कष्टभंजन देव हनुमान

Kashtabhanjan Dev Hanuman Temple, Sarangpur

गुजरात का वह हनुमान मंदिर जिसकी प्रतिमा के चरणों में शनि स्त्री-रूप में दर्शाए गए हैं।

यह स्थान इनमें भी है:प्रसिद्ध हनुमान मंदिर

मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व

कष्टभंजन देव हनुमान मंदिर गुजरात के **बोटाद** ज़िले में सारंगपुर गाँव में है। यह **स्वामिनारायण संप्रदाय की वडताल गादी** के अधीन आता है — और यही इसे शेष दस हनुमान मंदिरों से अलग करता है, क्योंकि यह अकेला है जो किसी संगठित संप्रदाय की व्यवस्था में है।

नाम का अर्थ सीधा है: **कष्टभंजन** यानी कष्टों को तोड़ने वाले।

प्रतिमा की सबसे विशिष्ट बात नीचे है, चरणों में। **यहाँ शनि देव को स्त्री-रूप में हनुमान के चरणों के नीचे दर्शाया गया है।** हनुमान स्वयं एक हृष्ट-पुष्ट रूप में हैं, बड़ी मूँछों के साथ, और चारों ओर फलों से लदी लताओं तथा वानर-सेवकों की आकृतियाँ उकेरी हैं।

यह विन्यास असामान्य है और इसी कारण यह मंदिर उन लोगों में विशेष रूप से जाना जाता है जो शनि से जुड़ी कठिनाइयों के भाव से आते हैं।

प्रतिष्ठा सन् **1849** (विक्रम संवत् 1905) में **सद्गुरु गोपालानंद स्वामी** ने की — जो स्वामिनारायण के प्रत्यक्ष शिष्य थे।

  • प्रतिमा के चरणों में शनि देव स्त्री-रूप में दर्शाए गए हैं।
  • ग्यारह में अकेला मंदिर जो किसी संगठित संप्रदाय के अधीन है — स्वामिनारायण संप्रदाय की वडताल गादी।
  • प्रतिष्ठा 1849 (वि.सं. 1905) में सद्गुरु गोपालानंद स्वामी द्वारा।
  • नाम का अर्थ — कष्टों को तोड़ने वाले।
  • प्रतिमा के चारों ओर फलों से लदी लताएँ व वानर-सेवकों की आकृतियाँ उकेरी हैं।

पौराणिक कथा

इस प्रतिमा की प्रतिष्ठा से जुड़ा एक प्रसंग संप्रदाय की परंपरा में बार-बार कहा जाता है।

गोपालानंद स्वामी की प्रतिष्ठा

परंपरा कहती है कि सन् 1849 में जब गोपालानंद स्वामी ने इस प्रतिमा की प्रतिष्ठा की, तो उन्होंने अपनी छड़ी से प्रतिमा को स्पर्श किया — और प्रतिमा में हलचल हुई।

यह प्रसंग स्वामिनारायण संप्रदाय की परंपरा में इस मंदिर की पहचान का हिस्सा है।

गोपालानंद स्वामी स्वयं भगवान स्वामिनारायण के प्रत्यक्ष शिष्यों में थे, और उन्नीसवीं शताब्दी के गुजरात में संप्रदाय की व्यवस्था खड़ी करने में उनकी बड़ी भूमिका रही।

स्रोत: स्वामिनारायण संप्रदाय की परंपरा; विवरण संबद्ध स्रोतों से, 2026-08-04 को देखे गए

इतिहास

प्रतिष्ठा व प्रबंधन

मंदिर की स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में हुई और प्रतिमा की प्रतिष्ठा सन् 1849 (विक्रम संवत् 1905) में सद्गुरु गोपालानंद स्वामी ने की।

आज यह स्वामिनारायण संप्रदाय की वडताल गादी के अधीन है।

स्रोत: संबद्ध स्रोत, 2026-08-04 को देखे गए

1849 ई. (वि.सं. 1905)
सद्गुरु गोपालानंद स्वामी द्वारा कष्टभंजन हनुमान की प्रतिष्ठा।

दर्शन का समय

कष्टभंजन देव मंदिर के लिए कोई आधिकारिक दर्शन-समय या आरती-तालिका सत्यापित स्रोत पर उपलब्ध नहीं मिली।

मंदिर प्रातःकाल से रात्रि तक दर्शन हेतु खुला रहता है, बीच में विराम रहता है। शनिवार को यहाँ भीड़ सबसे अधिक रहती है। मंदिर संप्रदाय के अधीन है और यहाँ भोजन व ठहरने की सुव्यवस्थित सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

हमने यहाँ कोई समय इसलिए नहीं छापा कि वह किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध नहीं है। यात्रा-वेबसाइटों पर मिलने वाले समय आपस में मेल नहीं खाते, और एक ग़लत समय ऐसे स्थान पर बहुत महँगा पड़ता है।

कैसे पहुँचें

निकटतम एयरपोर्ट: सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद
निकटतम रेलवे स्टेशन: बोटाद रेलवे स्टेशन

हवाई मार्ग

सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, अहमदाबाद

अहमदाबाद से सारंगपुर तक सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे। भावनगर भी एक विकल्प है।

रेल मार्ग

बोटाद रेलवे स्टेशन

बोटाद से सारंगपुर पास ही है।

सड़क मार्ग

सारंगपुर

अहमदाबाद, राजकोट व भावनगर से नियमित बस सेवा।

अंतिम चरण: सड़क मंदिर तक जाती है; कोई चढ़ाई नहीं।

सुगमता: सुगम — कोई चढ़ाई नहीं। परिसर सुव्यवस्थित है।

कब जाएँ

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब गुजरात में मौसम अनुकूल रहता है। शनिवार को यहाँ भीड़ सबसे अधिक रहती है। हनुमान जयंती पर विशेष आयोजन होते हैं।

प्रमुख त्योहार

  • हनुमान जयंती

यात्रा सुझाव

वस्त्र: शालीन वस्त्र। स्वामिनारायण संप्रदाय के मंदिरों में वस्त्र-संबंधी नियम अपेक्षाकृत कड़े होते हैं — पूरी बाँह व ढके हुए वस्त्र उपयुक्त रहते हैं।

ठहरने की व्यवस्था: मंदिर संप्रदाय के अधीन है और परिसर में ठहरने तथा भोजन की सुव्यवस्थित सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

एक नज़र में

प्रकारमंदिर
मंदिरश्री कष्टभंजन देव हनुमानजी मंदिर
स्थानसारंगपुर
ज़िलाबोटाद
राज्यगुजरात
प्रबंधनस्वामिनारायण संप्रदाय, वडताल गादी

कष्टभंजन देव हनुमान — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न