आध्यात्मिक उन्नति साधना
1. आरंभिक प्रार्थना — ॐ गं गणपतये नमः
11 बार।
ॐ गं गणपतये नमः॥
2. मंत्र — गायत्री मंत्र
11 बार — तेज व ज्ञान हेतु।
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
3. मंत्र — ॐ नमः शिवाय
21 बार — ध्यान सहित।
ॐ नमः शिवाय॥
4. स्तोत्र — आदित्य हृदयम्
आदित्य हृदय पाठ।
ततो युद्ध परिश्रान्तं समरे चिन्तयास्थितम्। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्। उपागम्याब्रवीद्रामं अगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्। येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रु-विनाशनम्। जयावहं जपेन्नित्यं अक्षय्यं परमं शिवम्॥
सर्वमङ्गल-माङ्गल्यं सर्वपाप-प्रणाशनम्। चिन्ताशोक-प्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुर नमस्कृतम्। पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः। एष देवासुर-गणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः। वायुर्वह्निः प्रजाप्राणः ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। सुवर्णसदृशो भानुः हिरण्यरेता दिवाकरः॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्ति-र्मरीचिमान्। तिमिरोन्मथनः शम्भुः त्वष्टा मार्ताण्डकोंऽशुमान्॥
हिरण्यगर्भः शिशिरः तपनो भास्करो रविः। अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥
व्योमनाथ-स्तमोभेदी ऋग्यजुःसाम-पारगः। घनावृष्टिरपां मित्रः विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः। कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥
नक्षत्र ग्रह ताराणां अधिपो विश्वभावनः। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्म-न्नमोऽस्तु ते॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः। नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः। नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्य-वर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्ना-यामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥
तप्त चामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे। नम-स्तमोऽभिनिघ्नाय रवये लोकसाक्षिणे॥
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः। एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥
एन-मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावशीदति राघव॥
पूजयस्वैन-मेकाग्रः देवदेवं जगत्पतिम्। एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि। एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजाः नष्टशोकोऽभवत्तदा। धारयामास सुप्रीतः राघवः प्रयतात्मवान्॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्। त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्। सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः। निशिचरपति सङ्क्षयं विदित्वा सुरगण मध्यगतो वचस्त्वरेति॥
5. चालीसा — श्री हनुमान चालीसा
भक्ति-भाव से पाठ।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाए। श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
6. समापन चिंतन
कुछ मिनट मौन ध्यान में बैठें। श्वास पर ध्यान केंद्रित करें और भीतर की शांति का अनुभव करें।
