मथुरा

Mathura

सप्त पुरी की दूसरी पुरी — यमुना के तट पर वह नगर जिसे परंपरा कृष्ण की जन्मभूमि मानती है, और जो ब्रजभूमि का हृदय है।

यह स्थान इनमें भी है:सप्त पुरी108 दिव्य देशम

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

गरुड़ पुराण के श्लोक में दूसरा नाम **मथुरा** है। यह नगर यमुना के तट पर बसा है और परंपरा इसे भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मानती है।

कृष्ण का जन्म यहाँ कारागार में हुआ था — यह कथा का वह हिस्सा है जो इस नगर को अलग बनाता है। भारत के प्रमुख तीर्थों में यह अकेला है जहाँ का सबसे पवित्र स्थान एक कारागार माना जाता है। कृष्ण जन्मस्थान मंदिर परिसर आज उसी स्थान पर है।

मथुरा **ब्रजभूमि का हृदय** है। वृंदावन इससे लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर है और दोनों को जुड़वाँ नगर कहा जाता है — पर वे दो अलग नगर हैं। **सप्त पुरी में मथुरा है, वृंदावन नहीं**, यद्यपि यात्री प्रायः दोनों एक साथ करते हैं।

नगर की एक और पहचान है जो धार्मिक नहीं। छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक मथुरा **सूरसेन जनपद की राजधानी** बन चुका था, और कुषाण काल में यहाँ की मूर्तिकला अपने शिखर पर पहुँची — वह शैली आज भी "मथुरा कला" के नाम से जानी जाती है और विश्व भर के संग्रहालयों में उसकी मूर्तियाँ हैं।

जन्माष्टमी यहाँ का सबसे बड़ा पर्व है, जिसमें लगभग तीस से पैंतीस लाख लोग आते हैं। होली की ब्रज-परंपरा भी यहीं की है।

  • सप्त पुरी की दूसरी पुरी; परंपरा में कृष्ण की जन्मभूमि।
  • प्रमुख तीर्थों में अकेला जहाँ सबसे पवित्र स्थान एक कारागार माना जाता है।
  • ब्रजभूमि का हृदय; वृंदावन लगभग 15 किमी दूर — दोनों जुड़वाँ नगर कहे जाते हैं।
  • छठी शताब्दी ई.पू. तक सूरसेन जनपद की राजधानी।
  • कुषाण काल की "मथुरा कला" — भारतीय मूर्तिकला की एक स्वतंत्र शैली।
  • जन्माष्टमी पर लगभग 30 से 35 लाख श्रद्धालु आते हैं।

पौराणिक कथा

मथुरा की कथा एक भविष्यवाणी से शुरू होती है, और उस भविष्यवाणी को टालने के प्रयास से।

कारागार में जन्म

कंस को बताया गया था कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनकी संतानों को एक-एक कर मार डाला।

आठवें की रात कारागार के पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं, द्वार अपने आप खुल गए। वसुदेव नवजात कृष्ण को टोकरी में लेकर उफनती यमुना पार कर गए और गोकुल में नंद के घर छोड़ आए।

कथा में जो बात रह जाती है वह यह है कि कंस ने सब कुछ किया — कारागार, पहरा, बेड़ियाँ — और फिर भी वह नहीं रोक सका जो होना था। जिस चीज़ से हम सबसे अधिक डरते हैं, उसे रोकने के हमारे प्रयास ही प्रायः उसका रास्ता बना देते हैं।

लौटकर आना

कृष्ण गोकुल और वृंदावन में बड़े हुए, और बहुत वर्षों बाद मथुरा लौटे — कंस का वध करने।

विश्राम घाट का नाम इसी से जुड़ा है। परंपरा कहती है कि कंस-वध के बाद कृष्ण ने यहीं विश्राम किया था।

पर मथुरा की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। आगे जरासंध के आक्रमणों के कारण उन्होंने यह नगर छोड़ दिया और द्वारका चले गए। यानी जिस नगर में वे जन्मे, वहाँ वे रहे नहीं।

सप्त पुरी में मथुरा और द्वारका दोनों हैं — एक जहाँ वे आए, एक जहाँ वे गए। परंपरा ने दोनों को समान रूप से पवित्र माना, आने को भी और जाने को भी।

स्रोत: भागवत पुराण की कृष्ण-कथा की प्रचलित परंपरा; तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Mathura से

