FAQ
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
घृष्णेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) ज़िले के वेरुल गाँव में स्थित है — एलोरा की विश्व-धरोहर गुफाओं से लगभग 1.5 किमी और नगर से लगभग 30 किमी दूर।
हाँ। गर्भगृह में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। यह स्थानीय परंपरा है और इसका पालन कड़ाई से होता है, इसलिए यात्रा से पहले यह जान लेना उपयोगी रहता है।
पद्म पुराण के अनुसार घुश्मा नाम की शिवभक्त स्त्री प्रतिदिन मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूजती और सरोवर में विसर्जित करती थी। ईर्ष्यावश उसकी सौत ने उसके पुत्र की हत्या कर दी। घुश्मा ने विलाप के बजाय अपनी नित्य पूजा जारी रखी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसके पुत्र को जीवित कर दिया, और जब वे अपराधिनी को दंड देने लगे तो घुश्मा ने उसके लिए क्षमा माँगी। उसी निर्मलता से प्रसन्न होकर शिव यहीं ज्योतिर्लिंग रूप में स्थित हुए।
सामान्यतः मंदिर प्रातः 5:30 से रात्रि 9:30 बजे तक खुला रहता है, बीच में कुछ समय विराम रहता है। श्रावण मास व महाशिवरात्रि पर समय बढ़ाकर प्रातः 3:00 से रात्रि 11:00 कर दिया जाता है। समय बदलता रहता है, इसलिए यात्रा से पूर्व मंदिर से पुष्टि कर लें।
16वीं शताब्दी में मालोजी भोसले — छत्रपति शिवाजी महाराज के पितामह — ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। सन् 1729 में इंदौर की रानी गौतमा बाई होल्कर के संरक्षण में इसका पुनर्निर्माण हुआ और इसे वर्तमान स्वरूप मिला।
हाँ। दोनों के बीच लगभग 1.5 किमी की ही दूरी है, इसलिए अधिकांश यात्री एक ही दिन में दोनों के दर्शन कर लेते हैं। छत्रपति संभाजीनगर में ठहरकर यह यात्रा सुविधाजनक रहती है।

