दिव्य देशम — एक नज़र में
मंगलाशासनम्: पासुरम् — पोइगै आळ्वार, पेयाळ्वार, भूतत्ताळ्वार व तिरुमऴिसै आळ्वार
मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
तिरु वेक्का कांचीपुरम् के 15 दिव्य देशम में से एक है। यहाँ विष्णु **यथोक्तकारी** रूप में और देवी **कोमलवल्लि** रूप में विराजते हैं।
नाम का अर्थ ही इस मंदिर की पूरी बात कह देता है। संस्कृत में "यथोक्त" का अर्थ है *जैसा कहा गया* और "कारी" का अर्थ है *करने वाला* — यानी **जो कहा गया वैसा ही कर देने वाले**। तमिल में इसी को **सोन्नवण्णम् सेइद पेरुमाल** कहा जाता है, जिसका अर्थ बिल्कुल वही है।
और यह नाम केवल भाव नहीं है — वह प्रतिमा में दिखता है।
**यहाँ रंगनाथ अपने बाएँ हाथ पर लेटे हैं, जबकि शेष सब मंदिरों में वे दाएँ हाथ पर लेटते हैं।** यह उलटाव दुर्लभ है, और परंपरा उसका कारण बताती है: वे पहले सामान्य दिशा में ही लेटे थे, पर तिरुमऴिसै आळ्वार का गान सुनकर उन्होंने करवट बदल ली।
यानी जिस देवता का नाम ही "जैसा कहा वैसा करने वाला" है, उसने वह कर दिखाया — और वह प्रमाण आज भी गर्भगृह में पड़ा है।
यह मंदिर बहुत प्राचीन है। इसका उल्लेख संगम-कालीन तमिल ग्रंथ **पेरुम्बाणाट्रुप्पडै** में मिलता है, जिसका काल 300 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच माना जाता है।
- रंगनाथ यहाँ **बाएँ** हाथ पर लेटे हैं — शेष मंदिरों में दाएँ हाथ पर; यह उलटाव दुर्लभ है।
- नाम का अर्थ — "जो कहा गया वैसा ही कर देने वाले" (तमिल: सोन्नवण्णम् सेइद पेरुमाल)।
- परंपरा: तिरुमऴिसै आळ्वार के गान पर उन्होंने करवट बदली।
- संगम-कालीन ग्रंथ पेरुम्बाणाट्रुप्पडै में उल्लेख — काल 300 ई.पू. से 100 ई. के बीच।
- चार आळ्वारों ने इसका मंगलाशासनम् किया।
- परंपरा के अनुसार पोइगै आळ्वार का जन्म यहीं के कमल-सरोवर में हुआ।
पौराणिक कथा
इस मंदिर से दो अलग आळ्वार-प्रसंग जुड़े हैं। स्रोत उन्हें जोड़ता नहीं, इसलिए यहाँ भी वे अलग-अलग रखे गए हैं।
करवट बदलना
परंपरा कहती है कि यहाँ रंगनाथ पहले उसी दिशा में लेटे थे जिसमें अन्य मंदिरों में लेटते हैं — दाएँ हाथ पर।
फिर तिरुमऴिसै आळ्वार का गान हुआ, और उन्होंने करवट बदल ली। तब से वे **बाएँ** हाथ पर लेटे हैं।
यहीं से उनका नाम पड़ा — यथोक्तकारी, यानी जो कहा गया वैसा ही कर देने वाले।
यह कथा छोटी है, पर उसमें एक बात है जो ठहरती है। देवता ने कोई वरदान नहीं दिया, कोई असुर नहीं मारा, कोई संकट नहीं हरा। उन्होंने बस करवट बदली — एक भक्त के कहने पर।
भक्ति-परंपरा में प्रायः यह पूछा जाता है कि भक्त कितना झुके। यह कथा उलटी दिशा से चलती है।
सरोवर में जन्म
एक अलग परंपरा कहती है कि **पोइगै आळ्वार** का जन्म इसी मंदिर के कमल-सरोवर में हुआ। तमिल में "पोइगै" का अर्थ ही सरोवर है, और उनका नाम वहीं से आया।
पोइगै आळ्वार बारह आळ्वारों में पहले तीन में गिने जाते हैं। यानी जिस परंपरा ने 108 दिव्य देशम तय किए, उसके आरंभिक कवियों में से एक का संबंध इसी स्थान से है।
स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Yathothkari_Perumal_Temple से
इतिहास
तिरु वेक्का का उल्लेख उस काल के ग्रंथ में है जब अधिकांश मंदिर बने ही नहीं थे।
संगम काल का उल्लेख
इस मंदिर का उल्लेख संगम-कालीन तमिल ग्रंथ **पेरुम्बाणाट्रुप्पडै** में मिलता है, जिसका काल 300 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच माना जाता है।
यानी यह स्थान उस समय भी जाना जाता था जब कांचीपुरम् के अधिकांश वर्तमान मंदिर बने भी नहीं थे।
पल्लव, चोल व विजयनगर
वर्तमान संरचना का श्रेय आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के पल्लवों को दिया जाता है, और उसके बाद मध्यकालीन चोलों तथा विजयनगर के राजाओं ने उसमें योगदान किया।
यही क्रम कांचीपुरम् के अधिकांश मंदिरों का है — पल्लवों ने आरंभ किया, चोलों ने बढ़ाया, विजयनगर ने पूरा किया।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Yathothkari_Perumal_Temple — 2026-08-05 को देखा गया
दर्शन का समय
इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।
दक्षिण भारत के मंदिरों में सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं, बीच में विराम रहता है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
चेन्नै से कांचीपुरम् लगभग 72 किमी।
रेल मार्ग
कांचीपुरम् रेलवे स्टेशन
चेन्नै से नियमित गाड़ियाँ।
सड़क मार्ग
कांचीपुरम्
नगर के भीतर; वरदराज पेरुमाल मंदिर से पास।
अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।
सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब तमिलनाडु में मौसम सबसे अनुकूल रहता है।
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- कांचीपुरम् — कांचीपुरम्, तमिलनाडु
- तिरुक्कच्चि — कांचीपुरम् (छिन्न कांचीपुरम्), तमिलनाडु
- वरदराज पेरुमाल मंदिर — कांचीपुरम् का सबसे बड़ा वैष्णव मंदिर; पास ही।
