समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
गुरुवार व एकादशी
उद्देश्य:आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मोक्ष (Liberation)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण वैदिक मंत्र
विष्णु का वैदिक मंत्र “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥” ऋग्वेद 1.22.20 है। इसका अर्थ है — विष्णु के उस परम पद को ज्ञानी सदा देखते हैं, जैसे आकाश में फैली हुई दृष्टि। यह विष्णु-उपासना का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र माना जाता है।
FAQ
विष्णु वैदिक मंत्र — तद्विष्णोः परमं पदम् — सामान्य प्रश्न
"ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥" — यह ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, सूक्त 22, ऋचा 20 है और विष्णु-उपासना का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र माना जाता है।
वैदिक विष्णु मुख्यतः त्रिविक्रम हैं — जो तीन डगों में समस्त लोकों को नाप लेते हैं। उनका तीसरा डग जहाँ पड़ता है वही "परमं पदं" अर्थात् परम स्थान कहलाता है, जिसे यह ऋचा केंद्र बनाती है।
स्वरूप-वर्णन में अंतर है। ऋग्वेद में विष्णु मुख्यतः त्रिविक्रम रूप में आते हैं; पौराणिक चतुर्भुज, शेषशायी, लक्ष्मीपति स्वरूप बाद में विकसित हुआ। परंपरा दोनों को एक ही तत्त्व का क्रमिक प्रकाश मानती है।
ज्ञानी या विवेकी। ध्यान रखें कि यह "सुरयः" (देवता) नहीं, "सूरयः" है — दीर्घ "सू" के साथ। एक मात्रा का यह अंतर अर्थ बदल देता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए गुरुवार व एकादशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — गुरुवार व एकादशी को; प्रातः-संध्या वंदन में; ध्यान व साधना के आरंभ में; विष्णु यज्ञ व सत्यनारायण पूजा में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह वैदिक मंत्र है। परंपरा में वैदिक मंत्रों को गुरु के मुख से, शुद्ध उच्चारण तथा स्वर सहित सीखना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इनमें स्वर का भी विधान होता है। बिना गुरु के केवल भाव सहित पाठ करने का निषेध नहीं कहा जाता, किंतु विधिवत जप के लिए सीखना उत्तम बताया गया है।
पर्व
