तिरुक्कोविलूर

Trivikrama (Ulagalandha) Perumal Temple, Thirukkovilur

वह दिव्य देशम जहाँ तीन आळ्वार एक साँकरी जगह में खड़े हुए — और वहीं से वह गान आरंभ हुआ जिससे ये एक सौ आठ बने।

यह स्थान इनमें भी है:108 दिव्य देशम

दिव्य देशम — एक नज़र में

पेरुमाल
त्रिविक्रम (उलगलंद पेरुमाल)

मंगलाशासनम्: पासुरम्तीनों मुदल् आळ्वार — पोइगै, भूतत्त व पेय

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

तिरुक्कोविलूर तमिलनाडु के **विऴुप्पुरम्** ज़िले में है। यहाँ विष्णु **त्रिविक्रम** रूप में विराजते हैं और **उलगलंद पेरुमाल** कहलाते हैं — *जिन्होंने लोक नापे*।

**पर इस मंदिर का सबसे बड़ा महत्व मूर्ति में नहीं, एक घटना में है — और वह घटना इस पूरी सूची की जड़ है।**

**यहीं तीनों मुदल् आळ्वार पहली बार एक साथ आए।**

**पोइगै आळ्वार**, **भूतत्त आळ्वार** और **पेय आळ्वार** — ये तीन **आदि आळ्वार** हैं, जिनसे आळ्वार-परंपरा आरंभ होती है। परंपरा कहती है कि तीनों **लगातार तीन दिनों** में जन्मे थे।

और एक रात वे तीनों, अलग-अलग, यहाँ पहुँचे — ऋषि **मृगंडु** के आश्रम में।

**पोइगै आळ्वार** पहले आए और **इडैकऴि** में विश्राम किया — घर के आगे और पीछे के बीच की वह साँकरी जगह। फिर **भूतत्त आळ्वार** आए, और दोनों उसमें बैठ सके।

फिर **पेय आळ्वार** आए — और अब तीनों केवल **खड़े** हो सकते थे।

**और तभी उन्हें लगा कि वहाँ कोई चौथा भी है।**

अँधेरे में वे देख नहीं सकते थे। तो **पोइगै आळ्वार** ने एक **दीप जलाया** — पर वह दीप शब्दों का था। उन्होंने एक पद रचा, और वह पद **मुदल् तिरुवंदादि** का **पहला पद** बना।

**भूतत्त आळ्वार** ने दूसरा दीप जलाया — **इरंडाम् तिरुवंदादि** का पहला पद।

और तब **पेय आळ्वार** ने **उन्हें देख लिया** — और जो उन्होंने गाया, वह **मूंड्राम् तिरुवंदादि** का पहला पद बना।

**यानी नालायिर दिव्य प्रबंधम् का आरंभ यहीं हुआ।**

⭐ **और यही इस पूरे संग्रह की जड़ है।**

108 दिव्य देशम पतों की सूची नहीं है — यह उन स्थानों की सूची है जिनका **आळ्वारों ने गान किया**। हमने यह बार-बार देखा: **तिरु ऊरगम्** एक परिसर होकर भी चार है, **अहोबिलम्** नौ मंदिर होकर भी एक, और **वैकुंठ** कोई इमारत न होकर भी सूची में है।

वह गान **यहीं से शुरू हुआ**।

**एक और सूत्र भी यहाँ आकर पूरा होता है।** यहाँ के भगवान **उलगलंद** — त्रिविक्रम — हैं, और यह वामन-बलि प्रसंग का **पाँचवाँ** मंदिर है: कांचीपुरम् का **तिरु ऊरगम्**, शिरकाळि का **काऴिच्चीराम विण्णगरम्**, तंजावुर का **तिरुवेळ्ळियंकुडि**, केरल का **तृक्काक्करा**, और यह।

  • यहीं तीनों मुदल् आळ्वार — पोइगै, भूतत्त व पेय — पहली बार एक साथ आए।
  • इडैकऴि नामक साँकरी जगह में तीनों को केवल खड़े होने की जगह मिली।
  • वहीं तीन तिरुवंदादि के पहले पद रचे गए — दिव्य प्रबंधम् का आरंभ।
  • 108 दिव्य देशम की सूची उन्हीं आळ्वार-पदों से बनी है, इसलिए इस सूची की जड़ यहीं है।
  • भगवान उलगलंद/त्रिविक्रम — वामन-बलि प्रसंग का पाँचवाँ दिव्य देशम।

पौराणिक कथा

इस स्थान की कथा किसी वरदान या युद्ध की नहीं है। यह एक रात की है, जब तीन अजनबी एक साँकरी जगह में खड़े रह गए।

तीन आदमी, एक साँकरी जगह

**पोइगै**, **भूतत्त** और **पेय** — ये तीन **मुदल् आळ्वार** हैं, जिनसे यह पूरी परंपरा आरंभ होती है। परंपरा कहती है कि तीनों **लगातार तीन दिनों** में जन्मे।

