तिरुवेळ्ळरै

Pundarikakshan Perumal Temple, Thiruvellarai

वह दिव्य देशम जिसके दो प्रवेश-द्वार हैं — और कौन-सा खुला होगा, यह वर्ष का महीना तय करता है।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
पुंडरीकाक्षन् — दक्षिणायन में मायवन्, उत्तरायण में तै माद नायगन्
थायार
पंकजवल्लि थायार
तीर्थम्
सात तीर्थ — दिव्य, कंडकश्री, चक्र, पुष्कल, पद्म व वराह मणिकर्णिका आदि
विमानम्
विमलाक्कृति विमान

मंगलाशासनम्: पेरियाळ्वार के 11 पद व तिरुमंगै आळ्वार के 13 पद पासुरम्पेरियाळ्वार व तिरुमंगै आळ्वार

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुवेळ्ळरै तिरुचिरापल्ली से लगभग **सत्ताईस किलोमीटर** दूर है। यहाँ विष्णु **पुंडरीकाक्षन्** रूप में विराजते हैं — **पूर्व की ओर मुख किए, खड़ी मुद्रा** में — और देवी **पंकजवल्लि थायार** उनके साथ हैं।

**यहाँ की सबसे असाधारण बात प्रवेश-द्वार की है, और वह सीधे यात्रा से जुड़ी है।**

मंदिर के **दो प्रवेश-द्वार** हैं, और दोनों एक साथ नहीं खुलते:

- **उत्तरायण वासल्** — **15 जनवरी से 15 जून** तक खुला रहता है - **दक्षिणायन वासल्** — शेष छह मास

यानी आप किस द्वार से भीतर जाएँगे, यह इस पर निर्भर है कि आप **किस महीने** आए हैं।

**और केवल द्वार ही नहीं बदलता — देवता का नाम भी बदल जाता है।**

दक्षिणायन में वे **मायवन्** कहलाते हैं, और उत्तरायण में **तै माद नायगन्**।

भारत के मंदिरों में सूर्य की गति के अनुसार अनुष्ठान बदलना सामान्य है। पर यहाँ वह गति **वास्तु में** उतर आई है — दो दरवाज़े बने ही इसलिए हैं।

**पुरातत्त्व की दृष्टि से भी यह मंदिर विशेष है।** यहाँ **732 से 847 ईस्वी** के **पल्लव शिलालेख** हैं — यानी तिथि-सहित प्रमाण, जो अधिकांश दिव्य देशम पर उपलब्ध नहीं है।

**यहाँ सात तीर्थ हैं** — दिव्य तीर्थ, कंडकश्री तीर्थ, चक्र तीर्थ, पुष्कल तीर्थ, पद्म तीर्थ, वराह मणिकर्णिका तीर्थ आदि। 108 में इतनी संख्या असामान्य है।

गर्भगृह के ऊपर **विमलाक्कृति विमान** है।

**पेरियाळ्वार ने ग्यारह** और **तिरुमंगै आळ्वार ने तेरह** पद रचे।

  • दो प्रवेश-द्वार — उत्तरायण वासल् (15 जनवरी–15 जून) व दक्षिणायन वासल् (शेष छह मास)।
  • ऋतु के साथ देवता का नाम बदलता है — दक्षिणायन में मायवन्, उत्तरायण में तै माद नायगन्।
  • 732–847 ई. के पल्लव शिलालेख — तिथि-सहित प्रमाण, जो अधिकांश दिव्य देशम पर नहीं।
  • सात तीर्थ — 108 में असामान्य रूप से अधिक।
  • विमलाक्कृति विमान; पूर्वाभिमुख खड़ी मूर्ति।
  • पेरियाळ्वार के ग्यारह व तिरुमंगै आळ्वार के तेरह पद।

पौराणिक कथा

यहाँ दो बातें कहने योग्य हैं — एक राजा की गिनती, और एक सूर्य की गति।

जब एक की कमी पड़ गई

परंपरा कहती है कि विष्णु के दर्शन पाकर राजा **शिबि चक्रवर्ती** ने यह मंदिर बनवाने का संकल्प किया, और उसके लिए **तीन हज़ार सात सौ वैष्णवों** को साथ लाए।

पर मार्ग में उनमें से **एक की मृत्यु** हो गई।

संख्या पूरी नहीं रही।

तब विष्णु स्वयं, **पहचान छिपाकर**, उस स्थान पर आ खड़े हुए — और संख्या पूरी हो गई।

