ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग
Omkareshwar Jyotirlinga
नर्मदा के बीच ॐ के आकार वाले मांधाता द्वीप पर स्थित ज्योतिर्लिंग।

महत्व
ओंकारेश्वर नर्मदा के बीच बसे एक द्वीप पर है, और परंपरा कहती है कि इस द्वीप का आकार ही ॐ जैसा है। नाम इसी से बना — ओंकार अर्थात् ॐ, और ओंकारेश्वर अर्थात् ॐ के ईश्वर।
यहाँ पहुँचने पर सबसे पहले नर्मदा मिलती है। नदी पार किए बिना दर्शन नहीं होते, और यही इस तीर्थ का अपना स्वभाव बना देता है। पानी को पार करना हर परंपरा में एक ही बात कहता रहा है — कुछ पीछे छोड़कर आना।
एक और विशेषता है जो इसे बाकी ज्योतिर्लिंगों से अलग करती है। यहाँ दो मंदिर हैं — द्वीप पर ओंकारेश्वर और नर्मदा के दक्षिण तट पर ममलेश्वर। परंपरा दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप मानती है, इसलिए श्रद्धालु प्रायः दोनों के दर्शन करते हैं। एक ही सत्य के दो रूप — यह भाव यहाँ पत्थर में उतरा हुआ है।
- नर्मदा के बीच स्थित मांधाता द्वीप पर — परंपरा के अनुसार द्वीप का आकार ॐ जैसा है।
- दो मंदिर — द्वीप पर ओंकारेश्वर और दक्षिण तट पर ममलेश्वर (अमलेश्वर); दोनों एक ही ज्योतिर्लिंग के स्वरूप माने जाते हैं।
- दर्शन के लिए नर्मदा पार करनी होती है — नाव अथवा पुल से।
- नर्मदा परिक्रमा करने वाले साधुओं का यह एक प्रमुख पड़ाव है।
- मांधाता द्वीप लगभग 4 किमी लंबा और 2.6 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है।
- शिव मंदिर के नीचे वह गुफा, जहाँ परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य को उनके गुरु मिले।
कथा
ओंकारेश्वर से दो कथाएँ जुड़ी हैं — एक पर्वत की, और एक राजा की। दोनों एक ही बात कहती हैं।
विंध्य की तपस्या
परंपरा कहती है कि विंध्य पर्वत के अधिष्ठाता देव ने स्वयं को शुद्ध करने के लिए यहाँ कठोर तप किया। उन्होंने बालू का शिवलिंग बनाकर पूजा की — कोई मूल्यवान सामग्री नहीं, बस नदी की रेत।
भगवान शिव प्रसन्न हुए और यहीं दो रूपों में प्रकट हुए — ओंकारेश्वर और अमलेश्वर। इसीलिए आज भी यहाँ दो मंदिर हैं, और श्रद्धालु दोनों के दर्शन को एक ही यात्रा का भाग मानते हैं।
राजा मांधाता
दूसरी कथा इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधाता की है — उसी वंश के, जिसमें आगे चलकर श्रीराम हुए। मांधाता ने इसी स्थान पर भगवान शिव की आराधना की और उनके तप से प्रसन्न होकर शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में स्थित हुए।
कुछ आख्यान उनके पुत्रों अंबरीष और मुचुकुंद की कठिन तपस्या का भी उल्लेख करते हैं। इसी कारण यह द्वीप मांधाता कहलाया।
दोनों कथाओं में एक बात समान है — यहाँ शिव किसी युद्ध या संहार के कारण नहीं, किसी की लंबी और धैर्यपूर्ण साधना के कारण प्रकट हुए। ओंकारेश्वर का स्वभाव इसीलिए शांत है, नर्मदा की तरह।
स्रोत: शिव पुराण (ओंकारेश्वर माहात्म्य)
इतिहास
ओंकारेश्वर का वर्तमान मंदिर दो कालों की देन है — एक ने इसे बनाया, दूसरे ने इसे फिर खड़ा किया।
परमार काल
वर्तमान मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार राजाओं के समय हुआ माना जाता है। मालवा का यह काल मंदिर-निर्माण और विद्या दोनों के लिए जाना जाता है, और ओंकारेश्वर उसी परंपरा का अंग है।
आदि शंकराचार्य की गुफा
ओंकारेश्वर से जुड़ी एक और स्मृति है, जो मंदिर से भी गहरी उतरती है। परंपरा कहती है कि आदि शंकराचार्य की भेंट अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से यहीं एक गुफा में हुई थी।
वह गुफा आज भी है — शिव मंदिर के ठीक नीचे, जहाँ आदि शंकराचार्य की प्रतिमा स्थापित है।
जिस बालक ने यहाँ गुरु पाया, उसने आगे चलकर पूरे भारत में मठ स्थापित किए और वेदांत को नया जीवन दिया। किसी एक गुफा में हुई भेंट कहाँ तक पहुँच सकती है — ओंकारेश्वर इसका उत्तर है।
होल्कर काल में पुनर्निर्माण
