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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री विट्ठल आरती
आरती · श्री कृष्ण
पाठ
1
जय जय विट्ठल पांडुरंगा, रुक्मिणी-वल्लभ रंगा। पंढरी में विराजे, भक्त-वत्सल संगा॥
2
कर कटि पर धरे हो, विटे पर असवारी। श्याम-वरण तन सोहे, छवि अति प्यारी॥
3
पुण्डलिक के भक्तिवश, धरा रूप विठोबा। "विठ्ठल-विठ्ठल" गूँजे, हरि नाम मनोहर शोभा॥
4
वारकरी जन गाते, अभंग-नाम-धारा। भक्तन के दुख हरते, करते भव-पारा॥
5
विट्ठल जी की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। नाम-भक्ति रस पावे, हरि-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे विट्ठल पांडुरंग, हे रुक्मिणी-वल्लभ, आपकी जय हो! पंढरपुर में विराजमान आप भक्त-वत्सल (भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले) हैं।
- आप दोनों हाथ कमर पर रखे ईंट (विटा) पर खड़े हैं; श्याम वर्ण का तन सुशोभित है और आपकी छवि अति प्यारी है।
- भक्त पुण्डलिक की भक्ति के वश होकर आपने विठोबा रूप धारण किया; "विठ्ठल-विठ्ठल" का मनोहर हरि-नाम सर्वत्र गूँजता है।
- वारकरी भक्त अभंग व नाम की धारा गाते हैं; आप भक्तों के दुःख हरते हैं और उन्हें भवसागर से पार करते हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से विट्ठल जी की यह आरती गाता है, वह नाम-भक्ति का रस तथा हरि (कृष्ण) की कृपा प्राप्त करता है।
लाभ
- भक्ति, नाम-स्मरण व मन की प्रसन्नता बढ़ती है।
- भय व संकट दूर होकर सुख-शांति आती है।
- श्रीकृष्ण/विष्णु की कृपा व आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
आषाढ़ी व कार्तिकी एकादशी (वारी) पर · नित्य संध्या में · गुरुवार व एकादशी को
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
