नागेश्वर ज्योतिर्लिंग
Nageshwar Jyotirlinga
दारुकावन का नागेश्वर — इसकी पहचान को लेकर तीन स्थान दावा करते हैं।

महत्व
नागेश्वर का नाम नाग से जुड़ा है — और परंपरा में नाग भय का भी प्रतीक है और रक्षा का भी। शिव के गले में सर्प इसी भाव का चिह्न है: जिस भय को सब त्यागते हैं, उसे शिव आभूषण बना लेते हैं।
जो श्रद्धालु द्वारका जाते हैं, वे प्रायः नागेश्वर के दर्शन भी करते हैं। समुद्र के पास, खुले आकाश के नीचे बना यह मंदिर द्वारका यात्रा का स्वाभाविक अंग बन गया है।
पर इस ज्योतिर्लिंग के साथ भी एक खुला प्रश्न जुड़ा है। शिव पुराण इसे "दारुकावन" में बताता है, पर वह वन वास्तव में कहाँ था — इस पर आज तक एकमत नहीं है, और तीन स्थान स्वयं को नागेश्वर बताते हैं। नीचे तीनों पक्ष जैसे हैं वैसे रखे गए हैं।
- नाम नाग से जुड़ा — भय पर विजय का प्रतीक।
- गर्भगृह ऊपर नहीं, नीचे तहखाने में है — दर्शन के लिए सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं।
- परिसर में भगवान शिव की लगभग 80 फुट ऊँची ध्यानस्थ प्रतिमा, जो दूर से ही दिखाई देती है।
- द्वारका यात्रा का स्वाभाविक अंग; गुजरात के दो ज्योतिर्लिंगों में एक।
- इसकी पहचान विवादित है — द्वारका, औंढा नागनाथ तथा जागेश्वर तीनों दावा करते हैं।
- शिव पुराण इसे "दारुकावन" में बताता है, पर उस वन का स्थान आज तक विवादित है।
कथा
नागेश्वर की कथा एक बंदी भक्त की है — जिसने जेल में भी पूजा नहीं छोड़ी।
दारुक और सुप्रिय
परंपरा कहती है कि दारुक नामक असुर और उसकी पत्नी दारुका ने एक वन क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया था। दारुका को माता पार्वती का वरदान प्राप्त था, जिससे वह उस वन को अपने साथ ले जा सकती थी — और इसी से वह वन दारुकावन कहलाया।
दारुक ने अनेक लोगों को बंदी बनाकर समुद्र के भीतर बसे अपने नगर में डाल रखा था। उन्हीं बंदियों में एक था सुप्रिय — शिव का परम भक्त।
बंदीगृह में पूजा
सुप्रिय ने बंदी होकर भी पूजा नहीं छोड़ी। उसने वहीं एक शिवलिंग स्थापित किया और शेष बंदियों को भी साथ लेकर "ॐ नमः शिवाय" का जप आरंभ कर दिया।
जो लोग अपनी मुक्ति की आशा छोड़ चुके थे, वे उसके साथ जप करने लगे। बंदीगृह में मंत्र गूँजने लगा।
यह बात असुरों को सहन नहीं हुई। उन्होंने सुप्रिय पर आक्रमण किया।
शिव का प्रकट होना
उसी क्षण भगवान शिव प्रकट हुए और सुप्रिय को दिव्य अस्त्र देकर उसके प्राणों की रक्षा की। असुरों का संहार हुआ और बंदी मुक्त हुए।
जो शिवलिंग सुप्रिय ने स्थापित किया था, वही "नागेश" कहलाया और आगे चलकर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
इस कथा का मर्म सीधा है। सुप्रिय ने बंधन में रहते हुए भी वह नहीं छोड़ा जो उसके हाथ में था — उसका जप। परिस्थिति उसके वश में नहीं थी, पर उसका मन उसके वश में था। और अंततः वही काम आया।
स्रोत: शिव पुराण (नागेश्वर माहात्म्य); दारुक-सुप्रिय प्रसंग — en.wikipedia.org/wiki/Nageshvara_Jyotirlinga से सत्यापित
इतिहास
नागेश्वर का सबसे चर्चित प्रश्न भी पहचान का ही है — और उसकी जड़ एक शब्द में है: दारुकावन।
दारुकावन कहाँ था
शिव पुराण कहता है कि नागेश्वर पश्चिमी समुद्र के निकट दारुकावन में है। पर उस वन का वास्तविक स्थान आज तक निश्चित नहीं हो सका।
