भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

Bhimashankar Jyotirlinga

सह्याद्रि के डाकिनी वन में स्थित — भीमा नदी का उद्गम यहीं माना जाता है।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग — प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

महत्व

भीमाशंकर महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में सह्याद्रि की पहाड़ियों पर, लगभग 934 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। पुणे से इसकी दूरी लगभग 110 किलोमीटर है।

यह उन थोड़े से ज्योतिर्लिंगों में है जो घने जंगल के बीच हैं। मंदिर के चारों ओर भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य फैला है, जहाँ दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव मिलते हैं। यहाँ दर्शन के साथ-साथ पहाड़, धुंध और पक्षियों की आवाज़ भी यात्रा का हिस्सा बन जाती है।

परंपरा कहती है कि भीमा नदी का उद्गम यहीं है। जिस स्थान से नदी निकलती हो, उसे भारतीय परंपरा हमेशा विशेष मानती आई है — क्योंकि नदी आगे चलकर जिन-जिन खेतों और नगरों को जिलाती है, उन सबका आरंभ उसी एक बिंदु पर होता है।

महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंगों में यह एक है; शेष दो त्र्यंबकेश्वर और घृष्णेश्वर हैं।

  • सह्याद्रि की पहाड़ियों पर, भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य के बीच स्थित।
  • परंपरा के अनुसार भीमा नदी का उद्गम यहीं है।
  • मंदिर 13वीं शताब्दी का, नागर शैली में — हेमाडपंथी स्थापत्य से साम्य रखता है।
  • सभामंडप व शिखर का निर्माण 18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने कराया।
  • परिसर में लटका घंटा वसई किले के पुर्तगाली गिरजाघरों का है — 1739 में चिमाजी अप्पा ने भेंट किया।
  • मंदिर के पीछे मोक्षकुंड तीर्थ, जहाँ परंपरा में दर्शन से पूर्व स्नान किया जाता है।
  • महाराष्ट्र के तीन ज्योतिर्लिंगों में एक।

कथा

भीमाशंकर की कथा एक ऐसे असुर की है जिसने वरदान पाकर तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया — और उस रूप की, जो उसे रोकने के लिए प्रकट हुआ।

त्रिपुरासुर का आतंक

परंपरा कहती है कि त्रिपुरासुर नामक असुर ने कठोर तप से ऐसा बल प्राप्त कर लिया कि देवता भी उसके सामने असहाय हो गए। उसने तीनों लोकों में उत्पात मचा दिया और यज्ञ-पूजा का क्रम भंग होने लगा।

देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की। उनकी पुकार पर शिव ने इसी सह्याद्रि क्षेत्र में "भीमाशंकर" रूप धारण किया — भीम अर्थात् विशाल, प्रचंड।

युद्ध और भीमा नदी

युद्ध घोर हुआ और अंततः त्रिपुरासुर का संहार हुआ। कथा कहती है कि युद्ध के बाद भगवान शिव के शरीर से जो स्वेद बहा, उसी से भीमरथी — अर्थात् भीमा — नदी बनी।

यह कल्पना सुंदर है। संहार के बाद जो बचता है, वह विनाश नहीं — एक नदी है। जिस शक्ति ने असुर को समाप्त किया, वही आगे चलकर खेतों को सींचती है।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव यहीं ज्योतिर्लिंग रूप में स्थित हो गए, और यह स्थान भीमाशंकर कहलाया।

स्रोत: शिव पुराण (भीमाशंकर माहात्म्य); त्रिपुरासुर प्रसंग व भीमरथी की उत्पत्ति — en.wikipedia.org/wiki/Bhimashankar_Temple से सत्यापित

इतिहास

भीमाशंकर का वर्तमान मंदिर एक ही बार में नहीं बना — इसमें दो अलग-अलग सदियों का हाथ है।

मूल मंदिर

वर्तमान मंदिर का मूल भाग 13वीं शताब्दी का माना जाता है और नागर शैली में बना है, जिसमें हेमाडपंथी स्थापत्य से स्पष्ट साम्य दिखता है। स्तंभों और द्वार-शाखाओं पर देवताओं तथा मानव आकृतियों की सूक्ष्म नक्काशी इसकी विशेषता है।

नाना फडणवीस का सभामंडप

18वीं शताब्दी में मराठा काल के प्रसिद्ध प्रशासक नाना फडणवीस ने मंदिर का सभामंडप और शिखर सुधरवाया।

महाराष्ट्र के कई मंदिरों में यही क्रम दिखता है — गर्भगृह पुराना, मंडप बाद का। श्रद्धा पहले आती है, सुविधा बाद में; और दोनों मिलकर वह बनाते हैं जिसे हम आज मंदिर कहते हैं।

मंदिर काले पत्थर से बना है और शिवलिंग गर्भगृह के ठीक मध्य में स्थित है। लेखों में भीमाशंकर और भीमरथी का उल्लेख 13वीं शताब्दी तक मिलता है।

पुर्तगाली घंटा

मंदिर परिसर में शनि मंदिर के पास दो स्तंभों के बीच एक बड़ा घंटा लटका है — और उसकी कहानी मंदिर से भी अधिक अप्रत्याशित है।

