घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

Grishneshwar Jyotirlinga

बारह में अंतिम — एलोरा की विश्व-धरोहर गुफाओं से एक किलोमीटर के भीतर।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग — प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

महत्व

घृष्णेश्वर महाराष्ट्र के वेरुल गाँव में स्थित है — एलोरा की विश्व-प्रसिद्ध गुफाओं से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर, और छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) से लगभग तीस किलोमीटर।

परंपरा में इसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अंतिम माना जाता है। जो श्रद्धालु बारहों की यात्रा का संकल्प लेते हैं, उनके लिए यह पड़ाव विशेष हो जाता है — यात्रा यहाँ पूरी होती है।

मंदिर काले पत्थर से हेमाडपंथी शैली में बना है और लगभग 44,000 वर्ग फुट में फैला है। यह राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक भी है और एक जीवंत पूजा-स्थल भी — दोनों एक साथ।

एक बात यात्रा से पहले जान लेनी चाहिए: यहाँ गर्भगृह में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। यह स्थानीय परंपरा है और इसका पालन कड़ाई से होता है।

  • द्वादश ज्योतिर्लिंगों में अंतिम माना जाता है।
  • एलोरा की विश्व-धरोहर गुफाओं से लगभग 1.5 किमी दूर।
  • काले पत्थर से हेमाडपंथी शैली में निर्मित; लगभग 44,000 वर्ग फुट में विस्तृत।
  • गर्भगृह में प्रवेश हेतु पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने की परंपरा है।
  • मुख्य द्वार के सामने नंदी की विशाल प्रतिमा; भीतरी-बाहरी दोनों दीवारों पर बारीक नक्काशी।
  • राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक होने के साथ-साथ एक सक्रिय तीर्थ भी।
  • महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंगों में एक।

कथा

घृष्णेश्वर की कथा उन सब कथाओं से अलग है। इसमें कोई असुर नहीं मारा जाता — इसमें कोई क्षमा कर देता है।

घुश्मा की पूजा

पद्म पुराण के अनुसार घुश्मा नाम की एक स्त्री भगवान शिव की परम भक्त थी। वह प्रतिदिन अपने हाथों से मिट्टी के शिवलिंग बनाती और उनकी पूजा कर पास के सरोवर में विसर्जित कर देती।

उसकी भक्ति के प्रभाव से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई और घर में सुख आया। पर जहाँ सुख आता है, वहाँ कभी-कभी ईर्ष्या भी पहुँच जाती है।

सबसे बड़ी हानि

ईर्ष्या से भरकर उसकी सौत ने उसके पुत्र की हत्या कर दी और शव उसी सरोवर में डाल दिया, जिसमें घुश्मा प्रतिदिन शिवलिंग विसर्जित करती थी।

सुबह घुश्मा को यह पता चला। किसी माँ के लिए इससे बड़ी हानि नहीं हो सकती।

पर उसने विलाप में समय नहीं गँवाया। उसने वही किया जो वह प्रतिदिन करती थी — शिवलिंग बनाया, पूजा की, और सरोवर की ओर गई।

क्षमा और वरदान

कथा कहती है कि भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसके पुत्र को जीवित कर दिया। और फिर उन्होंने उस स्त्री को दंड देना चाहा जिसने यह अपराध किया था।

घुश्मा ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि उसे क्षमा कर दिया जाए।

यही इस कथा का शिखर है। जिस स्त्री ने उसका पुत्र छीना, उसी के लिए उसने क्षमा माँगी — और वह भी उस क्षण, जब दंड दिलाना उसके हाथ में था।

भगवान शिव ने उसकी इस निर्मलता से प्रसन्न होकर यहीं ज्योतिर्लिंग रूप में स्थित होना स्वीकार किया, और वे घुश्मेश्वर कहलाए — घुश्मा के ईश्वर।

बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा जिस कथा पर समाप्त होती है, वह क्षमा की कथा है। यह संयोग नहीं लगता।

स्रोत: पद्म पुराण (घुश्मेश्वर माहात्म्य); en.wikipedia.org/wiki/Grishneshwar_Temple से सत्यापित

इतिहास

वर्तमान मंदिर दो नामों का ऋणी है — एक मराठा सरदार का, और एक रानी का।

मालोजी भोसले

16वीं शताब्दी में मालोजी भोसले — छत्रपति शिवाजी महाराज के पितामह — ने मंदिर का पहला जीर्णोद्धार कराया।

