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लिपि:
॥ श्री ॥
शान्ताकारं भुजगशयनम् — विष्णु ध्यान मंत्र
मंत्र · श्री विष्णु
पाठ
1
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ (हिन्दी)
- जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवों के ईश हैं; जो विश्व के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान श्याम-वर्ण और मंगलमय अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी के प्रियतम, कमल-नेत्र और योगियों द्वारा ध्यान से ही प्राप्य हैं — उन विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ, जो संसार का भय हरने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र नाथ हैं।
लाभ
- विष्णु सहस्रनाम-पाठ से पूर्व पढ़ने की परंपरा है — साधना का आरंभ-श्लोक।
- परंपरा में इसे ध्यान में स्वरूप स्थिर करने वाला श्लोक माना जाता है।
- मन की शांति व भय-निवृत्ति से जोड़ा जाता है — "भवभयहरं" इसका केंद्र है।
- एकादशी व गुरुवार की उपासना में पाठ प्रचलित है।
कब करें पाठ
विष्णु सहस्रनाम पाठ आरंभ करने से पूर्व · गुरुवार व एकादशी को · ध्यान व साधना के आरंभ में · सत्यनारायण पूजा में
स्रोत
विष्णु मंत्र-सूची में स्वतंत्र प्रविष्टि "Vishnu Shantakaram Mantra" (drikpanchang) · विष्णु सहस्रनाम पाठ परंपरा — ध्यान-श्लोक के रूप में