मध्यकाल में मंदिर को क्षति पहुँची। आगे चलकर 18वीं शताब्दी में होल्कर शासकों ने इसका पुनर्निर्माण कराया, जिसे अहिल्याबाई होल्कर ने पूर्ण किया।
अहिल्याबाई का नाम भारत के कई तीर्थों में इसी तरह मिलता है — काशी में, सोमनाथ में, यहाँ। जहाँ-जहाँ पूजा का क्रम टूटा, वहाँ उन्होंने उसे जोड़ा। एक शासक का इससे बड़ा स्मारक और क्या होगा।
स्रोत: Omkareshwar Temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)
दर्शन समय व आरती
मंदिर प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे से रात 10:30 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहता है।
| आरती | समय | विवरण |
|---|---|---|
| मंगल आरती व भोग | प्रातः 4:30 – 5:00 | इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं। |
| मंगल दर्शन | प्रातः 5:00 – दोपहर 12:20 | — |
| मध्याह्न भोग | दोपहर 12:20 – 1:15 | इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं। |
| मध्याह्न दर्शन | दोपहर 1:15 – सायं 4:00 | — |
| सायंकालीन शृंगार | सायं 4:00 – 4:30 | इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं। |
| शृंगार दर्शन | सायं 4:30 – रात्रि 9:30 | — |
| शयन आरती | रात्रि 9:30 – 10:00 | इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं। |
| शयन दर्शन | रात्रि 10:00 – 10:30 | दिन का अंतिम दर्शन। |
विशेष दर्शन व बुकिंग
- आरती तथा शृंगार की अवधि में दर्शन बंद रहते हैं — समय देखकर पहुँचना ठीक रहता है।
- प्रातः 5:00 बजे से पूर्व और रात्रि 10:30 बजे के बाद दर्शन नहीं होते।
- द्वीप तक पहुँचने के लिए नर्मदा पार करनी होती है — पुल तथा नाव दोनों विकल्प उपलब्ध हैं।
- ममलेश्वर मंदिर नर्मदा के दक्षिण तट पर है; श्रद्धालु प्रायः दोनों के दर्शन करते हैं।
पर्व व विशेष अवसरों पर दर्शन का समय बदल सकता है। वर्षा ऋतु में नर्मदा का जलस्तर बढ़ने पर नाव की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक मौसम अनुकूल रहता है। श्रावण मास व महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व, पर भीड़ भी अधिक।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग
देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा, इंदौर
इंदौर से ओंकारेश्वर के लिए टैक्सी व बस उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग
खंडवा जंक्शन
मऊ (डॉ. आंबेडकर नगर) भी एक विकल्प है; दोनों स्टेशनों से सड़क मार्ग से आगे जाना होता है।
सड़क मार्ग
इंदौर, खंडवा व उज्जैन से नियमित बस सेवा उपलब्ध है; सड़क मार्ग अच्छा है।
अंतिम चरण: द्वीप तक पहुँचने के लिए नर्मदा पार करनी होती है — पुल से पैदल अथवा नाव द्वारा। मंदिर तक अंतिम दूरी सीढ़ियों व सँकरी गलियों से तय होती है।
सुगमता: सीढ़ियाँ और सँकरे मार्ग होने के कारण वृद्ध व दिव्यांग श्रद्धालुओं को सहायता की आवश्यकता हो सकती है; वर्तमान व्यवस्था मंदिर प्रशासन से पूछ लेना ठीक रहता है।
आसपास के दर्शनीय स्थल
- ममलेश्वर मंदिर — नर्मदा के दक्षिण तट पर; ओंकारेश्वर के साथ ही दर्शन किए जाते हैं।
- आदि शंकराचार्य गुफा — शिव मंदिर के नीचे; यहीं उन्हें गुरु गोविंद भगवत्पाद मिले माने जाते हैं।
- सिद्धनाथ मंदिर — द्वीप पर स्थित प्राचीन मंदिर।
- नर्मदा-कावेरी संगम — द्वीप के समीप संगम स्थल।
- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग — मध्य प्रदेश का दूसरा ज्योतिर्लिंग, उज्जैन में — प्रायः साथ ही दर्शन किए जाते हैं।
यात्रा सुझाव
प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण मास, नर्मदा जयंती, कार्तिक पूर्णिमा
वस्त्र: शालीन वस्त्र आवश्यक।
प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।
ठहरने की व्यवस्था: ओंकारेश्वर में धर्मशालाएँ व मध्यम श्रेणी के होटल उपलब्ध हैं। श्रावण व महाशिवरात्रि पर बुकिंग पहले से कर लेना ठीक रहता है।
