रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग
Rameshwaram Jyotirlinga
बारह में सबसे दक्षिण — परंपरा में श्रीराम द्वारा सेतुबंध के समय स्थापित माना जाता है।

महत्व
रामेश्वरम् तमिलनाडु के रामनाथपुरम ज़िले में एक द्वीप पर स्थित है — बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे दक्षिण। उत्तर में केदारनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम्; दोनों के बीच पूरा भारत आ जाता है।
यह स्थान शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं को जोड़ता है। यहाँ शिवलिंग है, पर उसे स्थापित करने वाले श्रीराम माने जाते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि शिव और विष्णु के भक्त अलग-अलग खेमे हैं, उनके लिए रामेश्वरम् एक शांत उत्तर है।
मंदिर की सबसे प्रसिद्ध विशेषता उसका तीसरा प्राकार है — विश्व का सबसे लंबा मंदिर गलियारा माना जाता है, जिसमें लगभग 1212 स्तंभ हैं। उसमें चलते हुए स्तंभों की कतार जहाँ तक नज़र जाए वहाँ तक दिखती रहती है।
यहाँ की दूसरी परंपरा है बाईस तीर्थों में स्नान। श्रद्धालु एक-एक कर सभी कुंडों में स्नान करते हैं, और फिर दर्शन को जाते हैं।
- बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे दक्षिण में स्थित।
- तीसरा प्राकार विश्व का सबसे लंबा मंदिर गलियारा माना जाता है — लगभग 1212 स्तंभ।
- मंदिर में दो लिंग हैं — रामलिंग तथा हनुमानजी द्वारा कैलाश से लाया गया विश्वलिंग; परंपरा में विश्वलिंग की पूजा पहले होती है।
- परिसर में बाईस तीर्थ हैं, जो परंपरा में श्रीराम के तरकश के बाईस बाणों के प्रतीक माने जाते हैं।
- चार धाम में भी सम्मिलित।
कथा
रामेश्वरम् की कथा युद्ध से पहले की है — जब जीतने से अधिक ज़रूरी यह था कि जीत का अधिकार मिले।
सेतुबंध से पूर्व
शिव पुराण के अनुसार लंका पर चढ़ाई से पूर्व श्रीराम ने इसी तट पर भगवान शिव की आराधना का निश्चय किया। वे चाहते थे कि युद्ध आरंभ करने से पहले शिव का आशीर्वाद मिल जाए।
यह विवरण अपने आप में उल्लेखनीय है। जिन्हें आगे चलकर स्वयं भगवान माना गया, वे युद्ध से पहले किसी और के सामने नत हुए।
दो लिंग
परंपरा कहती है कि पूजा के लिए शिवलिंग लाने हनुमानजी कैलाश गए। पर मुहूर्त निकट आ गया और वे समय पर नहीं लौट सके।
तब माता सीता ने बालू से एक लिंग बना दिया, और श्रीराम ने उसी की पूजा की। वही रामलिंग कहलाया।
हनुमानजी लौटे तो उन्हें दुख हुआ। श्रीराम ने उनका मान रखा — उनके लाए हुए लिंग को विश्वलिंग के रूप में स्थापित किया और यह विधान किया कि पूजा में पहले विश्वलिंग का दर्शन होगा, फिर रामलिंग का।
यह क्रम आज भी निभाया जाता है।
कथा का भाव
इस कथा में जो बात सबसे कोमल है, वह यह है कि श्रीराम ने किसी को छोटा नहीं होने दिया।
सीता का बनाया लिंग भी रहा, हनुमान का लाया लिंग भी रहा — और पहला स्थान उसे मिला जो देर से आया था। जो नेतृत्व अपने साथी के मन का इतना ध्यान रखे, उसके पीछे लोग समुद्र भी पार कर जाते हैं।
भगवान शिव प्रसन्न हुए और श्रीराम को विजय का वरदान दिया।
स्रोत: शिव पुराण (रामेश्वर माहात्म्य); रामलिंग-विश्वलिंग परंपरा — en.wikipedia.org/wiki/Ramanathaswamy_Temple से सत्यापित
इतिहास
रामेश्वरम् का वर्तमान स्वरूप सदियों में बना — और उसमें केवल भारत के ही नहीं, समुद्र पार के शासकों का भी योगदान है।
पांड्य और जाफना
12वीं शताब्दी में पांड्य वंश ने मंदिर का विस्तार किया। आगे चलकर जाफना (श्रीलंका) के राजाओं ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया — राजा जयवीर सिंगैआर्यन (1380–1410 ई.) ने गर्भगृह का जीर्णोद्धार कराया।
