FAQ
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
त्र्यंबकेश्वर महाराष्ट्र के नासिक ज़िले में त्र्यंबक नगर में स्थित है, नासिक से लगभग 28 किमी दूर। मंदिर ब्रह्मगिरि, नीलगिरि और कालगिरि — तीन पहाड़ियों के बीच है।
परंपरा के अनुसार यहाँ के ज्योतिर्लिंग के तीन मुख हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। "त्र्यंबक" नाम भी इसी से जुड़ा है। शेष ज्योतिर्लिंगों में यह विशेषता नहीं मिलती।
दर्शन सामान्यतः प्रातः 5:30 से दोपहर 12:30 तक और सायं 4:30 से रात्रि 8:30 तक होते हैं; काकड़ आरती प्रातः 5:30 और शेज आरती रात्रि 9:00 बजे होती है। पर्व व अनुष्ठान के दिनों में समय बदलता है, इसलिए यात्रा से पूर्व मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि कर लें।
हाँ। मंदिर परिसर का कुशावर्त कुंड गोदावरी का उद्गम माना जाता है। गोदावरी भारत की दूसरी सबसे लंबी नदी है और इसे दक्षिण गंगा भी कहा जाता है।
गर्भगृह के तीन लिंगों पर त्रिदेव का स्वर्ण मुखौटा और उसके ऊपर एक रत्नजड़ित मुकुट रखा जाता है, जिसमें हीरे, पन्ने व अन्य बहुमूल्य रत्न जड़े हैं। परंपरा इसे पांडव काल का बताती है। इसके दर्शन प्रत्येक सोमवार सायं 4 से 5 बजे के बीच होते हैं।
कुशावर्त कुंड इंदौर राज्य के फडणवीस सरदार रावसाहेब पारनेरकर द्वारा बनवाया गया था। कुंड के किनारे उनकी और उनकी पत्नी की प्रतिमा भी लगी है। इसी कुंड को गोदावरी का उद्गम माना जाता है।
परंपरा के अनुसार नारायण नागबलि अनुष्ठान त्र्यंबकेश्वर में ही किया जाता है और यह तीन दिन तक चलता है। यदि आप ऐसा कोई अनुष्ठान कराना चाहें तो जानकारी मंदिर ट्रस्ट से ही लें, बाहर के बिचौलियों से नहीं।
निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक रोड है, जो सड़क मार्ग से लगभग 39 किमी दूर है। नासिक से त्र्यंबकेश्वर लगभग 28 किमी है और नियमित बस व टैक्सी सेवा उपलब्ध है। हवाई मार्ग से नासिक (ओझर) निकट है, पर बड़े नगरों से जुड़ाव के लिए मुंबई अधिक सुविधाजनक रहता है।
वर्तमान मंदिर का निर्माण पेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) ने कराया। इससे पूर्व मंदिर औरंगज़ेब के काल में नष्ट कर दिया गया था। मंदिर काले पत्थर से बना है और मराठा स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

