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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री विश्वकर्मा आरती

आरती

पाठ

1

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा। सृष्टि-शिल्प के स्वामी, तुम जानत सब कर्मा॥

2

देव-शिल्पी कहलाओ, रचना अद्भुत कीन्ही। स्वर्ग-लंका-द्वारका, तुमने ही दीन्ही॥

3

यंत्र-शस्त्र-वास्तु के, तुम हो आदि-दाता। श्रम-शिल्प के पूजक की, करते भाग्य-विधाता॥

4

व्यापार-उद्योग में बरकत, कारीगर सुख पाते। जो जन तुमको ध्याते, उन्नति वे पाते॥

5

विश्वकर्मा आरती, जो जन श्रद्धा गावे। कार्य-सिद्धि वह पावे, सुख-समृद्धि पावे॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. हे श्री विश्वकर्मा प्रभु, आपकी जय हो! आप सृष्टि-शिल्प के स्वामी हैं और समस्त कर्म (कला-कौशल) के ज्ञाता हैं।
  2. आप देव-शिल्पी कहलाते हैं, आपने अद्भुत रचनाएँ कीं; स्वर्गलोक, सोने की लंका व द्वारका — सब आपने ही निर्मित कीं।
  3. आप यंत्र, शस्त्र व वास्तु-कला के आदि-दाता हैं; श्रम व शिल्प के पूजकों के भाग्य-विधाता हैं।
  4. आपकी कृपा से व्यापार-उद्योग में बरकत आती है और कारीगर सुख पाते हैं; जो आपका ध्यान करते हैं, वे उन्नति प्राप्त करते हैं।
  5. जो भक्त श्रद्धा से विश्वकर्मा जी की यह आरती गाता है, वह कार्य-सिद्धि तथा सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।

लाभ

  • व्यापार, उद्योग व कार्य में सफलता व बरकत आती है।
  • यंत्र, औजार व कार्यस्थल पर शुभता व सुरक्षा रहती है।
  • कौशल, उन्नति व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

कब करें पाठ

विश्वकर्मा जयंती (कन्या संक्रांति) पर · कारखाने/यंत्र-पूजन के समय · किसी नए कार्य/निर्माण-आरंभ पर

स्रोत

रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह

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