तिरुवऴुंदूर

Devaadi Raja Perumal Temple, Therazhundur

वह दिव्य देशम जो कंबन की जन्मभूमि है — उन्हीं कवि की, जिन्होंने तमिल में रामायण रची।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
देवादि राज पेरुमाल (उत्सव-मूर्ति: आमरुविअप्पन्) — खड़ी मुद्रा
थायार
सेंगमलवल्लि थायार
तीर्थम्
दर्श पुष्करिणी व गजेंद्र पुष्करिणी
विमानम्
गरुड विमान

मंगलाशासनम्: पासुरम्तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुवऴुंदूर — जिसे **तेराऴुंदूर** भी कहा जाता है — तमिलनाडु के मयिलाडुतुरै ज़िले में है। यहाँ विष्णु **देवादि राज पेरुमाल** रूप में **खड़ी मुद्रा** में विराजते हैं; उत्सव-मूर्ति **आमरुविअप्पन्** कहलाती है। देवी **सेंगमलवल्लि थायार** उनके साथ हैं।

**पर इस स्थान का सबसे बड़ा महत्व मंदिर से बाहर है।**

**यह कंबन की जन्मभूमि है।**

कंबन वही कवि हैं जिन्होंने **कंब रामायणम्** रचा — तमिल की रामायण, जो तमिल साहित्य के सर्वोच्च ग्रंथों में गिनी जाती है।

राजगोपुरम् के भीतर **कंबन और उनकी पत्नियों की प्रतिमाएँ** उत्कीर्ण हैं। और सन्निधि वीथी पर जहाँ वे रहते थे, वहाँ आज **कंबन मंडपम्** बना है।

108 दिव्य देशम में यह असामान्य है। यहाँ मंदिर केवल किसी देवता के प्राकट्य का स्थान नहीं — वह एक कवि का घर भी है।

**नाम की व्युत्पत्ति एक गिरे हुए रथ से आती है।** तमिल में **"तेर" यानी रथ** और **"अऴुंदु" यानी धँसना**।

परंपरा कहती है कि राजा **उपरिचर वसु** को इंद्र से एक **आकाशगामी रथ** मिला था। वह रथ यहीं आकर धँस गया और फिर कभी नहीं उड़ा।

⚠️ **कारण पर स्रोत भिन्न हैं** — कुछ कहते हैं कि रथ ऋषि **अगस्त्य** की तपस्या में विघ्न डालने के कारण गिरा; कुछ कहते हैं कि ऋषियों के शाप से उसका उड़ना बंद हुआ। परिणाम दोनों में एक ही है, और नाम वहीं से पड़ा।

देवता का नाम **आमरुविअप्पन्** एक और प्रसंग से आता है — जब ब्रह्मा कृष्ण की गायें ले गए, तो कृष्ण ने दूसरा गोधन रच दिया, और यहीं वह विवाद सुलझा।

गर्भगृह के ऊपर **गरुड विमान** है। मंदिर के दो तीर्थ हैं — **दर्श पुष्करिणी** (सामने) और **गजेंद्र पुष्करिणी** (उत्तर में) — और पास ही कावेरी बहती है।

मंदिर का निर्माण **करिकाल चोल** द्वारा, पहली शताब्दी में माना जाता है।

  • महाकवि कंबन की जन्मभूमि — कंब रामायणम् के रचयिता।
  • राजगोपुरम् में कंबन व उनकी पत्नियों की प्रतिमाएँ; सन्निधि वीथी पर कंबन मंडपम्।
  • नाम की व्युत्पत्ति — तमिल "तेर" यानी रथ, "अऴुंदु" यानी धँसना।
  • परंपरा: उपरिचर वसु का आकाशगामी रथ यहीं धँसा और फिर कभी नहीं उड़ा।
  • गरुड विमान; दो तीर्थ — दर्श व गजेंद्र पुष्करिणी; निर्माण करिकाल चोल द्वारा।

पौराणिक कथा

यहाँ दो कथाएँ हैं — एक रथ की, और एक कवि की। दूसरी इतिहास है, कथा नहीं।

रथ जो धँस गया

परंपरा कहती है कि **सेथि** के राजा **उपरिचर वसु** को इंद्र से एक ऐसा रथ मिला था जो **आकाश में उड़ता** था।

