सालासर बालाजी

Salasar Balaji Temple

राजस्थान का वह मंदिर जहाँ हनुमान दाढ़ी और मूँछ के साथ विराजते हैं — और जहाँ प्रसाद में चूरमा चढ़ता है।

यह स्थान इनमें भी है:प्रसिद्ध हनुमान मंदिर

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

सालासर बालाजी राजस्थान के चूरू ज़िले में, सुजानगढ़ के निकट, जयपुर-बीकानेर मार्ग पर है।

यहाँ की प्रतिमा की सबसे विशिष्ट बात यह है कि **हनुमान दाढ़ी और मूँछ के साथ दर्शाए गए हैं।** यह स्वरूप अन्यत्र दुर्लभ है।

इसका कारण क्या है, यह किसी स्रोत में स्पष्ट नहीं मिला — और इसलिए यह पृष्ठ केवल यह कहता है कि स्वरूप ऐसा है। कारण के नाम पर कुछ गढ़ना इस स्थान के साथ अन्याय होता।

मंदिर की स्थापना लगभग **1754** में मानी जाती है; सन् 2022 में यहाँ 268वाँ स्थापना-दिवस मनाया गया था।

प्रसाद की परंपरा भी असामान्य है और उसकी जड़ मंदिर की कथा में ही है — यहाँ **चूरमा** चढ़ाया जाता है, बाजरे से बना वह व्यंजन जो राजस्थान के खेतों का रोज़ का भोजन रहा है।

हर वर्ष दो बड़े मेले लगते हैं — **चैत्र** (मार्च-अप्रैल) और **आश्विन** (सितंबर-अक्टूबर) में।

  • हनुमान यहाँ दाढ़ी व मूँछ के साथ दर्शाए गए हैं — अन्यत्र दुर्लभ स्वरूप।
  • स्थापना लगभग 1754; 2022 में 268वाँ स्थापना-दिवस मनाया गया।
  • प्रसाद में चूरमा — बाजरे से बना व्यंजन; परंपरा कथा से ही निकली है।
  • हर वर्ष दो बड़े मेले — चैत्र व आश्विन में।
  • जयपुर-बीकानेर मार्ग पर, सुजानगढ़ के निकट।

पौराणिक कथा

सालासर की कथा खेत में चलते एक हल से शुरू होती है, और उसमें प्रसाद की परंपरा भी उसी क्षण बन जाती है।

हल का रुक जाना

कथा कहती है कि आसोटा गाँव में एक गिंठाला किसान खेत जोत रहा था। हल किसी वस्तु से टकराकर रुक गया।

खोदने पर वहाँ हनुमान की एक प्रतिमा निकली।

उसी समय किसान की पत्नी उसके लिए भोजन लेकर आई — और उसमें चूरमा था। किसान ने वही प्रतिमा को अर्पित कर दिया।

यह प्रसंग आज तक चला आ रहा है। सालासर में प्रसाद के रूप में चूरमा ही चढ़ता है, और वह किसी शास्त्रीय विधान से नहीं — एक किसान के दोपहर के भोजन से आया है। जो पास था वही चढ़ा दिया गया, और परंपरा ने उसे रख लिया।

मोहनदास का स्वप्न

कथा आगे कहती है कि सालासर निवासी मोहनदास को स्वप्न में आदेश मिला कि वे उस प्रतिमा को आसोटा से लाकर सालासर में स्थापित करें।

वैसा ही हुआ, और मंदिर वहीं बना जहाँ आज है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Salasar_Balaji से सत्यापित

इतिहास

आयु

मंदिर की स्थापना लगभग सन् 1754 में मानी जाती है — सन् 2022 में यहाँ 268वाँ स्थापना-दिवस मनाया गया था, और उसी से यह गणना निकलती है।

स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Salasar_Balaji — 2026-08-04 को देखा गया

लगभग 1754 ई.
मंदिर की स्थापना (2022 के 268वें स्थापना-दिवस से गणना)।

दर्शन का समय

सालासर बालाजी के लिए कोई आधिकारिक दर्शन-समय या आरती-तालिका सत्यापित स्रोत पर उपलब्ध नहीं मिली।

मंदिर प्रातःकाल से रात्रि तक दर्शन हेतु खुला रहता है। मेलों के दिनों में — चैत्र व आश्विन में — यहाँ लाखों लोग आते हैं और पूरी व्यवस्था बदल जाती है। मंगलवार व शनिवार को भी भीड़ अधिक रहती है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: जयपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: सुजानगढ़ रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

जयपुर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

जयपुर से सालासर तक सड़क मार्ग से लगभग चार घंटे।

रेल मार्ग

सुजानगढ़ रेलवे स्टेशन

सुजानगढ़ से सालासर पास ही है। जयपुर व बीकानेर भी विकल्प हैं।

सड़क मार्ग

सालासर

जयपुर-बीकानेर मार्ग पर; दोनों नगरों से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं। मेलों के समय भीड़ बहुत रहती है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब राजस्थान में मौसम अनुकूल रहता है; ग्रीष्म में यहाँ अत्यधिक गर्मी पड़ती है। चैत्र व आश्विन के मेलों में यहाँ लाखों लोग आते हैं — वह अनुभव विशेष है, पर ठहरने की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती है।

प्रमुख त्योहार

  • चैत्र मेला
  • आश्विन मेला
  • हनुमान जयंती

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

प्रसाद: चूरमा — बाजरे से बना व्यंजन। यह परंपरा मंदिर की कथा से ही निकली है और मंदिर के आसपास सुगमता से मिल जाता है।

ठहरने की व्यवस्था: सालासर में धर्मशालाओं व होटलों की अच्छी व्यवस्था है। मेलों के समय बुकिंग पहले से करनी पड़ती है।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री सालासर बालाजी मंदिर
स्थानसालासर, सुजानगढ़ के निकट
ज़िलाचूरू
राज्यराजस्थान

सालासर बालाजी — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न