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लिपि:
॥ श्री ॥
श्री यमुना जी आरती
आरती
पाठ
1
जय जय यमुना माता, मैया जय जय यमुना माता। सूरज की तुम बेटी, श्याम की तुम प्यारी॥
2
श्याम-वरण जल पावन, कल-कल बहती धारा। वृन्दावन की शोभा, मथुरा की तुम न्यारा॥
3
कृष्ण-लीला की साक्षी, तट पर रास रचाया। जो नहाये तेरे जल में, पाप-ताप सब हाया॥
4
यम-भय हरने वाली, भक्तन सुख देती। श्रद्धा से जो पूजे, मनवांछित देती॥
5
यमुना माँ की आरती, जो जन श्रद्धा गावे। पाप-ताप सब मिटते, कृष्ण-कृपा पावे॥
अर्थ (हिन्दी)
- हे यमुना माता, आपकी जय हो! आप सूर्य की पुत्री तथा श्याम (कृष्ण) की प्यारी हैं।
- श्याम वर्ण का पवित्र जल, कल-कल बहती आपकी धारा; आप वृन्दावन की शोभा व मथुरा की अद्वितीय (शान) हैं।
- आप कृष्ण-लीला की साक्षी हैं, आपके तट पर रास रचाया गया; जो आपके जल में स्नान करता है, उसके समस्त पाप-ताप मिट जाते हैं।
- आप यम (मृत्यु) के भय को हरने वाली व भक्तों को सुख देने वाली हैं; जो श्रद्धा से आपको पूजता है, उसे मनोवांछित फल देती हैं।
- जो भक्त श्रद्धा से यमुना माँ की यह आरती गाता है, उसके समस्त पाप-ताप मिट जाते हैं और उसे श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
लाभ
- पापों का नाश होकर मन पवित्र होता है।
- श्रीकृष्ण-भक्ति व आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है।
- मन को शांति व सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
कब करें पाठ
यमुना-तट पर संध्या-आरती में · यमुना छठ व कार्तिक मास में · प्रातः व संध्या स्नान के समय
स्रोत
रचयिता: पारंपरिक. पारंपरिक हिन्दू आरती संग्रह
