FAQ
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इसका उत्तर विवादित है। द्वारका (गुजरात), औंढा नागनाथ (महाराष्ट्र) और जागेश्वर (उत्तराखंड) — तीनों स्वयं को नागेश्वर ज्योतिर्लिंग बताते हैं। आज सर्वाधिक श्रद्धालु द्वारका के नागेश्वर मंदिर में जाते हैं और सामान्य व्यवहार में उसे ही नागेश्वर माना जाता है।
शिव पुराण नागेश्वर को पश्चिमी समुद्र के निकट "दारुकावन" में बताता है, पर उस वन का वास्तविक स्थान निश्चित नहीं है। एक मत दारुकावन को देवदार वन मानकर हिमालय की ओर संकेत करता है, दूसरा इसे "द्वारकावन" का पाठभेद मानकर द्वारका की ओर, और तीसरा विंध्य के निकट के वन क्षेत्र की बात करता है।
कथा के अनुसार दारुक नामक असुर ने सुप्रिय नाम के शिवभक्त सहित अनेक लोगों को समुद्र के भीतर बसे अपने नगर में बंदी बना रखा था। सुप्रिय ने वहीं शिवलिंग स्थापित कर सभी बंदियों के साथ "ॐ नमः शिवाय" का जप आरंभ किया। असुरों के आक्रमण पर भगवान शिव प्रकट हुए, सुप्रिय की रक्षा की और असुरों का संहार किया। वही शिवलिंग नागेश कहलाया।
इस पृष्ठ पर दर्शन का समय जान-बूझकर नहीं दिया गया है, क्योंकि मंदिर के अपने किसी आधिकारिक स्रोत से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। अनुमान से समय देना यात्रा की दृष्टि से हानिकारक हो सकता है। कृपया यात्रा से पूर्व मंदिर से सीधे पुष्टि कर लें।
यहाँ गर्भगृह ऊपर नहीं, नीचे तहखाने में है — दर्शन के लिए सीढ़ियाँ उतरकर जाना पड़ता है। शिवलिंग द्वारका शिला से बना बताया जाता है और उस पर छोटे-छोटे चक्र दिखाई देते हैं; परंपरा में इसका स्वरूप त्रिमुखी रुद्राक्ष जैसा माना जाता है।
परिसर में भगवान शिव की लगभग अस्सी फुट ऊँची ध्यानस्थ प्रतिमा है, जो दूर से ही दिखाई देती है। बताया जाता है कि बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पर निकले गुलशन कुमार ने मंदिर की जर्जर स्थिति देखकर पुराने ढाँचे के ऊपर नया निर्माण कराने का संकल्प लिया, और वर्तमान बाहरी ढाँचा उसी का परिणाम है।
निकटतम हवाई अड्डा जामनगर है। रेल मार्ग से द्वारका तथा ओखा निकटतम स्टेशन हैं। मंदिर द्वारका-ओखा मार्ग पर पड़ता है और द्वारका से टैक्सी व ऑटो सहज उपलब्ध हैं। अधिकांश श्रद्धालु द्वारका यात्रा के साथ ही नागेश्वर के दर्शन करते हैं।

