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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री विंध्यवासिनी माता आरती

आरती · माँ दुर्गा

पाठ

1

जय विंध्यवासिनी माता, मैया जय विंध्यवासिनी माता। विंध्याचल पर विराजे, तू जग की दाता॥

2

सिंह-वाहिनी शोभे, अष्टभुजा धारी। शस्त्र अनेक सजे माँ, रूप अति प्यारी॥

3

शुम्भ-निशुम्भ संहारे, दुष्ट दलन कीन्हा। भक्तन को सुख देती, वर अभय का दीन्हा॥

4

जो जन शरण में आता, मनवांछित पाता। रोग-शोक भय हरती, हे जगत की माता॥

5

विंध्यवासिनी आरती, जो जन श्रद्धा गावे। भय-संकट सब मिटते, सुख-सम्पति पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे विंध्यवासिनी माता, आपकी जय हो! विंध्याचल पर्वत पर विराजमान आप समस्त जगत को देने वाली हैं।
  2. सिंह पर सवार होकर सुशोभित, आठ भुजाओं वाली; अनेक शस्त्रों से सजी हुई — हे माँ, आपका रूप अति प्यारा है।
  3. आपने शुम्भ-निशुम्भ का संहार कर दुष्टों का दमन किया; भक्तों को सुख देती हैं और अभय का वरदान देती हैं।
  4. जो भक्त आपकी शरण में आता है, वह मनोवांछित फल पाता है; हे जगत की माता, आप रोग-शोक व भय हर लेती हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से विंध्यवासिनी की यह आरती गाता है, उसके समस्त भय-संकट मिट जाते हैं और वह सुख-सम्पत्ति प्राप्त करता है।

लाभ

  • भय, शत्रु व संकट से रक्षा होती है।
  • श्रद्धा से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • भक्ति, शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

कब करें पाठ

नवरात्रि में · मंगलवार व शुक्रवार को · प्रातः व संध्या पूजा में

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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