तिरुवारन् विलै

Aranmula Parthasarathy Temple, Pathanamthitta

पंच पांडव मंदिरों में अर्जुन का — और वह मंदिर जिसकी सबसे बड़ी परंपरा ज़मीन पर नहीं, नदी पर चलती है।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
पार्थसारथी
तीर्थम्
पंपा

मंगलाशासनम्: पासुरम्नम्माळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुवारन् विलै — **आरन्मुळा** — केरल के **पत्तनंतिट्टा** ज़िले में, **पंपा** नदी के तट पर है। यहाँ कृष्ण **पार्थसारथी** रूप में विराजते हैं।

**यह पंच पांडव मंदिरों में से एक है, और यह अर्जुन का मंदिर है।**

(पाँचों की साझा कथा — कि हर पांडव ने एक मंदिर प्रतिष्ठित किया — **तिरुच्चेंकुंड्रूर** के पृष्ठ पर है।)

और यह मेल तर्कसंगत है। **"पार्थसारथी" का अर्थ ही है *पार्थ का सारथी*** — और पार्थ अर्जुन का ही नाम है।

यानी जिस भाई ने यह मंदिर बनाया, देवता उसी के सारथी हैं।

परंपरा कहती है कि अर्जुन ने मूर्ति पहले **नीलक्कल** में स्थापित की थी, और बाद में **भूमिदेवी** ने उसे यहाँ पुनः प्रतिष्ठित किया।

**पर इस मंदिर की सबसे बड़ी परंपरा भूमि पर नहीं, नदी पर चलती है।**

**आरन्मुळा वल्लंकळि** — नौका-दौड़ — केरल की सबसे प्रसिद्ध नौका-दौड़ों में है। यह **ओणम्** के समय, **चिंगम्** मास के **उत्रट्टादि** दिन होती है, जो मूर्ति की प्रतिष्ठा की वर्षगाँठ भी मानी जाती है।

इसमें **पळ्ळियोडम्** नामक विशाल सजी हुई नौकाएँ उतरती हैं।

और इससे जुड़ी एक और परंपरा है — **तिरुवोणत्तोणि**, वह अनुष्ठानिक नौका जो कृष्ण की मूर्ति लेकर उत्रट्टादि के दिन मंदिर पहुँचती है। साथ ही **वल्लसद्या** का भोज भी होता है।

⚠️ **नाम-भ्रम टाल लें:** "पार्थसारथी" चेन्नै के **तिरुवल्लिक्केणि** और तिरुनांगूर के **तिरु पार्थन्पळ्ळि** के देवता भी हैं। तीनों अलग दिव्य देशम हैं।

यह गाँव **आरन्मुळा कण्णाडि** के लिए भी जाना जाता है — धातु से बना वह पारंपरिक दर्पण जो यहीं की शिल्प-परंपरा है।

  • पंच पांडव मंदिरों में अर्जुन का मंदिर — और देवता पार्थसारथी, यानी अर्जुन के सारथी।
  • आरन्मुळा वल्लंकळि — ओणम् के उत्रट्टादि पर होने वाली प्रसिद्ध नौका-दौड़।
  • तिरुवोणत्तोणि — वह अनुष्ठानिक नौका जो मूर्ति लेकर मंदिर पहुँचती है।
  • परंपरा यहाँ नदी पर चलती है, केवल मंदिर के भीतर नहीं।
  • आरन्मुळा कण्णाडि — धातु के पारंपरिक दर्पण की शिल्प-परंपरा।
  • ⚠️ तिरुवल्लिक्केणि व तिरु पार्थन्पळ्ळि के देवता भी पार्थसारथी हैं।

पौराणिक कथा

पंच पांडव मंदिरों की साझा कथा तिरुच्चेंकुंड्रूर पर है। यहाँ की अपनी बात नाम और नदी की है।

सारथी का मंदिर, सारथी के रथी ने बनाया

पंच पांडव मंदिरों में यह **अर्जुन** का है।

और यहाँ के देवता **पार्थसारथी** हैं — जिसका अर्थ ही है ***पार्थ का सारथी***।

पार्थ अर्जुन का नाम है।

यानी जिस भाई ने यह मंदिर बनाया, यहाँ के देवता उसी के **सारथी** हैं। पाँच भाइयों में किसे कौन-सा मंदिर मिला, यह संयोग नहीं लगता।

