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लिपि:
॥ श्री ॥

श्री विश्वकर्मा आरती

आरती

पाठ

प्रभु श्री विश्वकर्मा घर आवो प्रभु विश्वकर्मा॥

1

सुदामा की विनय सुनी और कंचन महल बनाये। सकल पदारथ देकर प्रभु जी दुखियों के दुख टारे॥

2

विनय करी भगवान कृष्ण ने द्वारिकापुरी बनाओ। ग्वाल बालों की रक्षा की प्रभु की लाज बचायो॥

3

रामचन्द्र ने पूजन की तब सेतु बांध रचि डारो। सब सेना को पार किया प्रभु लंका विजय करावो॥

4

श्री कृष्ण की विजय सुनो प्रभु आके दर्श दिखावो। शिल्प विद्या का दो प्रकाश मेरा जीवन सफल बनावो॥

अर्थ (हिन्दी)

  1. (टेक) हे प्रभु श्री विश्वकर्मा, हमारे घर आइए, हे प्रभु विश्वकर्मा।
  2. आपने सुदामा की विनती सुनी और सोने का महल बनाया; हे प्रभु, सब पदार्थ देकर आपने दुखियों के दुख दूर किए।
  3. भगवान कृष्ण ने विनती की कि द्वारिकापुरी बनाइए; आपने ग्वाल-बालों की रक्षा की और प्रभु की लाज बचाई।
  4. जब रामचंद्र ने (आपकी) पूजा की, तब आपने सेतु बाँधकर रच दिया; सारी सेना को पार कराया और प्रभु को लंका पर विजय दिलाई।
  5. श्री कृष्ण की विजय (का प्रसंग) सुनिए, हे प्रभु, आकर दर्शन दीजिए; शिल्प-विद्या का प्रकाश दीजिए और मेरा जीवन सफल बनाइए।

लाभ

  • कारीगरों और शिल्पियों का पाठ — "शिल्प विद्या का दो प्रकाश"।
  • नए काम, औज़ार या भवन के आरंभ पर शुभ कामना।

कब करें पाठ

विश्वकर्मा पूजा के दिन · नए औज़ार, मशीन, वाहन या भवन के आरंभ पर · कार्यशाला और कारखाने की पूजा में

स्रोत

रचयिता: अज्ञात (किसी प्रति में नाम नहीं). drikpanchang.com — श्री विश्वकर्मा आरती (आधार-पाठ) · dharmyaatra.in — श्री विश्वकर्मा जी की आरती · bhaktiras.in — विश्वकर्मा जी की आरती

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