शान्ताकारं भुजगशयनम् — विष्णु ध्यान मंत्र

śāntākāraṃ bhujagaśayanam

Vishnu Shantakaram Dhyana Mantra

समय
45 सेकंड
जप संख्या
3
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
गुरुवार व एकादशी
उद्देश्य:ध्यान व साधना (Meditation)मन की शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनम् — यह विष्णु का ध्यान-श्लोक है, जो विष्णु सहस्रनाम-पाठ से पूर्व पढ़ा जाता है। इसमें भगवान का पूरा स्वरूप शब्दों में खींचा गया है: शांत आकार, शेषनाग की शय्या, कमल-नाभि, मेघ-वर्ण और कमल-नेत्र। साधना व ध्यान के आरंभ में इसका पाठ प्रचलित है।

परिचय

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

स्रोत: विष्णु का ध्यान-श्लोक; विष्णु सहस्रनाम-पाठ से पूर्व पढ़ने की परंपरा

एक नज़र में

मंत्र / पाठशान्ताकारं भुजगशयनम् — विष्णु ध्यान मंत्र
IASTśāntākāraṃ bhujagaśayanam
प्रकारसाधना मंत्र
देवताश्री विष्णु
मूल स्रोतविष्णु का ध्यान-श्लोक; विष्णु सहस्रनाम-पाठ से पूर्व पढ़ने की परंपरा
जप संख्या3
शुभ दिनगुरुवार व एकादशी
पाठ समय45 सेकंड
कठिनाईमध्यम

उद्भव / पृष्ठभूमि

यह श्लोक विष्णु-उपासना का सबसे परिचित ध्यान-श्लोक है और परंपरा में विष्णु सहस्रनाम का पाठ आरंभ करने से पूर्व इसे पढ़ा जाता है। "ध्यान-श्लोक" का अर्थ है — वह श्लोक जिसे पढ़ते हुए साधक भगवान का स्वरूप मन में स्थिर करता है।

पूरा श्लोक एक चित्र बनाता है, और हर विशेषण उस चित्र का एक अंश है: शान्ताकारं — जिनका आकार ही शांति है; भुजगशयनं — जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं; पद्मनाभं — जिनकी नाभि से कमल निकला है; सुरेशं — देवों के ईश; विश्वाधारं — विश्व के आधार; गगनसदृशं — आकाश के समान व्यापक; मेघवर्णं — मेघ के समान श्याम; शुभाङ्गम् — मंगलमय अंगों वाले; लक्ष्मीकान्तं — लक्ष्मी के प्रियतम; कमलनयनं — कमल-नेत्र।

अंतिम पंक्ति में साधक कहता है कि योगी इन्हें ध्यान के द्वारा ही पाते हैं, और वह उन विष्णु को प्रणाम करता है "जो भव-भय हरने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र नाथ हैं"। यही "भवभयहरं" पद इस श्लोक का केंद्र माना जाता है — संसार का भय हरना ही यहाँ माँगा गया फल है।

मंत्र

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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

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उच्चारण (Pronunciation)

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

śāntākāraṃ bhujagaśayanaṃ padmanābhaṃ sureśaṃ viśvādhāraṃ gaganasadṛśaṃ meghavarṇaṃ śubhāṅgam | lakṣmīkāntaṃ kamalanayanaṃ yogibhir dhyānagamyaṃ vande viṣṇuṃ bhavabhayaharaṃ sarvalokaikanātham ||

Shantakaram Bhujagashayanam Padmanabham Suresham, Vishvadharam Gaganasadrisham Meghavarnam Shubhangam, Lakshmikantam Kamalanayanam Yogibhir-dhyanagamyam, Vande Vishnum Bhavabhayaharam Sarvalokaikanatham.