एक मंदिर जिसे समुद्र के दोनों ओर के शासकों ने सँवारा हो — यह अपने आप में उस काल के सांस्कृतिक संबंधों की कहानी कहता है।
तीसरा प्राकार
मंदिर की सबसे प्रसिद्ध रचना, तीसरा प्राकार, राजा मुथुरामलिंग सेतुपति (1763–1795) के काल में बना।
यह लगभग 6.9 मीटर ऊँचा है, पूर्व व पश्चिम में लगभग 400 फुट और उत्तर व दक्षिण में लगभग 640 फुट लंबा, और इसमें लगभग 1212 स्तंभ हैं। भारत के समस्त हिंदू मंदिरों में यह सबसे लंबा गलियारा माना जाता है।
स्रोत: Ramanathaswamy Temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)
दर्शन समय व आरती
मंदिर प्रतिदिन प्रातः 5:00 – दोपहर 1:00 तथा दोपहर 3:00 – रात्रि 9:00 दर्शन हेतु खुला रहता है।
| आरती | समय | विवरण |
|---|---|---|
| पल्लियरै दीप आराधना | प्रातः 5:00 | दिन की पहली आराधना। |
| स्फटिकलिंग पूजा | प्रातः 5:10 | — |
| तिरुवनंदल | प्रातः 5:45 | — |
| विला पूजा | प्रातः 7:00 | — |
| कालसंधि | प्रातः 10:00 | — |
| उच्चिकाल | दोपहर 12:00 | — |
| सायरक्षा | सायं 6:00 | — |
| अर्धजाम | रात्रि 8:30 | — |
| पल्लियरै पूजा | रात्रि 8:45 | दिन की अंतिम पूजा। |
विशेष दर्शन व बुकिंग
- बाईस तीर्थों में स्नान की परंपरा है; इसके लिए परिसर में अलग टिकट लेना होता है और शुल्क नाममात्र रहता है।
- अग्नि तीर्थ समुद्र में है और सबसे प्रसिद्ध माना जाता है; परंपरा में पहले यहाँ स्नान कर फिर मंदिर में प्रवेश किया जाता है।
- परंपरा के अनुसार पूजा में पहले विश्वलिंग का दर्शन होता है, फिर रामलिंग का।
- दर्शन का समय, तीर्थ स्नान का शुल्क तथा व्यवस्था समय-समय पर बदलती रहती है — यात्रा से पूर्व मंदिर प्रशासन से पुष्टि कर लें।
दोपहर 1:00 से 3:00 बजे तक दर्शन में विराम रहता है। पर्व के दिनों में व्यवस्था बदलती है।
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक तटीय मौसम अनुकूल रहता है। महाशिवरात्रि तथा तमिल पर्वों पर विशेष महत्व।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग
मदुरै हवाई अड्डा
मदुरै से रामेश्वरम् सड़क व रेल दोनों मार्गों से जुड़ा है।
रेल मार्ग
रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन
रेल मार्ग पंबन पुल से होकर द्वीप तक आता है — यह यात्रा अपने आप में स्मरणीय रहती है।
सड़क मार्ग
रामेश्वरम् पंबन सड़क पुल द्वारा मुख्य भूमि से जुड़ा है; मदुरै व चेन्नई से बस सेवा उपलब्ध है।
अंतिम चरण: स्टेशन व बस स्टैंड से मंदिर तक ऑटो सहज उपलब्ध हैं; दूरी अधिक नहीं है।
सुगमता: मंदिर परिसर विशाल है और गलियारे लंबे हैं; चलने में कठिनाई हो तो समय अधिक लेकर चलें। वर्तमान व्यवस्था मंदिर प्रशासन से पूछ लें।
आसपास के दर्शनीय स्थल
- अग्नि तीर्थ — मंदिर के समीप समुद्र तट; स्नान की परंपरा।
- धनुषकोडि — द्वीप का अंतिम छोर; 1964 के चक्रवात के बाद उजड़ा नगर।
- पंबन पुल — समुद्र पर बना रेल पुल; रामेश्वरम् की पहचान।
- गंधमादन पर्वत — द्वीप का सबसे ऊँचा स्थान; श्रीराम के चरण-चिह्न की मान्यता।
- डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्मारक — रामेश्वरम् में ही स्थित।
यात्रा सुझाव
प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, राम नवमी, थै अमावस्या, आदि अमावस्या
वस्त्र: शालीन एवं पारंपरिक वस्त्र उपयुक्त रहते हैं। तीर्थ स्नान के बाद बदलने के लिए वस्त्र साथ रखें।
प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।
ठहरने की व्यवस्था: रामेश्वरम् में धर्मशालाएँ, गेस्ट हाउस व होटल उपलब्ध हैं। पर्व व अवकाश के दिनों में बुकिंग पहले से कर लें।
