12 ज्योतिर्लिंग

Dwadash Jyotirlinga

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग — उत्पत्ति की कथा, स्तोत्र, राज्य-वार सूची और हर धाम की पूरी जानकारी।

ज्योतिर्लिंग क्या है — लिंगोद्भव कथा

बारह ज्योतिर्लिंगों की कथा एक ही प्रसंग से आरंभ होती है — और वह प्रसंग किसी मंदिर का नहीं, सृष्टि के आरंभ का है।

ब्रह्मा और विष्णु का विवाद

कल्प के अंत में जब चारों ओर केवल जलराशि शेष थी, ब्रह्माजी और भगवान विष्णु के बीच एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ — हम दोनों में श्रेष्ठ कौन है। दोनों ने अपने-अपने कारण गिनाए, और बात बढ़ती चली गई।

तभी उनके बीच एक अद्भुत ज्योति-स्तंभ प्रकट हुआ — अग्नि का ऐसा स्तंभ जिसका न आदि दिखता था, न अंत। वह ऊपर भी अनंत था और नीचे भी।

अंत खोजने का प्रयास

दोनों ने निश्चय किया कि जो इस स्तंभ का छोर खोज लाएगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। भगवान विष्णु वराह रूप धारण कर नीचे की ओर चले और ब्रह्माजी हंस पर सवार होकर ऊपर की ओर।

युगों तक चलते रहने पर भी किसी को छोर नहीं मिला। विष्णुजी लौट आए और सरलता से स्वीकार कर लिया कि वे अंत नहीं पा सके। ब्रह्माजी ने लौटकर कहा कि उन्होंने शिखर देख लिया है।

सत्य का प्रकट होना

उसी क्षण उस ज्योति-स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए। असत्य कहने के कारण ब्रह्माजी को यह फल मिला कि पृथ्वी पर उनकी पूजा मंदिरों में नहीं होगी — और विष्णुजी को उनकी सरलता के लिए समान आदर।

कथा का मर्म दंड में नहीं, उस स्वीकार में है। जो कह सका "मुझे अंत नहीं मिला", वह सत्य के निकट रहा। यह बात हर उस मन के लिए है जो जानने से अधिक जताने में लगा रहता है।

बारह स्थान क्यों

भक्तों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उसी ज्योति-स्वरूप में पृथ्वी के बारह स्थानों पर स्थित रहना स्वीकार किया। वही बारह स्थान ज्योतिर्लिंग कहलाए।

इसीलिए परंपरा कहती है कि ज्योतिर्लिंग किसी के हाथों गढ़ा या स्थापित नहीं होता — वह स्वयं प्रकट होता है। "ज्योति" अर्थात् प्रकाश और "लिंग" अर्थात् चिह्न; ज्योतिर्लिंग अर्थात् उस अनंत प्रकाश का चिह्न, जिसे उस दिन ब्रह्मा और विष्णु भी नाप न सके।

स्रोत: शिव पुराण — शतरुद्र संहिता (अ. 42) तथा कोटिरुद्र संहिता (अ. 14–33); लिंगोद्भव प्रसंग लिंग, कूर्म, वामन, स्कंद, ब्रह्माण्ड व वायु पुराणों में भी वर्णित

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

यह स्तोत्र एक ही पाठ में बारहों ज्योतिर्लिंगों का नाम ले लेता है। नीचे हर पंक्ति के साथ वे धाम दिए हैं जिनका वह नाम लेती है — नाम पर क्लिक कर सीधे उस धाम के पृष्ठ पर जा सकते हैं।

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्।

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।

सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

जो मनुष्य इन ज्योतिर्लिंगों का सायं और प्रातः स्मरण करता है, उसके सात जन्मों के पाप स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (नाम-स्मरण) — पारंपरिक पाठ, आदि शंकराचार्य को आरोपित

क्रम को लेकर भ्रम क्यों होता है

ज्योतिर्लिंगों की सूची दो अलग क्रमों में मिलती है, और दोनों ही ठीक हैं।

एक क्रम स्तोत्र का है — जिस क्रम में पाठ उनके नाम लेता है। उसमें वैद्यनाथ और भीमशंकर केदारनाथ से पहले आ जाते हैं, और रामेश्वरम् व नागेश्वर काशी से पहले।

दूसरा क्रम प्रचलित सूची का है, जो प्रायः सोमनाथ से आरंभ होकर घृष्णेश्वर पर समाप्त होती है। इस पृष्ठ पर सूची इसी दूसरे क्रम में है, और स्तोत्र अपने मूल क्रम में — इसलिए दोनों जगह गिनती अलग दिख सकती है। यह किसी की भूल नहीं, दो परंपराओं का अंतर है।

बारहों ज्योतिर्लिंग

बारह ज्योतिर्लिंग — तुलना तालिका

ज्योतिर्लिंगस्थानराज्यविशेषता
सोमनाथप्रभास पाटन (वेरावल)गुजरातसागर तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग — इतिहास में कई बार ध्वस्त हुआ और हर बार पुनः खड़ा हुआ।
मल्लिकार्जुनश्रीशैलम्आंध्र प्रदेशश्रीशैल पर्वत पर वह विरल स्थान जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ एक साथ विराजते हैं।
महाकालेश्वरउज्जैनमध्य प्रदेशबारह में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग — भस्म आरती की परंपरा इसी की पहचान है।
ओंकारेश्वरओंकारेश्वर (मांधाता द्वीप)मध्य प्रदेशनर्मदा के बीच ॐ के आकार वाले मांधाता द्वीप पर स्थित ज्योतिर्लिंग।
केदारनाथकेदारनाथउत्तराखंडबारह में सबसे उत्तर — हिमालय की गोद में, जहाँ कपाट वर्ष में कुछ ही महीने खुलते हैं।
भीमाशंकरभीमाशंकर (खेड़ तालुका)महाराष्ट्रसह्याद्रि के डाकिनी वन में स्थित — भीमा नदी का उद्गम यहीं माना जाता है।
काशी विश्वनाथवाराणसी (काशी)उत्तर प्रदेशकाशी की अविमुक्त भूमि पर — शिव मंदिरों में सर्वाधिक पूज्य माना जाने वाला धाम।
त्र्यंबकेश्वरत्र्यंबकमहाराष्ट्रगोदावरी का उद्गम स्थल — परंपरा में यहाँ का लिंग त्रिमुखी (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) माना जाता है।
वैद्यनाथदेवघरझारखंडरावण की तपस्या से जुड़ा धाम — इसकी पहचान को लेकर कई स्थान दावा करते हैं।
नागेश्वरद्वारकागुजरातदारुकावन का नागेश्वर — इसकी पहचान को लेकर तीन स्थान दावा करते हैं।
रामेश्वरम्रामेश्वरम्तमिलनाडुबारह में सबसे दक्षिण — परंपरा में श्रीराम द्वारा सेतुबंध के समय स्थापित माना जाता है।
घृष्णेश्वरवेरुल (एलोरा)महाराष्ट्रबारह में अंतिम — एलोरा की विश्व-धरोहर गुफाओं से एक किलोमीटर के भीतर।