तिरुच्चेरै

Saranatha Perumal Temple, Thirucherai

वह दिव्य देशम जहाँ विष्णु के साथ एक नहीं, पाँच देवियाँ विराजती हैं — और जिसकी मिट्टी से ब्रह्मा ने वेद बचाए थे।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
सारनाथ पेरुमाल (पंचलक्ष्मी नाथन्)
थायार
सारनायकी — तथा श्रीदेवी, भूमिदेवी, नीलादेवी व महालक्ष्मी
तीर्थम्
सार पुष्करिणी (सार तीर्थम्)
विमानम्
सार विमानम्

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुच्चेरै तमिलनाडु के तंजावुर ज़िले में, कुंभकोणम् के निकट है। यहाँ विष्णु **सारनाथ पेरुमाल** रूप में विराजते हैं।

**यहाँ की पहली असाधारण बात देवियों की संख्या है।**

अधिकांश विष्णु मंदिरों में एक थायार होती हैं, कहीं-कहीं दो। **यहाँ पाँच हैं** — **श्रीदेवी, भूमिदेवी, नीलादेवी, महालक्ष्मी और सारनायकी**।

इसीलिए यहाँ के भगवान **पंचलक्ष्मी नाथन्** कहलाते हैं, और उनकी मुद्रा **पद्म हस्तम्** है। स्थल-स्रोत कहते हैं कि 108 में यह अकेला ऐसा मंदिर है — यह दावा परंपरा का है और हम इसे उसी रूप में दर्ज कर रहे हैं।

**दूसरी बात नाम की है।** यह **पंच सार क्षेत्रों** में गिना जाता है, क्योंकि यहाँ पाँच चीज़ों के नाम में "सार" आता है: **सारनाथन्** (भगवान), **सारनायकी** (देवी), **सार विमानम्** (विमान), **सार तीर्थम्** (तीर्थ) और **सार क्षेत्रम्** (क्षेत्र)।

**तीसरी बात कथा की है, और वह प्रलय तक जाती है।**

परंपरा कहती है कि जब युग के अंत का समय आया, ब्रह्मा चिंतित हुए — सृष्टि के उपकरण और **समस्त वेद** कहाँ सुरक्षित रखे जाएँ?

विष्णु ने कहा कि उन्हें एक दृढ़ मिट्टी के घड़े में रखो।

ब्रह्मा ने अनेक स्थानों की मिट्टी आज़माई। कोई काम न आई। अंततः **तिरुच्चेरै की मिट्टी** से घड़ा बना — और वेद बच गए।

मंदिर का **राजगोपुरम् 120 फ़ुट** ऊँचा है, तीर्थ **सार पुष्करिणी** कहलाता है, और यहाँ का **रथोत्सव मकर पुष्य** पर होता है।

  • विष्णु के साथ पाँच देवियाँ — श्रीदेवी, भूमिदेवी, नीलादेवी, महालक्ष्मी व सारनायकी।
  • भगवान पंचलक्ष्मी नाथन् कहलाते हैं; मुद्रा पद्म हस्तम्।
  • पंच सार क्षेत्र — सारनाथन्, सारनायकी, सार विमानम्, सार तीर्थम्, सार क्षेत्रम्।
  • परंपरा: प्रलय के समय ब्रह्मा ने यहीं की मिट्टी के घड़े में वेद सुरक्षित रखे।
  • 120 फ़ुट ऊँचा राजगोपुरम्; मकर पुष्य पर रथोत्सव।

पौराणिक कथा

यहाँ की कथा किसी युद्ध या वरदान की नहीं — यह इस बात की है कि प्रलय में वेद कहाँ रखे गए।

ब्रह्मा का घड़ा

परंपरा कहती है कि जब युग के अंत का समय आया, ब्रह्मा चिंतित हो उठे।

प्रलय में सब कुछ डूब जाएगा। पर सृष्टि के उपकरण और **समस्त वेद** — वे कहाँ रखे जाएँ, कि बच जाएँ?

उन्होंने विष्णु से पूछा। विष्णु ने कहा कि उन्हें एक दृढ़ मिट्टी के घड़े में रख दो।

ब्रह्मा ने अनेक स्थानों की मिट्टी लेकर देखी। कोई इतनी दृढ़ न निकली कि प्रलय सह सके।

अंत में उन्होंने **तिरुच्चेरै की मिट्टी** ली।

उसी से घड़ा बना, और वेद बच गए।

दो घड़े, एक क्षेत्र

यह कथा अकेली नहीं है, और यही ध्यान देने योग्य है।

पास ही **कुंभकोणम्** है — और उस नाम का अर्थ ही है *घड़े का कोना*। उस नगर की अपनी कथा भी प्रलय के एक घड़े की है।

यानी इस पूरे क्षेत्र की स्मृति में एक घड़ा है, जिसमें प्रलय के पार ले जाने योग्य चीज़ें रखी गईं।

और जो चीज़ बचाई जा रही है, वह ध्यान देने योग्य है। सोना नहीं, राज्य नहीं, कोई अस्त्र नहीं।

**वेद बचाए जा रहे हैं** — यानी शब्द, ज्ञान, वह जो कहा और याद रखा गया।

परंपरा यह मानती है कि जब सब कुछ डूब जाएगा, तब भी बचाने योग्य यही है। और उसे बचाने के लिए कोई दिव्य पात्र नहीं चाहिए था — एक गाँव की मिट्टी काफ़ी थी।

पाँच देवियाँ

यहाँ विष्णु अकेले नहीं हैं, और दो के साथ भी नहीं।

**पाँच देवियाँ** उनके साथ हैं — श्रीदेवी, भूमिदेवी, नीलादेवी, महालक्ष्मी और सारनायकी। इसीलिए वे **पंचलक्ष्मी नाथन्** कहलाते हैं।

अधिकांश दिव्य देशम में एक थायार होती हैं। तिरुनांगूर के **तिरु कवलंपाडि** में दो थीं — रुक्मिणी और सत्यभामा — और वही उल्लेखनीय माना गया।

यहाँ पाँच हैं।

स्थल-स्रोत कहते हैं कि 108 में यह अकेला ऐसा मंदिर है। दावा परंपरा का है; हम इसे उसी रूप में रख रहे हैं।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण संबद्ध स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर कुंभकोणम् के पास है और क्षेत्र के अन्य दिव्य देशम के साथ किया जा सकता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।

रेल मार्ग

कुंभकोणम् रेलवे स्टेशन

वहाँ से तिरुच्चेरै सड़क मार्ग से पास है।

सड़क मार्ग

तिरुच्चेरै

कुंभकोणम् से स्थानीय बस व ऑटो उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। मकर पुष्य (जनवरी) का रथोत्सव यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है।

प्रमुख त्योहार

  • रथोत्सव (मकर पुष्य, जनवरी)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कुंभकोणम् के दिव्य देशम — तिरुक्कुडंतै, तिरु विण्णगर, तिरुनारायूर।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प कुंभकोणम् में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री सारनाथ पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुच्चेरै, कुंभकोणम् के निकट
ज़िलातंजावुर
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुच्चेरै — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न