गौतमा बाई होल्कर और वर्तमान स्वरूप

सन् 1729 में इंदौर की रानी गौतमा बाई होल्कर के संरक्षण में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और उसे वर्तमान स्वरूप मिला।

मंदिर काले पत्थर से हेमाडपंथी शैली में बना है और लगभग 44,000 वर्ग फुट में फैला है। भीतरी और बाहरी दोनों दीवारों पर मूर्तियाँ और बारीक नक्काशी है। मुख्य द्वार के सामने नंदी की विशाल प्रतिमा है, जो दर्शन-क्रम का पहला पड़ाव बनती है।

आज यह राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है और साथ ही एक सक्रिय तीर्थ भी — दोनों एक साथ होना अपने आप में कम मिलता है।

स्रोत: Grishneshwar Temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)

16वीं शताब्दी
मालोजी भोसले द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार।
1729 ई.
रानी गौतमा बाई होल्कर के संरक्षण में पुनर्निर्माण; वर्तमान स्वरूप।

दर्शन समय व आरती

मंदिर प्रतिदिन प्रातः 5:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहता है।

आरतीसमयविवरण
मंगल आरतीप्रातः 4:00दिन की पहली आरती।
सायंकालीन आरतीसायं 7:30
रात्रि आरतीरात्रि 10:00दिन की अंतिम आरती।

विशेष दर्शन व बुकिंग

  • गर्भगृह में प्रवेश हेतु पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं — यह स्थानीय परंपरा है और इसका पालन कड़ाई से होता है।
  • श्रावण मास तथा महाशिवरात्रि पर मंदिर प्रातः 3:00 बजे से रात्रि 11:00 बजे तक खुला रहता है।
  • ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है; टिकट मंदिर के काउंटर से ही लिया जाता है।
  • मंदिर राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक है — परिसर में फोटोग्राफी संबंधी नियमों का पालन करें।

सामान्य दिनों में दोपहर के बाद कुछ समय दर्शन में विराम रहता है। श्रावण व महाशिवरात्रि पर समय बढ़ा दिया जाता है। समय बदलता रहता है — यात्रा से पूर्व मंदिर से पुष्टि कर लें।

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक मौसम अनुकूल रहता है। एलोरा गुफाएँ पास ही हैं, इसलिए एक ही दिन में दोनों देखे जा सकते हैं।

दर्शन व आरती समय 30 जुलाई 2026 को सत्यापित। श्रावण, पर्व व विशेष अवसरों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि अवश्य करें।

कैसे पहुंचें

हवाई मार्ग

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) हवाई अड्डा

नगर से वेरुल लगभग 30 किमी है; टैक्सी व बस उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) रेलवे स्टेशन

स्टेशन से आगे सड़क मार्ग से जाना होता है।

सड़क मार्ग

छत्रपति संभाजीनगर से एलोरा तक नियमित बस व टैक्सी सेवा उपलब्ध है; मंदिर एलोरा गुफाओं के निकट ही है।

  • छत्रपति संभाजीनगर — लगभग 30 किमी
  • एलोरा गुफाएँ — लगभग 1.5 किमी

अंतिम चरण: एलोरा से मंदिर तक की दूरी बहुत कम है; पैदल अथवा ऑटो से पहुँचा जा सकता है।

सुगमता: परिसर समतल है और पहुँच अपेक्षाकृत सुगम है; वर्तमान व्यवस्था मंदिर प्रशासन से पूछ लें।

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • एलोरा गुफाएँ (लगभग 1.5 किमी) — यूनेस्को विश्व धरोहर; कैलाश मंदिर यहीं है।
  • दौलताबाद किला — ऐतिहासिक दुर्ग; मार्ग में पड़ता है।
  • बीबी का मक़बरा — छत्रपति संभाजीनगर का प्रसिद्ध स्मारक।
  • अजंता गुफाएँ — यूनेस्को विश्व धरोहर; कुछ दूरी पर।
  • भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग — महाराष्ट्र का दूसरा ज्योतिर्लिंग।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण मास, कार्तिक पूर्णिमा

वस्त्र: शालीन वस्त्र। गर्भगृह में प्रवेश हेतु पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं — यह स्थानीय परंपरा है, इसे ध्यान में रखकर ही जाएँ।

प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।

ठहरने की व्यवस्था: वेरुल व एलोरा में सीमित विकल्प हैं; अधिकांश यात्री छत्रपति संभाजीनगर में ठहरते हैं, जहाँ हर बजट की व्यवस्था उपलब्ध है।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न