यह सूची कैसे बनी
चार धाम या अष्टविनायक की तरह इसकी कोई शास्त्रीय निर्धारित सूची नहीं है। यह चयन है, और उसका आधार यहाँ खुला रखा गया है — एक मंदिर तभी इस सूची में है जब वह तीनों कसौटियों पर खरा उतरे:
- अखिल-भारतीय मान्यता — केवल क्षेत्रीय प्रसिद्धि पर्याप्त नहीं
- विशिष्ट स्वरूप अथवा परंपरा दर्ज — कोई एक बात जो केवल उसी मंदिर की हो
- क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व — सूची किसी एक अंचल में सिमटे नहीं
ये नौ मंदिर देश के अलग-अलग कोनों में हैं — मथुरा से उडुपी तक, द्वारका से पुरी तक। इन्हें किसी एक परंपरा ने एक साथ नहीं गिनाया; यह चयन है, और उसका आधार ऊपर लिखा है।
एक ही कृष्ण, नौ अलग रूप
इन मंदिरों को एक साथ देखने पर सबसे पहले यही दिखता है कि कृष्ण यहाँ एक जैसे नहीं हैं।
मथुरा में वे नवजात हैं — कारागार की उसी कोठरी में जहाँ अवतरण हुआ। गुरुवायूर में वे बालगोपाल हैं। नाथद्वारा में वे गोवर्धन उठाए खड़े हैं, बायाँ हाथ ऊपर और दायाँ कमर पर। पंढरपुर में वे ईंट पर खड़े हैं, दोनों हाथ कमर पर टिके। पुरी में उनका स्वरूप ऐसा है जो किसी और मंदिर में नहीं मिलता — काष्ठ-विग्रह, बलभद्र व सुभद्रा के साथ।
द्वारका में वे राजा हैं, वृंदावन में किशोर, और उडुपी में उनका विग्रह पश्चिम की ओर मुख किए है — शेष भारत की परंपरा से उल्टा।
दर्शन की अपनी-अपनी रीति
रूप ही नहीं, दर्शन की विधि भी इन मंदिरों में अलग-अलग है — और यही इनकी सबसे रोचक बात है।
वृंदावन के बाँके बिहारी में पर्दा हर कुछ क्षण में खुलता और बंद होता रहता है; पूरा दर्शन एक साथ नहीं होता, केवल झलक मिलती है। उडुपी में दर्शन मुख्य द्वार से नहीं, कनकन किंडि नामक एक छोटी चाँदी-मढ़ी खिड़की से होता है। पुरी में वर्ष में एक बार भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर रथ पर आते हैं।
परंपरा ने यहाँ केवल यह तय नहीं किया कि कृष्ण कैसे दिखेंगे — यह भी तय किया कि भक्त उन्हें कैसे देखेगा।
प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर — पूरी सूची
| # | मंदिर | स्थान | विवरण |
|---|---|---|---|
| 1 | श्रीकृष्ण जन्मस्थान | मथुरा, उत्तर प्रदेश | परंपरा के अनुसार अवतरण-स्थल; कारागार-कक्ष आज भी गर्भगृह के रूप में |
| 2 | बाँके बिहारी मंदिर | वृंदावन, उत्तर प्रदेश | 1864; स्वामी हरिदास परंपरा — पर्दा कुछ-कुछ क्षण में खुलता-बंद होता है, पूर्ण दर्शन नहीं, केवल झलक |
| 3 | गोवर्धन (गिरिराज जी) | मथुरा, उत्तर प्रदेश | गोवर्धन-धारण लीला का स्थल; यहाँ पर्वत की ही परिक्रमा होती है, किसी विग्रह की नहीं |
| 4 | द्वारकाधीश मंदिर | देवभूमि द्वारका, गुजरात | चार धाम का पश्चिमी धाम; कृष्ण यहाँ राजा-स्वरूप में |
| 5 | श्रीनाथजी मंदिर | नाथद्वारा, राजस्थान | वि.सं. 1728 (1672 ई.) में प्रतिष्ठा; विग्रह ब्रज से लाया गया, एकाश्म श्याम शिला — बायाँ हाथ गोवर्धन उठाए |
| 6 | श्रीजगन्नाथ मंदिर | पुरी, ओडिशा | चार धाम का पूर्वी धाम; काष्ठ-विग्रह तथा वार्षिक रथयात्रा — दोनों अन्यत्र नहीं |
| 7 | गुरुवायूर मंदिर | त्रिशूर, केरल | केरल का प्रमुखतम वैष्णव मंदिर; गुरुवायूरप्पन बालगोपाल स्वरूप में; कृष्णनाट्टम् परंपरा यहीं की |
| 8 | श्रीकृष्ण मठ | उडुपी, कर्नाटक | मध्वाचार्य द्वारा स्थापित; विग्रह पश्चिम-मुखी और दर्शन "कनकन किंडि" नामक खिड़की से होता है |
| 9 | श्रीविट्ठल मंदिर | पंढरपुर, महाराष्ट्र | भक्त पुंडलिक की फेंकी ईंट पर खड़े विट्ठल, दोनों हाथ कमर पर; वारकरी संप्रदाय का केंद्र |
सूची का स्रोत: सम्पादकीय चयन, मानदंड सहित। सदस्यों के `why` के स्रोत — नाथद्वारा: प्रतिष्ठा वि.सं. 1728 / 20 फरवरी 1672 व ब्रज से विग्रह-आगमन (हिंदी विकिपीडिया व नाथद्वारा-केंद्रित स्रोत); बाँके बिहारी: 1864, स्वामी हरिदास व पर्दा-दर्शन (हिंदी विकिपीडिया, भारतकोश); उडुपी: मध्वाचार्य द्वारा स्थापना, पश्चिम-मुखी विग्रह व कनकन किंडि; गुरुवायूर: केरल पर्यटन व हिंदी विकिपीडिया (गुरुवायूरप्पन बालगोपाल, कृष्णनाट्टम्); पंढरपुर: पुंडलिक-कथा व ईंट पर स्थित मुद्रा (हिंदी विकिपीडिया — विट्ठल)। मथुरा, द्वारकाधीश व जगन्नाथ पुरी के दावे उनके अपने record से हैं।
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