्राह्मण-भोजन (32)। चौपाई 34 विधि बताती है — ध्वजा और नारियल चढ़ाकर विधि सहित पूजन; और चौपाई 35 उसका सार — "प्रेम सहित नहिं आन उपाई"।

गिनती. नाम "चालीसा" है, पर चौपाइयाँ अड़तीस हैं — छहों प्रकाशित प्रतियों में यही संख्या है।

संपूर्ण चालीसा

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नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब। सन्तजनों के काज में, करती नहीं विलम्ब॥

हे विन्ध्येश्वरी, आपको बार-बार नमस्कार; हे जगदम्बा, आपको बार-बार नमस्कार। संतजनों के काम में आप देर नहीं करतीं।

जय जय जय विन्ध्याचल रानी। आदिशक्ति जगविदित भवानी॥

हे विन्ध्याचल की रानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप आदिशक्ति हैं, जगत-प्रसिद्ध भवानी हैं।

सिंहवाहिनी जै जगमाता। जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता॥

हे सिंहवाहिनी जगन्माता, आपकी जय हो; हे तीनों लोकों को सुख देने वाली, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।

कष्ट निवारण जै जगदेवी। जै जै सन्त असुर सुर सेवी॥

हे कष्ट दूर करने वाली जगदेवी, आपकी जय हो; संत, असुर और देवता — सब आपकी सेवा करते हैं।

महिमा अमित अपार तुम्हारी। शेष सहस मुख वर्णत हारी॥

आपकी महिमा अमित और अपार है; शेषनाग अपने हज़ार मुखों से वर्णन करते-करते हार जाते हैं।

दीनन को दु:ख हरत भवानी। नहिं देखो तुम सम कोउ दानी॥

हे भवानी, आप दीनों का दुख हरती हैं; आपके समान दानी कोई नहीं देखा।

सब कर मनसा पुरवत माता। महिमा अमित जगत विख्याता॥

हे माता, आप सबकी मनोकामना पूरी करती हैं; आपकी अमित महिमा जगत में विख्यात है।

जो जन ध्यान तुम्हारो लावै। सो तुरतहि वांछित फल पावै॥

जो जन आपका ध्यान लगाता है, वह तुरंत मनचाहा फल पाता है।

तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी। तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी॥

आप ही वैष्णवी हैं, आप ही रुद्राणी; आप ही शारदा और ब्रह्माणी हैं।

रमा राधिका श्यामा काली। तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली॥

रमा, राधिका, श्यामा, काली — हे माँ, आप ही संतों का पालन करने वाली हैं।

उमा माधवी चण्डी ज्वाला। वेगि मोहि पर होहु दयाला॥

उमा, माधवी, चण्डी, ज्वाला — (हे माँ,) शीघ्र मुझ पर दयालु होइए।

तुम्हीं हिंगलाज महारानी। तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी॥

आप ही हिंगलाज की महारानी हैं; आप ही शीतला हैं और आप ही विज्ञान-स्वरूपा।

दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता। तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता॥

हे माता, आप ही दुर्गम (संकटों) का नाश करने वाली दुर्गा हैं; आप ही जगत को सुख देने वाली लक्ष्मी हैं।

तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी। हेमावती अम्ब निर्वानी॥

आप ही जाह्नवी (गंगा) हैं और आप ही रुद्राणी; हेमावती (हिमालय-पुत्री), माँ, निर्वाण देने वाली आप ही हैं।

अष्टभुजी वाराहिनि देवा। करत विष्णु शिव जाकर सेवा॥

आप अष्टभुजा, वाराही देवी हैं, जिनकी सेवा विष्णु और शिव करते हैं।

चौंसट्ठी देवी कल्यानी। गौरि मंगला सब गुनखानी॥

आप चौंसठ (योगिनी-रूप) कल्याणकारी देवी हैं; गौरी, मंगला और सब गुणों की खान हैं।

पाटन मुम्बादन्त कुमारी। भद्रकालि सुनि विनय हमारी॥

पाटन (की देवी), मुम्बा, दन्त-कुमारी — हे भद्रकाली, हमारी विनती सुनिए।

बज्रधारिणी शोक नाशिनी। आयु रक्षिनी विन्ध्यवासिनी॥

आप वज्र धारण करने वाली, शोक का नाश करने वाली, आयु की रक्षा करने वाली विन्ध्यवासिनी हैं।