परंपरा कहती है कि अर्जुन ने मूर्ति पहले **नीलक्कल** में प्रतिष्ठित की थी, और बाद में **भूमिदेवी** ने उसे यहाँ पुनः स्थापित किया।

जो नदी पर होता है

इस मंदिर की सबसे बड़ी परंपरा मंदिर के भीतर नहीं होती।

**वह पंपा नदी पर होती है।**

**आरन्मुळा वल्लंकळि** — नौका-दौड़ — **ओणम्** के समय, **चिंगम्** मास के **उत्रट्टादि** दिन होती है। वही दिन मूर्ति की प्रतिष्ठा की वर्षगाँठ भी माना जाता है।

उसमें **पळ्ळियोडम्** उतरती हैं — विशाल, सजी हुई नौकाएँ, जिन्हें कुशल नाविक खेते हैं।

और उसी दिन **तिरुवोणत्तोणि** आती है — वह अनुष्ठानिक नौका जो कृष्ण की मूर्ति लेकर मंदिर पहुँचती है।

**यह भाव इस सूची में दूसरी बार दिखा है।**

मदुरै के **अऴगर कोविल** में कल्लऴगर हर वर्ष **वैगै नदी में उतरते** हैं। वहाँ भी परंपरा मंदिर से निकलकर नदी तक चली जाती है, और पूरा नगर उसे देखने आता है।

दोनों जगह वही बात है — जो सबसे बड़ा दिन है, वह मंदिर के भीतर नहीं मनाया जाता। वह **पानी पर** मनाया जाता है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Aranmula_Parthasarathy_Temple व केरल पर्यटन से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक देवस्वम् स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

⚠️ **केरल के मंदिरों के वस्त्र-नियम कड़े हैं** — पुरुषों को प्रायः ऊपरी वस्त्र उतारकर मुंडु/धोती में प्रवेश करना होता है। मध्याह्न का अवकाश भी लंबा रहता है। ⚠️ ओणम् व वल्लंकळि के दिनों में मंदिर, गाँव व नदी — तीनों की व्यवस्था बदल जाती है और भीड़ बहुत अधिक होती है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुवनंतपुरम् / कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: चेंगन्नूर रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुवनंतपुरम् / कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

दोनों से सड़क मार्ग उपलब्ध।

रेल मार्ग

चेंगन्नूर रेलवे स्टेशन

वहाँ से सड़क मार्ग से पास।

सड़क मार्ग

आरन्मुळा

चेंगन्नूर व पत्तनंतिट्टा दोनों से बस उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से फ़रवरी सामान्य दर्शन के लिए। पर यदि **वल्लंकळि** देखनी हो तो **ओणम्** (चिंगम् मास, अगस्त–सितंबर) में आना होगा — तब भीड़ बहुत अधिक रहती है और ठहरने की व्यवस्था पहले से करनी चाहिए।

प्रमुख त्योहार

  • आरन्मुळा वल्लंकळि (ओणम्, चिंगम् का उत्रट्टादि)
  • तिरुवोणत्तोणि
  • वल्लसद्या

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • आरन्मुळा धरोहर ग्राम — आरन्मुळा कण्णाडि की शिल्प-परंपरा के लिए प्रसिद्ध।
  • पंच पांडव मंदिरों के शेष चार — चेंगन्नूर क्षेत्र में।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: ⚠️ केरल-शैली के नियम लागू — पुरुषों को प्रायः ऊपरी वस्त्र उतारकर मुंडु/धोती में प्रवेश करना होता है; पैंट-शर्ट में प्रवेश प्रायः वर्जित है।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प चेंगन्नूर, तिरुवल्ला व पत्तनंतिट्टा में हैं। ओणम् के समय पहले से बुकिंग आवश्यक है।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री पार्थसारथी मंदिर, आरन्मुळा
स्थानआरन्मुळा, पंपा तट
ज़िलापत्तनंतिट्टा
राज्यकेरल
प्रबंधनट्रावणकोर देवस्वम् बोर्ड

तिरुवारन् विलै — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न