योगिनी एकादशी
पाठ
व्रत कथा
हेममाली को श्राप
अलकापुरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। हेममाली नामक यक्ष प्रतिदिन मानसरोवर से पुष्प लाकर कुबेर की शिव-पूजा हेतु देता था। एक दिन अपनी पत्नी विशालाक्षी के प्रेम में मग्न होकर हेममाली समय पर पुष्प न पहुँचा सका।
पूजा में विलंब से क्रुद्ध होकर कुबेर ने उसे श्राप दिया कि वह पत्नी-वियोग सहे और मृत्युलोक में कोढ़ी होकर जीवन बिताए। हेममाली कुष्ठ-रोग से पीड़ित होकर धरती पर भटकने लगा।
ऋषि मार्कण्डेय व व्रत से मुक्ति
भटकते हुए हेममाली महर्षि मार्कण्डेय के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने उसकी दशा देखकर उसे आषाढ़ कृष्ण की योगिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने की प्रेरणा दी।
हेममाली ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से वह कुष्ठ-रोग व श्राप से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य यक्ष-रूप में आ गया और अपनी पत्नी से पुनर्मिलन हुआ।
लाभ
- समस्त पापों का नाश
- रोग व श्राप से मुक्ति
- कथा-श्रवण से अठासी हज़ार ब्राह्मण-भोजन तुल्य पुण्य; अंत में मोक्ष
स्रोत
योगिनी एकादशी माहात्म्य — यक्ष हेममाली व ऋषि मार्कण्डेय प्रसंग · एकादशी माहात्म्य परंपरा
