मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
गरुड़ पुराण का जो श्लोक सात मोक्षदायिनी पुरियों को गिनाता है, उसमें अंतिम नाम **द्वारावती** है — यानी द्वारका। सप्त पुरी में यह अकेली पुरी है जो समुद्र के तट पर है; शेष छह भीतरी भारत में हैं।
यहाँ ध्यान देने योग्य एक भेद है। **सप्त पुरी में द्वारका *नगर* गिना जाता है, कोई एक मंदिर नहीं।** चार धाम में जो गिना जाता है वह द्वारकाधीश मंदिर है — इसी नगर में, पर वह अलग गणना है। परंपराएँ अलग-अलग चीज़ें गिनती हैं, और उन्हें एक मान लेना दोनों के साथ अन्याय होगा।
पुरी होने का अर्थ ही यह है कि पवित्रता किसी एक गर्भगृह में नहीं, पूरे नगर की भूमि में मानी जाती है। यहाँ द्वारकाधीश मंदिर है, गोमती के घाट हैं, रुक्मिणी देवी का मंदिर है, कुछ दूरी पर बेट द्वारका का द्वीप है, और पास ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग। एक ही यात्रा में इतनी परंपराएँ और कहीं नहीं मिलतीं।
द्वारका की कथा में एक बात असामान्य है। अधिकांश तीर्थ-नगर इस पर टिके हैं कि वहाँ कुछ स्थायी है। द्वारका इस पर टिकी है कि वहाँ जो था, वह चला गया — नगरी समुद्र में समा गई। जो बचा वह स्मृति है, और परंपरा ने उसी स्मृति को मोक्षदायिनी माना।
- सप्त पुरी की सातवीं पुरी; गरुड़ पुराण के श्लोक में "द्वारावती" के नाम से।
- सप्त पुरी में अकेली पुरी जो समुद्र-तट पर है।
- यहाँ चार धाम का द्वारकाधीश मंदिर और पास ही नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — दो अलग परंपराएँ एक ही यात्रा में।
- परंपरा के अनुसार मूल द्वारका नगरी कृष्ण के देह-त्याग के बाद समुद्र में समा गई।
- बेट द्वारका का द्वीप, गोमती घाट व रुक्मिणी देवी मंदिर — नगर के भीतर के प्रमुख स्थल।
पौराणिक कथा
द्वारका की कथा एक नगर के बनने और मिट जाने की कथा है — और परंपरा दोनों को समान महत्व देती है।
समुद्र से माँगी हुई भूमि
मथुरा छोड़ने के बाद कृष्ण पश्चिम आए और समुद्र से भूमि माँगी। उसी पर द्वारका बसी — सोने की नगरी, जिसका वर्णन कथाओं में बहुत विस्तार से मिलता है।
नाम भी इसी से आया। "द्वार" और "का" — अनेक द्वारों वाली नगरी। कुछ पाठ इसे मोक्ष का द्वार भी कहते हैं, और सप्त पुरी में इसका होना उसी अर्थ को पुष्ट करता है।
और फिर लौटा देना
कृष्ण के देह त्यागने के बाद, कथा कहती है, समुद्र ने वह भूमि वापस ले ली। द्वारका डूब गई।
यह अंत कथा में जोड़ा गया लगता नहीं — वह उसका आवश्यक हिस्सा लगता है। जो नगरी एक व्यक्ति के रहते बनी थी, उसके जाने के बाद उसका बने रहना शायद अर्थहीन होता।
परंपरा ने इस डूबने को हार नहीं कहा। सप्त पुरी में द्वारका का नाम आज भी है, और मोक्षदायिनी के रूप में है। यानी जो स्थान भौतिक रूप से बचा ही नहीं, उसे परंपरा ने पवित्रतम में गिना।
यह एक विचार है जिस पर रुका जा सकता है। हम प्रायः उसे महत्व देते हैं जो टिकता है। यह कथा कहती है कि जो चला गया, वह भी उतना ही सच था — और उसकी स्मृति भूमि को पवित्र बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।
स्रोत: महाभारत व भागवत पुराण की द्वारका-कथा; सप्त पुरी की गणना गरुड़ पुराण के श्लोक से
इतिहास
द्वारका का इतिहास पुरातत्व और परंपरा दोनों का विषय रहा है।
नगर और मंदिर
नगर के केंद्र में द्वारकाधीश मंदिर है, जिसकी मूल संरचना का काल कम से कम ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक जाता है। वर्तमान ढाँचा पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी का है, क्योंकि 1473 में मूल संरचना ध्वस्त कर दी गई थी।
नगर स्वयं उससे बहुत पुराना माना जाता है, और समुद्र में डूबी संरचनाओं की खोज इस क्षेत्र में होती रही है। यह खोज अभी चल रही है और उस पर कोई अंतिम निष्कर्ष यहाँ दर्ज करना उचित नहीं होगा।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Dwarkadhish_Temple — 2026-08-04 को देखा गया
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
जामनगर हवाई अड्डा
जामनगर से द्वारका तक सड़क मार्ग से लगभग दो से ढाई घंटे। राजकोट व अहमदाबाद भी विकल्प हैं।
रेल मार्ग
द्वारका रेलवे स्टेशन
अहमदाबाद-ओखा रेल मार्ग पर; देश के कई नगरों से सीधी गाड़ियाँ आती हैं।
सड़क मार्ग
द्वारका
जामनगर, राजकोट व अहमदाबाद से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
अंतिम चरण: नगर छोटा है और अधिकांश प्रमुख स्थल पैदल अथवा ऑटो से पहुँच में हैं। बेट द्वारका के लिए ओखा से नाव लेनी पड़ती है।
सुगमता: नगर समतल है और घूमने में सुगम। बेट द्वारका के लिए नाव से जाना पड़ता है, और गोमती घाट तक जाने के लिए सीढ़ियाँ उतरनी होती हैं।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब गुजरात के तट पर मौसम अनुकूल रहता है। ग्रीष्म में यहाँ अत्यधिक गर्मी व उमस रहती है। जन्माष्टमी पर नगर भर में उत्सव होता है, पर भीड़ भी बहुत रहती है।
प्रमुख त्योहार
- जन्माष्टमी
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- द्वारकाधीश मंदिर — द्वारका, गुजरात
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — द्वारका, गुजरात
- बेट द्वारका — ओखा से नाव द्वारा पहुँचा जाने वाला द्वीप; परंपरा के अनुसार कृष्ण का निवास-स्थान।
- गोमती घाट — द्वारकाधीश मंदिर के स्वर्ग द्वार से 56 सीढ़ियाँ उतरकर; स्नान की परंपरा है।
- रुक्मिणी देवी मंदिर — नगर से कुछ दूरी पर; इसकी अपनी अलग कथा है कि रुक्मिणी का मंदिर नगर से बाहर क्यों है।
- सुदामा सेतु — गोमती नदी पर बना पैदल पुल।
