अष्टभुजाकरम्

Ashta Bhuja Perumal Temple, Kanchipuram

वह मंदिर जहाँ विष्णु आठ भुजाओं के साथ विराजते हैं — और आठों में अलग-अलग आयुध हैं।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
अष्ट भुज पेरुमाल
थायार
अलमेलुमंगै

मंगलाशासनम्: पासुरम्पेयाळ्वार व तिरुमंगै आळ्वार (एक-एक पद)

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

अष्टभुजाकरम् कांचीपुरम् के 15 दिव्य देशम में से एक है। नाम का अर्थ ही उसका परिचय है — **अष्ट भुजा**, यानी आठ भुजाएँ।

यहाँ विष्णु **अष्ट भुज पेरुमाल** रूप में विराजते हैं, देवी **अलमेलुमंगै** के साथ। आठों हाथों में अलग-अलग आयुध हैं: **खड्ग, ढाल, गदा, धनुष, बाण, कमल, शंख और चक्र।**

विष्णु की प्रतिमाएँ प्रायः चार भुजाओं वाली होती हैं। आठ भुजाओं वाला रूप दुर्लभ है, और वह किसी विशेष प्रसंग से जुड़ा होता है — यहाँ भी वैसा ही है।

यह मंदिर तिरु पाडगम् के ठीक उलट खड़ा है, और दोनों एक ही नगर में हैं। वहाँ कृष्ण की **दो** भुजाएँ हैं, क्योंकि वे मनुष्य रूप में गए थे। यहाँ **आठ**, क्योंकि यहाँ उन्हें युद्ध करना था।

पेयाळ्वार और तिरुमंगै आळ्वार ने एक-एक पद में इसका मंगलाशासनम् किया।

  • विष्णु यहाँ आठ भुजाओं के साथ — यह रूप दुर्लभ है; प्रतिमाएँ प्रायः चार भुजाओं वाली होती हैं।
  • आठों हाथों में अलग आयुध — खड्ग, ढाल, गदा, धनुष, बाण, कमल, शंख व चक्र।
  • कांचीपुरम् में ही तिरु पाडगम् है, जहाँ कृष्ण की केवल दो भुजाएँ हैं — दोनों का विरोध उल्लेखनीय है।
  • पेयाळ्वार व तिरुमंगै आळ्वार ने एक-एक पद में मंगलाशासनम् किया।

पौराणिक कथा

इस मंदिर की कथा एक विवाद से शुरू होती है — और वह विवाद देवियों के बीच का है।

ब्रह्मा का अश्वमेध

परंपरा कहती है कि सरस्वती और लक्ष्मी के बीच श्रेष्ठता का विवाद हुआ। इंद्र और ब्रह्मा दोनों ने लक्ष्मी के पक्ष में निर्णय दिया।

सरस्वती उस निर्णय से अप्रसन्न हुईं और ब्रह्मा से दूर रहने लगीं।

ब्रह्मा ने विष्णु की कठोर तपस्या की और यहीं **अश्वमेध यज्ञ** किया।

नदी बनकर आना

सरस्वती ने वह यज्ञ भंग करने के लिए **वेगवती नदी** का रूप धरकर उसे बहा देना चाहा।

तब विष्णु ने **अष्ट भुज पेरुमाल** का रूप लिया — आठ भुजाओं में आठ आयुध लिए — और यज्ञ की रक्षा की।

नाम वहीं से आया, और प्रतिमा आज भी उसी रूप में है।

यह कथा कांचीपुरम् के भूगोल से भी जुड़ती है। वेगवती इसी नगर की नदी है, और उसी से जुड़ी एक और कथा एकाम्बरेश्वर मंदिर में मिलती है, जहाँ पार्वती ने बाढ़ से रेत का शिवलिंग बचाया था। एक ही नदी, दो मंदिर, दो कथाएँ — और दोनों में जल को रोका जाता है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Ashtabujakaram से

इतिहास

चोल-कालीन शिलालेख

यहाँ राजेंद्र चोल (1018–54 ई.) और कुलोत्तुंग चोल प्रथम (1070–1120 ई.) के काल के शिलालेख मिलते हैं।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Ashtabujakaram — 2026-08-05 को देखा गया

1018–54 ई.
राजेंद्र चोल के काल के शिलालेख।
1070–1120 ई.
कुलोत्तुंग चोल प्रथम के काल के शिलालेख।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं, बीच में विराम रहता है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: कांचीपुरम् रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

चेन्नै से कांचीपुरम् लगभग 72 किमी।

रेल मार्ग

कांचीपुरम् रेलवे स्टेशन

चेन्नै से नियमित गाड़ियाँ।

सड़क मार्ग

कांचीपुरम्

नगर के भीतर।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब तमिलनाडु में मौसम सबसे अनुकूल रहता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: कांचीपुरम् में साधारण होटल उपलब्ध हैं; अधिक विकल्प चेन्नै में मिलते हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री अष्ट भुज पेरुमाल मंदिर
स्थानकांचीपुरम्
ज़िलाकांचीपुरम्
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

अष्टभुजाकरम् — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न