वह रथ यहीं आकर **धँस गया**, और फिर कभी नहीं उड़ा। राजा भगवान के सामने गिर पड़े।

स्थान का नाम वहीं से पड़ा — तमिल में **"तेर" यानी रथ** और **"अऴुंदु" यानी धँसना**।

⚠️ कारण पर स्रोत भिन्न हैं। कुछ कहते हैं कि रथ ऋषि **अगस्त्य** की तपस्या में विघ्न डालने के कारण गिरा। कुछ कहते हैं कि ऋषियों ने शाप दिया कि यह रथ अब नहीं उड़ेगा। हम दोनों दर्ज कर रहे हैं।

यह प्रसंग कुंभकोणम् के **तिरुक्कुडंतै** के ठीक उलटा है। वहाँ गर्भगृह ही रथ के आकार में गढ़ा गया है — भगवान स्वर्ग से उतरकर आए, और वाहन खड़ा है।

यहाँ रथ धँसा हुआ है।

एक जगह उतरना है, दूसरी जगह गिरना। और दोनों जगह वाहन वहीं रह गया।

कवि का घर

पर इस स्थान की सबसे बड़ी बात कोई पौराणिक कथा नहीं है।

**यहाँ कंबन जन्मे थे।**

कंबन ने **कंब रामायणम्** रचा — तमिल की रामायण, जो उस भाषा के सर्वोच्च ग्रंथों में गिनी जाती है। वाल्मीकि की कथा को उन्होंने तमिल में फिर से रचा, और वह अनुवाद नहीं, अपने आप में एक महाकाव्य बन गया।

राजगोपुरम् के भीतर **कंबन और उनकी पत्नियों की प्रतिमाएँ** उत्कीर्ण हैं। सन्निधि वीथी पर जिस स्थान पर वे रहते थे, वहाँ आज **कंबन मंडपम्** है।

108 दिव्य देशम प्रायः देवताओं के प्राकट्य-स्थान हैं — कहीं विष्णु प्रकट हुए, कहीं देवी जन्मीं, कहीं किसी को शाप से मुक्ति मिली।

यह स्थान उनसे अलग है। यहाँ जो हुआ, वह किसी देवता के साथ नहीं, एक मनुष्य के साथ हुआ — और वह मनुष्य आगे चलकर उसी राम की कथा लिखने वाला था जिसके लिए ये मंदिर बने हैं।

मंदिर आळ्वारों के पदों से दिव्य देशम बना। और जिस भूमि पर वह खड़ा है, उसी ने वह कवि दिया जिसने राम की कथा तमिल को सौंपी।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Devaadi_Raja_Perumal_temple व अन्य स्थल-स्रोतों से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर का निर्माण पहली शताब्दी में करिकाल चोल द्वारा, द्रविड़ शैली में माना जाता है।

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। वैकुंठ एकादशी पर भीड़ अधिक रहती है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: मयिलाडुतुरै रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे।

रेल मार्ग

मयिलाडुतुरै रेलवे स्टेशन

वहाँ से तेराऴुंदूर सड़क मार्ग से पास है।

सड़क मार्ग

तेराऴुंदूर

मयिलाडुतुरै व कुंभकोणम् दोनों से स्थानीय बस उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं। कंबन मंडपम् सन्निधि वीथी पर ही है।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी। वैकुंठ एकादशी (दिसंबर–जनवरी) व वैकासि ब्रह्मोत्सवम् (मई–जून) यहाँ के मुख्य अवसर हैं।

प्रमुख त्योहार

  • वैकासि ब्रह्मोत्सवम् (मई–जून)
  • वैकुंठ एकादशी (दिसंबर–जनवरी)

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • कंबन मंडपम् — सन्निधि वीथी पर, जहाँ कवि कंबन रहते थे।
  • मयिलाडुतुरै के दिव्य देशम

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प मयिलाडुतुरै व कुंभकोणम् में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री देवादि राज पेरुमाल मंदिर
स्थानतेराऴुंदूर, मयिलाडुतुरै के निकट
ज़िलामयिलाडुतुरै
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुवऴुंदूर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न