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लिपि:
॥ श्री ॥
विष्णु वैदिक मंत्र — तद्विष्णोः परमं पदम्
मंत्र · श्री विष्णु
पाठ
1
ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥
अर्थ (हिन्दी)
- विष्णु के उस परम पद को ज्ञानीजन सदा देखते हैं — जैसे आकाश में फैली हुई दृष्टि। (वह परम स्थान सर्वत्र व्याप्त है और विवेकी उसे निरंतर अनुभव करते हैं।)
लाभ
- विष्णु-उपासना का सर्वाधिक प्राचीन उपलब्ध मंत्र माना जाता है।
- परंपरा में इसे आत्म-बोध व मोक्ष-मार्ग से जोड़ा जाता है।
- वैष्णव संध्या-वंदन व विष्णु यज्ञ में पाठ विहित बताया जाता है।
- ध्यान-साधना में दृष्टि व चित्त की व्यापकता का भाव जगने की मान्यता है।
कब करें पाठ
गुरुवार व एकादशी को · प्रातः-संध्या वंदन में · ध्यान व साधना के आरंभ में · विष्णु यज्ञ व सत्यनारायण पूजा में
स्रोत
रचयिता: मेधातिथि काण्व (ऋग्वेद प्रथम मण्डल). ऋग्वेद 1.22.20 — ऋषि मेधातिथि काण्व · वैष्णव संध्या-वंदन व विष्णु यज्ञ परंपरा
