तिरु अन्बिल

Sundararaja Perumal Temple, Anbil

वह दिव्य देशम जहाँ एक ऋषि जल के भीतर तप कर रहे थे — और उसी अनजाने में मेंढक बन गए।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
सुंदरराजन् (वडिवऴगिय नंबि) — आदिशेष पर शयन
थायार
सुंदरवल्लि

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार तथा अन्य आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरु अन्बिल तिरुचिरापल्ली के बाहरी क्षेत्र में **अन्बिल** गाँव में है। यहाँ विष्णु **सुंदरराजन्** रूप में विराजते हैं — जिन्हें **वडिवऴगिय नंबि** भी कहा जाता है — और देवी **सुंदरवल्लि** उनके साथ हैं।

भगवान यहाँ **आदिशेष पर शयन** करते हैं। और गर्भगृह में उनके साथ **श्रीदेवी, भूदेवी और ब्रह्मा** — तीनों हैं।

ब्रह्मा का गर्भगृह में होना ध्यान देने योग्य है। पास ही **उत्तमर् कोविल** है, जहाँ ब्रह्मा की अपनी सन्निधि है और जहाँ परंपरा उन्हें पुष्कर के बाद दूसरा स्थान देती है। दोनों मंदिर एक ही ज़िले में हैं।

परंपरा कहती है कि भगवान यहाँ **ब्रह्मा** और ऋषि **सुतपा** के लिए प्रकट हुए।

**कथा असामान्य रूप से करुण है।**

ऋषि **सुतपा** **जल के भीतर** तप कर रहे थे। तभी ऋषि **दुर्वासा** तट पर आ पहुँचे और प्रतीक्षा करने लगे।

सुतपा को पता ही नहीं चला — वे जल के भीतर थे।

पर दुर्वासा ने इसे **अपना अनादर** माना, और शाप दे दिया कि वे **मंडूक** — यानी मेंढक — बन जाएँ।

**यह इस क्षेत्र में दुर्वासा के शाप की तीसरी कथा है**, और तीनों में ढाँचा एक ही है (नीचे विस्तार से)।

मंदिर का निर्माण **आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध** में मध्यकालीन चोलों द्वारा माना जाता है; बाद में विजयनगर राजाओं और मदुरै नायकों ने योगदान दिया।

⚠️ **एक भ्रम टाल लें:** नागपट्टिनम् के **तिरु नागै** की उत्सव-मूर्ति भी **सौंदरराज** कहलाती है। दोनों अलग दिव्य देशम हैं।

  • भगवान आदिशेष पर शयन करते हैं; गर्भगृह में श्रीदेवी, भूदेवी व ब्रह्मा भी।
  • परंपरा: भगवान ब्रह्मा और ऋषि सुतपा के लिए प्रकट हुए।
  • सुतपा जल के भीतर तप कर रहे थे और अनजाने में दुर्वासा के शाप से मेंढक बन गए।
  • इस क्षेत्र में दुर्वासा के शाप की तीसरी कथा — गजेंद्र व उपमन्यु के बाद।
  • निर्माण आठवीं सदी के उत्तरार्ध में चोलों द्वारा।

पौराणिक कथा

यह कथा एक ऐसे अपराध की है जो किया ही नहीं गया था।

जो जल के भीतर था

ऋषि **सुतपा** **जल के भीतर** तपस्या कर रहे थे।

तभी ऋषि **दुर्वासा** तट पर आए और प्रतीक्षा करने लगे।

सुतपा को इसका पता ही नहीं चला। वे जल के भीतर थे — न देख सकते थे, न सुन सकते थे।

पर दुर्वासा ने प्रतीक्षा को **अपना अनादर** माना।

और शाप दे दिया — कि सुतपा **मंडूक**, यानी मेंढक, बन जाएँ।

जो ऋषि जल के भीतर तप कर रहा था, वह जल के ही एक जीव में बदल दिया गया।

अपराध कोई हुआ ही नहीं था। केवल एक व्यक्ति को दिखाई नहीं दिया, और दूसरे ने उसे अपमान समझ लिया।

दुर्वासा, तीसरी बार

यह कथा अकेली नहीं है, और यही ध्यान देने योग्य है।

**दुर्वासा का शाप इस क्षेत्र में तीसरी बार आ रहा है**, और तीनों बार ढाँचा वही है:

- **कबिस्थलम्** में राजा **इंद्रद्युम्न** ध्यान में इतने डूबे थे कि दुर्वासा के आने पर उठे नहीं — और **हाथी** बन गए। वही आगे चलकर **गजेंद्र** हुए। - **कोविलाडि** में राजा **उपमन्यु** ने उनके शाप से अपनी **शक्तियाँ** खो दीं। - **यहाँ** ऋषि **सुतपा** जल के भीतर थे — और **मेंढक** बन गए।

तीनों मंदिर तिरुचिरापल्ली–तंजावुर क्षेत्र में हैं, एक-दूसरे से कुछ ही किलोमीटर पर।

और तीनों में एक ही बात है: **कोई अपनी साधना में इतना डूबा था कि उसे दुर्वासा दिखे ही नहीं।**

यह विडंबना कथाओं ने जानबूझकर रखी है। जिस एकाग्रता को साधना कहा जाता है, वही यहाँ अपराध बन जाती है।

और तीनों बार शाप देने वाला ऋषि नहीं, **मुक्ति देने वाला विष्णु** याद रखा गया — तीनों स्थान उन्हीं के मंदिर हैं, दुर्वासा के नहीं।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Sundararaja_Perumal_temple व अन्य स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मध्यकालीन चोलों द्वारा माना जाता है; बाद में विजयनगर राजाओं और मदुरै नायकों ने भी योगदान दिया।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। यह ग्राम-मंदिर है, इसलिए मध्याह्न में बंद रहने की संभावना अधिक है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नगर के पास; पहुँच सरल।

रेल मार्ग

तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन

वहाँ से सड़क मार्ग से।

सड़क मार्ग

अन्बिल

तिरुचिरापल्ली से स्थानीय बस व ऑटो उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब मौसम सबसे अनुकूल रहता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • श्रीरंगम् व तिरुचिरापल्ली के दिव्य देशम

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प तिरुचिरापल्ली में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री सुंदरराज पेरुमाल मंदिर
स्थानअन्बिल, तिरुचिरापल्ली के बाहरी क्षेत्र में
ज़िलातिरुचिरापल्ली
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरु अन्बिल — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न