जया और विजया वैताली। मातु सुगन्धा अरु विकराली॥

जया और विजया, वैताली, माता सुगन्धा और विकराली — ये सब आप ही हैं।

नाम अनन्त तुम्हारि भवानी। वरनै किमि मानुष अज्ञानी॥

हे भवानी, आपके नाम अनंत हैं; अज्ञानी मनुष्य उनका वर्णन कैसे करे?

जापर कृपा मातु तब होई। जो वह करै चाहे मन जोई॥

हे माता, जिस पर आपकी कृपा होती है, वह मन में जो चाहे वही कर पाता है।

कृपा करहु मोपर महारानी। सिद्ध करहु अम्बे मम बानी॥

हे महारानी, मुझ पर कृपा कीजिए; हे अम्बे, मेरी वाणी को सिद्ध कीजिए।

जो नर धरै मातु कर ध्याना। ताकर सदा होय कल्याना॥

जो मनुष्य माता का ध्यान धरता है, उसका सदा कल्याण होता है।

विपति ताहि सपनेहु नाहिं आवै। जो देवीकर जाप करावै॥

जो देवी का जाप करवाता है, उसके पास विपत्ति सपने में भी नहीं आती।

जो नर कहँ ऋण होय अपारा। सो नर पाठ करै शत बारा॥

जिस मनुष्य पर अपार ऋण हो, वह इसका सौ बार पाठ करे।

निश्चय ऋण मोचन होई जाई। जो नर पाठ करै चित लाई॥

जो मनुष्य चित्त लगाकर पाठ करता है, वह निश्चय ही ऋण से मुक्त हो जाता है।

अस्तुति जो नर पढ़े पढ़ावे। या जग में सो बहु सुख पावे॥

जो मनुष्य यह स्तुति पढ़ता और पढ़वाता है, वह इस जगत में बहुत सुख पाता है।

जाको व्याधि सतावे भाई। जाप करत सब दूर पराई॥

हे भाई, जिसे कोई रोग सताता हो, जाप करने से वह सब दूर भाग जाता है।

जो नर अति बन्दी महँ होई। बार हजार पाठ करि सोई॥

जो मनुष्य कठोर बंदीगृह में हो, वह इसका हज़ार बार पाठ करे —

निश्चय बन्दी ते छुट जाई। सत्य वचन मम मानहु भाई॥

— वह निश्चय ही बंधन से छूट जाता है; हे भाई, मेरे इस वचन को सत्य मानो।

जापर जो कछु संकट होई। निश्चय देविहिं सुमिरै सोई॥

जिस पर जो भी संकट हो, वह निश्चय ही देवी का स्मरण करे।

जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई। सो नर या विधि करे उपाई॥

हे भाई, जिसके पुत्र न हो, वह मनुष्य इस विधि से उपाय करे —

पाँच वर्ष जो पाठ करावै। नौरातन महँ विप्र जिमावै॥

— पाँच वर्ष तक पाठ करवाए, और नवरात्रों में ब्राह्मणों को भोजन कराए।

निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी। पुत्र देहिं ता कहँ गुणखानी॥

तब भवानी निश्चय ही प्रसन्न होती हैं और उसे गुणों की खान पुत्र देती हैं।

ध्वजा नारियल आन चढ़ावै। विधि समेत पूजन करवावै॥

ध्वजा और नारियल लाकर चढ़ाए, और विधि सहित पूजन करवाए।

नित प्रति पाठ करै मन लाई। प्रेम सहित नहिं आन उपाई॥

नित्य प्रति मन लगाकर प्रेम सहित पाठ करे — इसके सिवा कोई और उपाय नहीं।

यह श्री विन्ध्याचल चालीसा। रंक पढ़त होवे अवनीसा॥

यह श्री विन्ध्याचल चालीसा है — इसे पढ़कर रंक भी राजा हो जाता है।

यह जनि अचरज मानहु भाई। कृपा दृष्टि जापर होइ जाई॥

हे भाई, इसे अचरज मत मानो — (यह उसके साथ होता है) जिस पर (माँ की) कृपा-दृष्टि हो जाए।