एक मत कहता है कि "दारुकावन" का अर्थ देवदार वन है — और देवदार हिमालय में उगता है, प्रायद्वीपीय भारत में नहीं। इस आधार पर उत्तराखंड का जागेश्वर स्वयं को नागेश्वर बताता है।
दूसरा मत मानता है कि "दारुकावन" वस्तुतः "द्वारकावन" का पाठभेद है, जो तट पर बसी द्वारका की ओर संकेत करता है।
तीसरा मत विंध्य के निकट से दक्षिण-पश्चिम की ओर फैले वन क्षेत्र की बात करता है।
तीन दावेदार
आज तीन स्थान स्वयं को नागेश्वर ज्योतिर्लिंग बताते हैं — द्वारका (गुजरात), औंढा नागनाथ (महाराष्ट्र) और जागेश्वर (उत्तराखंड)।
औंढा का पक्ष स्तोत्र की व्याख्या पर टिका है, जिसमें स्थान को दक्षिण में प्राचीन "सदंग" बताया गया और उसे औंढा से जोड़ा जाता है।
आज सर्वाधिक श्रद्धालु द्वारका के नागेश्वर मंदिर में जाते हैं, और सामान्य व्यवहार में यही नागेश्वर माना जाता है। पर यह लोकप्रियता है, अंतिम निर्णय नहीं — और तीनों स्थानों पर सदियों से पूजा होती आई है।
द्वारका का वर्तमान मंदिर
द्वारका के नागेश्वर मंदिर की एक विशेषता यह है कि गर्भगृह ऊपर नहीं, नीचे तहखाने में है। दर्शन के लिए सीढ़ियाँ उतरकर जाना पड़ता है — और जब आप नीचे पहुँचते हैं तो बाहर का शोर पीछे छूट जाता है।
यहाँ का शिवलिंग द्वारका शिला से बना बताया जाता है और उस पर छोटे-छोटे चक्र दिखाई देते हैं। परंपरा में इसका स्वरूप त्रिमुखी रुद्राक्ष जैसा माना जाता है।
परिसर में प्रवेश करते ही भगवान शिव की लगभग अस्सी फुट ऊँची ध्यानस्थ प्रतिमा दिखती है, जो दूर से ही मार्ग बता देती है। यह बाहरी ढाँचा अपेक्षाकृत नया है — बताया जाता है कि बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पर निकले गुलशन कुमार ने मंदिर की जर्जर स्थिति देखकर पुराने ढाँचे के ऊपर नया निर्माण कराने का संकल्प लिया था।
स्रोत: Nageshvara Jyotirlinga — en.wikipedia.org; द्वारका मंदिर का विवरण incredibleindia.gov.in तथा अन्य स्रोतों से (2026-07-30 को देखा गया)
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग
जामनगर हवाई अड्डा
जामनगर से द्वारका सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
द्वारका रेलवे स्टेशन
ओखा भी एक विकल्प है; दोनों गुजरात के प्रमुख नगरों से जुड़े हैं।
सड़क मार्ग
द्वारका गुजरात के प्रमुख नगरों से नियमित बस सेवा से जुड़ा है; मंदिर द्वारका-ओखा मार्ग पर पड़ता है।
अंतिम चरण: द्वारका से मंदिर तक टैक्सी व ऑटो सहज उपलब्ध हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल
- द्वारकाधीश मंदिर — चार धाम में एक; द्वारका का मुख्य मंदिर।
- बेट द्वारका — ओखा से नाव अथवा पुल द्वारा पहुँचा जाता है।
- रुक्मिणी देवी मंदिर — द्वारका के समीप प्राचीन मंदिर।
- गोपी तालाब — द्वारका-नागेश्वर मार्ग पर स्थित।
- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग — गुजरात का दूसरा ज्योतिर्लिंग — प्रायः साथ ही दर्शन किए जाते हैं।
यात्रा सुझाव
प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण मास, नाग पंचमी
वस्त्र: शालीन वस्त्र आवश्यक।
प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।
ठहरने की व्यवस्था: द्वारका में धर्मशालाएँ व होटल उपलब्ध हैं; अधिकांश श्रद्धालु द्वारका में ठहरकर नागेश्वर के दर्शन करते हैं।