एक रात वे तीनों, **एक-दूसरे से अलग**, यहाँ पहुँचे — ऋषि **मृगंडु** के आश्रम में।

पहले **पोइगै आळ्वार** आए और **इडैकऴि** में रुक गए — वह साँकरी जगह जो घर के आगे और पीछे के बीच होती है। वहाँ एक आदमी **लेट** सकता था।

फिर **भूतत्त आळ्वार** आए। अब दोनों **बैठ** सकते थे।

फिर **पेय आळ्वार** आए। अब तीनों केवल **खड़े** हो सकते थे।

जगह हर बार छोटी पड़ती गई, और हर बार उन्होंने उसे बाँट लिया।

और तब चौथा आया

तीनों खड़े थे — और तभी उन्हें लगा कि वहाँ **कोई चौथा भी है**।

भीड़ बढ़ गई थी, पर दिखाई कुछ नहीं देता था। रात थी।

तो **पोइगै आळ्वार** ने **दीप जलाया** — पर उनके पास दीप नहीं था। उन्होंने **एक पद रचा**, और उसमें पृथ्वी को दीपक कहा, समुद्र को घी, सूर्य को ज्योति।

वह पद **मुदल् तिरुवंदादि** का **पहला पद** बना।

फिर **भूतत्त आळ्वार** ने दूसरा दीप जलाया — प्रेम को दीपक कहकर। वह **इरंडाम् तिरुवंदादि** का पहला पद बना।

और उस प्रकाश में **पेय आळ्वार ने उन्हें देख लिया।**

जो उन्होंने गाया, वह **मूंड्राम् तिरुवंदादि** का पहला पद बना।

**नालायिर दिव्य प्रबंधम् का आरंभ यहीं हुआ।**

और इसीलिए यह सूची है

**यह मंदिर इस पूरे संग्रह की जड़ है।**

108 दिव्य देशम कोई भौगोलिक सूची नहीं है। यह उन स्थानों की सूची है जिनका **आळ्वारों ने गान किया** — और हमने इस काम में बार-बार देखा कि इसका क्या अर्थ है।

इसीलिए कांचीपुरम् का **तिरु ऊरगम्** एक ही परिसर होकर भी **चार** दिव्य देशम है।

इसीलिए **अहोबिलम्** की नौ सन्निधियाँ मिलकर **एक** हैं।

इसीलिए **तंजैमामणि कोइल** के तीन मंदिर एक हैं, और **इरट्टै तिरुपति** के दो मंदिर एक — पर दो ग्रह।

और इसीलिए **वैकुंठ** और **क्षीरसागर** भी सूची में हैं, जो कोई इमारत हैं ही नहीं।

गिनती कभी इमारतों की नहीं थी। वह हमेशा **पदों** की थी।

और वे पद **यहीं**, एक साँकरी जगह में, तीन आदमियों के खड़े रह जाने से शुरू हुए।

जगह इतनी छोटी थी कि उसमें तीन मुश्किल से समाते थे। और उसी में से वह निकला जिसने आगे चलकर एक सौ आठ स्थानों को एक सूत्र में बाँध दिया — तमिलनाडु से केरल तक, आंध्र से हिमालय तक, और नेपाल के मुक्तिनाथ तक।

स्रोत: स्थल-परंपरा व श्रीवैष्णव परंपरा; विवरण संबद्ध स्रोतों व acharyas.koyil.org से, 2026-08-05.

दर्शन का समय

इस मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर/ट्रस्ट स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके।

सामान्यतः प्रातःकाल से मध्याह्न तक और फिर सायंकाल से रात्रि तक दर्शन होते हैं। मंदिर तिरुक्कोविलूर नगर में ही है।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: तिरुचिरापल्ली / चेन्नै हवाई अड्डा
निकटतम रेलवे स्टेशन: विऴुप्पुरम् जंक्शन

हवाई मार्ग

तिरुचिरापल्ली / चेन्नै हवाई अड्डा

रेल मार्ग

विऴुप्पुरम् जंक्शन

वहाँ से सड़क मार्ग से।

सड़क मार्ग

तिरुक्कोविलूर

विऴुप्पुरम् व तिरुवण्णामलै दोनों से बस उपलब्ध।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब मौसम सबसे अनुकूल रहता है।

आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल

  • तिरुवण्णामलै — पास ही।

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र।

ठहरने की व्यवस्था: ठहरने के विकल्प विऴुप्पुरम् व तिरुवण्णामलै में हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री त्रिविक्रम (उलगलंद) पेरुमाल मंदिर
स्थानतिरुक्कोविलूर, विऴुप्पुरम् ज़िला
ज़िलाविऴुप्पुरम्
राज्यतमिलनाडु
प्रबंधनतमिलनाडु हिंदू धार्मिक व धर्मादाय बंदोबस्ती विभाग (HR&CE)

तिरुक्कोविलूर — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न