जै जै जै जग मातु भवानी। कृपा करहु मोहि निज जन जानी॥

हे जगन्माता भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; मुझे अपना जन जानकर कृपा कीजिए।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. हे विन्ध्येश्वरी, आपको बार-बार नमस्कार; हे जगदम्बा, आपको बार-बार नमस्कार। संतजनों के काम में आप देर नहीं करतीं।
  2. हे विन्ध्याचल की रानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप आदिशक्ति हैं, जगत-प्रसिद्ध भवानी हैं।
  3. हे सिंहवाहिनी जगन्माता, आपकी जय हो; हे तीनों लोकों को सुख देने वाली, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
  4. हे कष्ट दूर करने वाली जगदेवी, आपकी जय हो; संत, असुर और देवता — सब आपकी सेवा करते हैं।
  5. आपकी महिमा अमित और अपार है; शेषनाग अपने हज़ार मुखों से वर्णन करते-करते हार जाते हैं।
  6. हे भवानी, आप दीनों का दुख हरती हैं; आपके समान दानी कोई नहीं देखा।
  7. हे माता, आप सबकी मनोकामना पूरी करती हैं; आपकी अमित महिमा जगत में विख्यात है।
  8. जो जन आपका ध्यान लगाता है, वह तुरंत मनचाहा फल पाता है।
  9. आप ही वैष्णवी हैं, आप ही रुद्राणी; आप ही शारदा और ब्रह्माणी हैं।
  10. रमा, राधिका, श्यामा, काली — हे माँ, आप ही संतों का पालन करने वाली हैं।
  11. उमा, माधवी, चण्डी, ज्वाला — (हे माँ,) शीघ्र मुझ पर दयालु होइए।
  12. आप ही हिंगलाज की महारानी हैं; आप ही शीतला हैं और आप ही विज्ञान-स्वरूपा।
  13. हे माता, आप ही दुर्गम (संकटों) का नाश करने वाली दुर्गा हैं; आप ही जगत को सुख देने वाली लक्ष्मी हैं।
  14. आप ही जाह्नवी (गंगा) हैं और आप ही रुद्राणी; हेमावती (हिमालय-पुत्री), माँ, निर्वाण देने वाली आप ही हैं।
  15. आप अष्टभुजा, वाराही देवी हैं, जिनकी सेवा विष्णु और शिव करते हैं।
  16. आप चौंसठ (योगिनी-रूप) कल्याणकारी देवी हैं; गौरी, मंगला और सब गुणों की खान हैं।
  17. पाटन (की देवी), मुम्बा, दन्त-कुमारी — हे भद्रकाली, हमारी विनती सुनिए।
  18. आप वज्र धारण करने वाली, शोक का नाश करने वाली, आयु की रक्षा करने वाली विन्ध्यवासिनी हैं।
  19. जया और विजया, वैताली, माता सुगन्धा और विकराली — ये सब आप ही हैं।
  20. हे भवानी, आपके नाम अनंत हैं; अज्ञानी मनुष्य उनका वर्णन कैसे करे?
  21. हे माता, जिस पर आपकी कृपा होती है, वह मन में जो चाहे वही कर पाता है।
  22. हे महारानी, मुझ पर कृपा कीजिए; हे अम्बे, मेरी वाणी को सिद्ध कीजिए।
  23. जो मनुष्य माता का ध्यान धरता है, उसका सदा कल्याण होता है।
  24. जो देवी का जाप करवाता है, उसके पास विपत्ति सपने में भी नहीं आती।
  25. जिस मनुष्य पर अपार ऋण हो, वह इसका सौ बार पाठ करे।
  26. जो मनुष्य चित्त लगाकर पाठ करता है, वह निश्चय ही ऋण से मुक्त हो जाता है।
  27. जो मनुष्य यह स्तुति पढ़ता और पढ़वाता है, वह इस जगत में बहुत सुख पाता है।
  28. हे भाई, जिसे कोई रोग सताता हो, जाप करने से वह सब दूर भाग जाता है।
  29. जो मनुष्य कठोर बंदीगृह में हो, वह इसका हज़ार बार पाठ करे —
  30. — वह निश्चय ही बंधन से छूट जाता है; हे भाई, मेरे इस वचन को सत्य मानो।
  31. जिस पर जो भी संकट हो, वह निश्चय ही देवी का स्मरण करे।
  32. हे भाई, जिसके पुत्र न हो, वह मनुष्य इस विधि से उपाय करे —
  33. — पाँच वर्ष तक पाठ करवाए, और नवरात्रों में ब्राह्मणों को भोजन कराए।
  34. तब भवानी निश्चय ही प्रसन्न होती हैं और उसे गुणों की खान पुत्र देती हैं।
  35. ध्वजा और नारियल लाकर चढ़ाए, और विधि सहित पूजन करवाए।
  36. नित्य प्रति मन लगाकर प्रेम सहित पाठ करे — इसके सिवा कोई और उपाय नहीं।
  37. यह श्री विन्ध्याचल चालीसा है — इसे पढ़कर रंक भी राजा हो जाता है।
  38. हे भाई, इसे अचरज मत मानो — (यह उसके साथ होता है) जिस पर (माँ की) कृपा-दृष्टि हो जाए।
  39. हे जगन्माता भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; मुझे अपना जन जानकर कृपा कीजिए।