उच्चारण मार्गदर्शन: यह मन्दाक्रान्ता-सदृश दीर्घ छंद है — इसे जल्दी नहीं, ठहरकर पढ़ें। "भुजगशयनं" में "ज" और "श" अलग ध्वनियाँ हैं। "गगनसदृशं" में "दृ" ऋ-कार सहित है। "योगिभिर्ध्यानगम्यं" सबसे कठिन पद है — "यो-गि-भिर्-ध्या-न-गम्-यं" में तोड़कर अभ्यास करें; "ध्या" महाप्राण संयुक्ताक्षर है। "सर्वलोकैकनाथम्" = "सर्वलोक + एक + नाथम्" की संधि है।

शब्द-अर्थ (Word-by-Word)

शान्ताकारंजिनका आकार ही शांति है
भुजगशयनंशेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले
पद्मनाभंजिनकी नाभि से कमल निकला है
सुरेशंदेवों के ईश
विश्वाधारंविश्व के आधार
गगनसदृशंआकाश के समान व्यापक
मेघवर्णंमेघ के समान श्याम वर्ण वाले
लक्ष्मीकान्तंलक्ष्मी के प्रियतम
योगिभिर्ध्यानगम्यंयोगियों द्वारा ध्यान से प्राप्य
भवभयहरंसंसार का भय हरने वाले
सर्वलोकैकनाथम्समस्त लोकों के एकमात्र नाथ

अर्थ (हिन्दी)

  1. जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवों के ईश हैं; जो विश्व के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान श्याम-वर्ण और मंगलमय अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी के प्रियतम, कमल-नेत्र और योगियों द्वारा ध्यान से ही प्राप्य हैं — उन विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ, जो संसार का भय हरने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र नाथ हैं।

लाभ

  • विष्णु सहस्रनाम-पाठ से पूर्व पढ़ने की परंपरा है — साधना का आरंभ-श्लोक।
  • परंपरा में इसे ध्यान में स्वरूप स्थिर करने वाला श्लोक माना जाता है।
  • मन की शांति व भय-निवृत्ति से जोड़ा जाता है — "भवभयहरं" इसका केंद्र है।
  • एकादशी व गुरुवार की उपासना में पाठ प्रचलित है।

अनुशंसित जप संख्या

जप संख्या: प्रतिदिन 3 बार (एक माला)।

माला: —

उत्तम समय: ध्यान व सहस्रनाम पाठ से पूर्व

जप का उत्तम समय

विष्णु सहस्रनाम पाठ आरंभ करने से पूर्वगुरुवार व एकादशी कोध्यान व साधना के आरंभ मेंसत्यनारायण पूजा में

जप विधि (चैंटिंग मेथड)

स्नान के बाद विष्णु-विग्रह के समक्ष दीपक जलाएँ, तुलसी दल अर्पित करें और स्थिर आसन पर बैठकर एक बार धीमी व स्पष्ट चाल में पाठ करें। परंपरा में इसे जप की तरह बार-बार दोहराने के बजाय ध्यान के आरंभ में एक या तीन बार पढ़ने का विधान बताया जाता है — पाठ करते हुए श्लोक में वर्णित स्वरूप का क्रमशः ध्यान करना ही इसका उद्देश्य है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण
मूल ग्रंथविष्णु ध्यान श्लोक — विष्णु सहस्रनाम पाठ परंपरा
स्रोत परंपराविष्णु मंत्र-सूची में स्वतंत्र प्रविष्टि "Vishnu Shantakaram Mantra" (drikpanchang) · विष्णु सहस्रनाम पाठ परंपरा — ध्यान-श्लोक के रूप में
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री विष्णु

Lord Vishnu

भगवान विष्णु त्रिदेवों में सृष्टि के पालनकर्ता हैं — धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेने वाले जगदीश।

देवता वर्गपालन · रक्षा · धर्म-संस्थापना
वाहनगरुड़
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मुख्य मंत्रॐ नमो भगवते वासुदेवाय
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शान्ताकारं भुजगशयनम् — विष्णु ध्यान मंत्र — सामान्य प्रश्न

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