इतिहास

मथुरा का इतिहास केवल धार्मिक नहीं — वह कला और राजनीति का भी केंद्र रहा।

सूरसेन की राजधानी

छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक मथुरा सूरसेन जनपद की राजधानी बन चुका था। यह उन प्राचीन महाजनपदों में से एक था जिनका उल्लेख बौद्ध व जैन ग्रंथों में मिलता है।

मथुरा कला-शैली

कुषाण काल में मथुरा की कला और संस्कृति अपने शिखर पर पहुँची। यहाँ की लाल बलुआ पत्थर की मूर्तियाँ एक स्वतंत्र शैली बन गईं, जिसे आज "मथुरा कला" कहा जाता है।

यह शैली गांधार शैली के समानांतर विकसित हुई, पर उससे भिन्न रही। मथुरा संग्रहालय में इस काल की मूर्तियों का बड़ा संग्रह है, और यह नगर का एक ऐसा पक्ष है जिसे तीर्थयात्री प्रायः छोड़ देते हैं।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Mathura — 2026-08-04 को देखा गया

छठी शताब्दी ई.पू.
मथुरा सूरसेन जनपद की राजधानी बना।
कुषाण काल
मथुरा कला-शैली अपने शिखर पर।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली · 162 किमी
निकटतम रेलवे स्टेशन: मथुरा जंक्शन

हवाई मार्ग

इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, दिल्ली — लगभग 162 किमी

दिल्ली से मथुरा लगभग 162 किमी दक्षिण-पूर्व में है; सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे। आगरा का हवाई अड्डा भी एक विकल्प है।

रेल मार्ग

मथुरा जंक्शन

दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग पर; देश के लगभग हर बड़े नगर से गाड़ियाँ आती हैं।

सड़क मार्ग

मथुरा

यमुना एक्सप्रेसवे से दिल्ली व आगरा दोनों सुगमता से जुड़े हैं।

अंतिम चरण: नगर के भीतर प्रमुख स्थल ऑटो व ई-रिक्शा से पहुँच में हैं। वृंदावन के लिए नियमित साझा वाहन मिलते हैं।

सुगमता: नगर समतल है और घूमने में सुगम। विश्राम घाट तक जाने के लिए सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब मौसम अनुकूल रहता है। जन्माष्टमी (अगस्त-सितंबर) और होली (फाल्गुन, मार्च) पर यहाँ का उत्सव विशेष है — ब्रज की होली विश्व-प्रसिद्ध है — पर तब भीड़ बहुत रहती है और ठहरने की व्यवस्था महीनों पहले करनी पड़ती है।

प्रमुख त्योहार

  • जन्माष्टमी
  • होली (ब्रज की होली)
  • गोवर्धन पूजा

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कृष्ण जन्मस्थान मंदिर परिसर — परंपरा के अनुसार कृष्ण का जन्म-स्थान।
  • द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा — नगर के सबसे बड़े मंदिरों में। ⚠️ यह गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर से भिन्न है — नाम एक है, स्थान अलग।
  • विश्राम घाट — यमुना के तट पर; परंपरा कहती है कि कंस-वध के बाद कृष्ण ने यहीं विश्राम किया।
  • वृंदावन (लगभग 15 किमी) — जुड़वाँ नगर; बाँके बिहारी व इस्कॉन मंदिर वहीं हैं। ध्यान रहे — सप्त पुरी में मथुरा है, वृंदावन नहीं।
  • मथुरा संग्रहालय — कुषाण काल की मथुरा कला-शैली की मूर्तियों का बड़ा संग्रह।
  • गोवर्धन — परिक्रमा के लिए प्रसिद्ध; ब्रज-यात्रा का प्रमुख पड़ाव।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र। कृष्ण जन्मस्थान परिसर में सुरक्षा-जाँच कड़ी है और मोबाइल व अन्य वस्तुएँ भीतर ले जाने की अनुमति नहीं — उन्हें बाहर जमा करना होता है।

ठहरने की व्यवस्था: मथुरा और वृंदावन दोनों में धर्मशालाओं से लेकर होटलों तक व्यवस्था है। जन्माष्टमी व होली के समय बुकिंग महीनों पहले करनी पड़ती है।

एक नज़र में

प्रकारनगर
स्थानमथुरा
ज़िलामथुरा
राज्यउत्तर प्रदेश

मथुरा — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न