लाभ

  • संकट के समय देवी-स्मरण का पाठ — "जापर जो कछु संकट होई, निश्चय देविहिं सुमिरै सोई" (30)।
  • ऋण से मुक्ति की कामना — चालीसा सौ बार पाठ का विधान देती है (24–25)।
  • रोग और बंधन से छुटकारे की प्रार्थना (27–29)।
  • संतान की कामना — पाँच वर्ष पाठ और नवरात्रों में ब्राह्मण-भोजन का विधान (31–33)।

कब करें पाठ

चैत्र और शारदीय नवरात्रि मेंमंगलवार व शुक्रवार कोऋण, रोग या किसी संकट के समय — चालीसा की बताई संख्या में

पाठ विधि

माँ विंध्यवासिनी के चित्र के समक्ष दीप जलाएँ; लाल पुष्प, नारियल और लाल ध्वजा अर्पित करें — चौपाई 34 यही कहती है: "ध्वजा नारियल आन चढ़ावै"। पहले दोहा, फिर अड़तीस चौपाइयाँ पढ़ें। किसी विशेष कामना के लिए चालीसा स्वयं संख्या बताती है — ऋण के लिए सौ बार, बंधन से मुक्ति के लिए हज़ार बार।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (38/38 श्लोक)
स्रोत परंपराbhaktibharat.com — विन्ध्येश्वरी चालीसा (आधार-पाठ) · hindunidhi.com — विन्ध्येश्वरी चालीसा · shridharam.com — श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा · dharmyaatra.in — विंध्यवासिनी / विंधेश्वरी चालीसा · divineaarti.com — श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा · aartichalisa.com — विंध्यवासिनी चालीसा
रचयिताअज्ञात (किसी प्रति में छाप नहीं)
अंतिम अद्यतनसितंबर 2026

यह भी देखें

देव परिचय

माँ दुर्गा

Goddess Durga

माँ दुर्गा आदिशक्ति का स्वरूप हैं — दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों की रक्षक।

देवता वर्गशक्ति · रक्षा · विजय · साहस
वाहनसिंह
मुख्य मंत्रॐ दुं दुर्गायै नमः
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श्री विंध्यवासिनी चालीसा — सामान्य प्रश्न

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