यह घंटा मूलतः वसई किले के पुर्तगाली गिरजाघरों का है। सन् 1739 में वसई की लड़ाई में पुर्तगालियों पर विजय के बाद बाजीराव प्रथम के भाई चिमाजी अप्पा ने इसे भीमाशंकर को भेंट किया।

जो धातु कभी किसी और उपासना-पद्धति की पुकार थी, वह आज शिव के द्वार पर बजती है। भारत के मंदिरों में इतिहास इसी तरह परतों में जमा है — कुछ भी अलग-थलग नहीं रहता।

स्रोत: Bhimashankar Temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)

13वीं शताब्दी
मूल मंदिर का निर्माण; नागर/हेमाडपंथी शैली।
13वीं शताब्दी
लेखों में भीमाशंकर तथा भीमरथी नदी का उल्लेख।
1739 ई.
वसई की लड़ाई के बाद चिमाजी अप्पा द्वारा पुर्तगाली घंटा भेंट।
18वीं शताब्दी
नाना फडणवीस द्वारा सभामंडप व शिखर का निर्माण/सुधार।

दर्शन समय व आरती

मंदिर प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे से रात 9:30 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहता है।

आरतीसमयविवरण
मंदिर खुलना व प्रातः पूजाप्रातः 5:00 – 5:30इस अवधि में पूजा होती है।
दर्शन व अभिषेकप्रातः 5:30 – दोपहर 12:00
नैवेद्य पूजादोपहर 12:00 – 12:20इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं।
दर्शन व अभिषेकदोपहर 12:20 – 2:45
मध्याह्न पूजादोपहर 2:45 – 3:20इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं।
देव दर्शनदोपहर 3:20 – सायं 7:30
सायंकालीन पूजासायं 7:30 – 8:00इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं।
देव दर्शनरात्रि 8:00 – 9:30दिन का अंतिम दर्शन।

विशेष दर्शन व बुकिंग

  • मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूते-चप्पल बाहर उतारें; स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • मंदिर परिसर में माँस, मदिरा तथा हथियार पूर्णतः वर्जित हैं।
  • अधिक आभूषण व नकदी साथ न रखें; परिसर में मौन एवं "ॐ नमः शिवाय" जप की परंपरा है।
  • मंदिर कार्यालय: 02135 222 880 · office@shreebhimashankar.com

⚠️ वर्तमान में मंदिर परिसर में सभामंडप एवं सीढ़ियों का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसके कारण दर्शन केवल प्रातः 7:00 से 11:00 बजे तक ही हो रहे हैं। यह अस्थायी व्यवस्था नीचे दी गई सामान्य समय-सारणी पर भारी पड़ती है — यात्रा से पूर्व मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट अथवा कार्यालय से वर्तमान स्थिति अवश्य पूछ लें। पर्व के दिनों में भी समय बदलता है।

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से फरवरी तक मौसम अनुकूल रहता है। वर्षा ऋतु में सह्याद्रि का सौंदर्य अद्भुत होता है, पर मार्ग फिसलन भरा हो जाता है। सप्ताह के दिनों में प्रातः दर्शन सबसे शांत रहते हैं।

दर्शन व आरती समय 30 जुलाई 2026 को सत्यापित। श्रावण, पर्व व विशेष अवसरों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि अवश्य करें।

कैसे पहुंचें

हवाई मार्ग

पुणे अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

पुणे से भीमाशंकर लगभग 110 किमी है; टैक्सी व बस दोनों उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

पुणे जंक्शन

स्टेशन से आगे सड़क मार्ग से जाना होता है।

सड़क मार्ग

पुणे तथा मुंबई से नियमित बस सेवा उपलब्ध है। मार्ग पहाड़ी है और अंतिम कुछ किलोमीटर घुमावदार हैं।

  • पुणे — लगभग 110 किमी

अंतिम चरण: बस स्टैंड से मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ उतरनी होती हैं — मंदिर घाटी में नीचे की ओर है, इसलिए जाते समय उतराई और लौटते समय चढ़ाई पड़ती है।

सुगमता: सीढ़ियों के कारण वृद्ध व दिव्यांग श्रद्धालुओं को कठिनाई हो सकती है; डोली की व्यवस्था प्रायः उपलब्ध रहती है। वर्तमान स्थिति मंदिर कार्यालय से पूछ लें।

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य — मंदिर के चारों ओर फैला; दुर्लभ वनस्पति व जीव।
  • मोक्षकुंड तीर्थ — मंदिर के पीछे; परंपरा में दर्शन से पूर्व यहाँ स्नान किया जाता है।
  • गुप्त भीमाशंकर — वन में स्थित स्थान, जहाँ भीमा नदी का उद्गम माना जाता है।
  • हनुमान तालाब — मंदिर के समीप शांत स्थल।
  • नागफणी दृश्य बिंदु — सह्याद्रि घाटी का विहंगम दृश्य; ट्रेकिंग हेतु लोकप्रिय।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण मास, कार्तिक पूर्णिमा

वस्त्र: स्वच्छ व शालीन वस्त्र; मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूते-चप्पल बाहर उतारें।

प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।

ठहरने की व्यवस्था: भीमाशंकर में मंदिर ट्रस्ट की भक्त निवास व्यवस्था तथा कुछ निजी आवास उपलब्ध हैं। विकल्प सीमित हैं, इसलिए पर्व व सप्ताहांत पर बुकिंग पहले से कर लें।

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न