यहीं से उनका नाम **पुंडरीकाक्षन्** पड़ा।

यह कथा छोटी है, पर इसमें एक बात है। भगवान यहाँ किसी को वरदान देने नहीं आए, न किसी असुर को मारने। वे **एक गिनती पूरी करने** आए — एक ऐसे व्यक्ति की जगह लेने, जो अब नहीं रहा।

और उन्होंने यह बताकर नहीं किया। वे भीड़ में एक और नाम बनकर खड़े रहे।

दो दरवाज़े, दो नाम

सूर्य वर्ष में दो दिशाओं में चलता है — छह मास **उत्तरायण**, छह मास **दक्षिणायन**।

भारत की परंपरा में यह विभाजन गहरा है। उत्तरायण को शुभ माना गया; महाभारत में भीष्म ने प्राण त्यागने के लिए उसी की प्रतीक्षा की थी।

अधिकांश मंदिरों में यह गति अनुष्ठानों और उत्सवों में दिखती है।

**यहाँ वह दीवार में दिखती है।**

मंदिर के दो प्रवेश-द्वार हैं। **उत्तरायण वासल्** 15 जनवरी से 15 जून तक खुलता है, और **दक्षिणायन वासल्** शेष छह मास।

और भीतर जो हैं, उनका नाम भी बदल जाता है — दक्षिणायन में **मायवन्**, उत्तरायण में **तै माद नायगन्**।

यानी यहाँ आने वाला हर भक्त वर्ष के जिस भाग में आता है, उसी के अनुसार एक अलग द्वार से जाता है और एक अलग नाम पुकारता है।

मूर्ति वही रहती है। शेष सब बदल जाता है।

स्रोत: स्थल-परंपरा; विवरण en.wikipedia.org/wiki/Pundarikakshan_Perumal_Temple से, 2026-08-05.

इतिहास

मंदिर में 732 से 847 ईस्वी तक के पल्लव शिलालेख मिलते हैं — यानी इसकी प्राचीनता के तिथि-सहित प्रमाण उपलब्ध हैं, जो अधिकांश दिव्य देशम के विषय में नहीं कहा जा सकता।

732–847 ई.
पल्लव शिलालेख — मंदिर की प्राचीनता का तिथि-सहित प्रमाण

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

⚠️ यहाँ समय से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आप **किस महीने** आ रहे हैं — क्योंकि उसी से तय होता है कि कौन-सा प्रवेश-द्वार खुला मिलेगा। 15 जनवरी से 15 जून तक उत्तरायण वासल्, और शेष छह मास दक्षिणायन वासल्। दर्शन सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक होते हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन · 27 किमी

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वहाँ से सड़क मार्ग से लगभग एक घंटा।

रेल मार्ग

तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन — लगभग 27 किमी

वहाँ से लगभग 27 किमी।

सड़क मार्ग

तिरुवेळ्ळरै — लगभग 27 किमी

तिरुचिरापल्ली से स्थानीय बस व टैक्सी उपलब्ध।

अंतिम चरण: ⚠️ मंदिर पहुँचने पर ध्यान रखें कि **प्रवेश-द्वार ऋतु के अनुसार बदलता है** — 15 जनवरी से 15 जून तक उत्तरायण वासल् खुला रहता है, शेष छह मास दक्षिणायन वासल्। स्थानीय रूप से पूछ लेना सरल है।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी मौसम की दृष्टि से सबसे अनुकूल है। ⚠️ ध्यान रहे कि 15 जनवरी के बाद उत्तरायण वासल् खुलता है और उससे पहले दक्षिणायन वासल् — यानी जनवरी के मध्य में जाने पर आप वस्तुतः दो भिन्न अनुभव पा सकते हैं। चैत्र (मार्च–अप्रैल) में रथोत्सव होता है।

प्रमुख त्योहार

  • रथोत्सव (चैत्र, मार्च–अप्रैल) — सामूहिक भोज की परंपरा के साथ

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • श्रीरंगम् — प्रथम दिव्य देशम; तिरुचिरापल्ली के पास।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प तिरुचिरापल्ली में हैं; यह पूरे क्षेत्र के दिव्य देशम के लिए अच्छा आधार है।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री पुंडरीकाक्षन् पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुवेळ्ळरै, तिरुचिरापल्ली से 27 किमी
ज़िलातिरुचिरापल्ली
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुवेळ्ळरै — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न