काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

Kashi Vishwanath Jyotirlinga

काशी की अविमुक्त भूमि पर — शिव मंदिरों में सर्वाधिक पूज्य माना जाने वाला धाम।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग — प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

महत्व

काशी विश्वनाथ वाराणसी में गंगा के तट पर स्थित है। "विश्वनाथ" अर्थात् विश्व के नाथ — और यह नाम इस स्थान के भाव को पूरा कह देता है।

परंपरा काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहती है — वह भूमि जिसे भगवान शिव कभी नहीं छोड़ते। दूसरे तीर्थों में भक्त शिव के पास जाता है; काशी के विषय में कहा गया कि यहाँ शिव स्वयं सदा उपस्थित रहते हैं। इसीलिए इसे शिव की अपनी नगरी कहा जाता है।

काशी के साथ मोक्ष की मान्यता भी जुड़ी है। जो यहाँ देह त्यागता है, उसे मुक्ति मिलती है — यह विश्वास सदियों से करोड़ों लोगों को यहाँ खींचता रहा है। जिस नगर में मृत्यु भी शुभ मानी जाए, वहाँ जीवन को देखने का ढंग ही अलग हो जाता है।

घाट, गलियाँ, गंगा और मंदिर — काशी में ये अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। यही कारण है कि यहाँ आकर दर्शन के बाद भी लोग रुक जाते हैं।

  • शिव मंदिरों में सर्वाधिक पूज्य माना जाता है; काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है।
  • प्रतिदिन पाँच आरतियाँ होती हैं — मंगला, भोग, सप्तऋषि, शृंगार तथा शयन।
  • मंदिर का शिखर स्वर्ण-मंडित है; 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके लिए स्वर्ण भेंट किया।
  • दिसंबर 2021 में काशी विश्वनाथ धाम गलियारा बना, जिसने मंदिर को सीधे गंगा से जोड़ दिया।
  • मंदिर प्रातः 2:30 बजे खुल जाता है — बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे जल्दी।

कथा

काशी की कथा किसी असुर के वध की नहीं है। यह उस नगरी की कथा है जिसे शिव ने अपने लिए चुना।

ज्योति स्तंभ और काशी

परंपरा कहती है कि जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब भगवान शिव उनके सामने अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। न कोई ऊपर से उसका छोर पा सका, न नीचे से।

यही वह प्रसंग है जिससे समस्त ज्योतिर्लिंगों की परंपरा आरंभ होती है, और काशी उस परंपरा के केंद्र में मानी जाती है।

अविमुक्त क्षेत्र

शास्त्रों में काशी को "अविमुक्त" कहा गया है — अर्थात् वह स्थान जिसे शिव ने कभी नहीं छोड़ा और न छोड़ेंगे।

परंपरा यह भी कहती है कि प्रलय के समय भी काशी नष्ट नहीं होती; भगवान शिव उसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं। जब सब कुछ मिट जाए, तब भी एक स्थान बचा रहे — यह कल्पना अपने आप में बहुत कुछ कहती है।

कथा का भाव

काशी के विषय में सबसे सुंदर बात यह कही गई कि यहाँ शिव भक्त की प्रतीक्षा नहीं कराते। वे पहले से यहीं हैं।

जो मन बार-बार सोचता हो कि भगवान दूर हैं, उसके लिए काशी का उत्तर सीधा है — दूरी तुम्हारी है, उनकी नहीं। और शायद इसीलिए यहाँ आकर सबसे पहले जो टूटता है, वह प्रतीक्षा का भाव है।

स्रोत: शिव पुराण (लिंगोद्भव व काशी माहात्म्य); en.wikipedia.org/wiki/Kashi_Vishwanath_Temple से सत्यापित

इतिहास

काशी विश्वनाथ का इतिहास ध्वंस और पुनर्निर्माण के लंबे क्रम का इतिहास है — और उसमें एक नाम बार-बार लौटता है।

ध्वंस और पुनर्निर्माण का क्रम

सन् 1194 में मूल मंदिर ध्वस्त हुआ। 1585 में अकबर के काल में मान सिंह प्रथम और राजा टोडरमल ने इसे पुनः बनवाया। सन् 1669 में मंदिर को फिर गिराया गया।

ये तिथियाँ यहाँ इसलिए दी गई हैं कि इतिहास को जानना श्रद्धा का विरोधी नहीं है। पर इस पृष्ठ का विषय मंदिर है — इससे जुड़े वर्तमान विवादों पर यह कुछ नहीं कहता।

अहिल्याबाई होल्कर

सन् 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पास ही वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया। आज जिस मंदिर में दर्शन होते हैं, वह उन्हीं का बनवाया हुआ है।

अहिल्याबाई का नाम भारत के अनेक तीर्थों में इसी रूप में मिलता है — सोमनाथ में, ओंकारेश्वर में, यहाँ। जहाँ पूजा का क्रम टूटा, वहाँ उन्होंने उसे जोड़ा। किसी शासक के लिए इससे बड़ा स्मारक क्या होगा।

स्वर्ण शिखर और काशी विश्वनाथ धाम

सन् 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर स्वर्ण-मंडन के लिए लगभग एक टन स्वर्ण भेंट किया, जिससे मंदिर को "स्वर्ण मंदिर" भी कहा जाने लगा।

दिसंबर 2021 में काशी विश्वनाथ धाम गलियारे का लोकार्पण हुआ, जिसने मंदिर को सीधे गंगा तट से जोड़ दिया। इसी कारण दर्शन-व्यवस्था और पहुँचने का मार्ग दोनों बदल गए — पुरानी जानकारी अब काम नहीं आती।

स्रोत: Kashi Vishwanath Temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)

1194 ई.
मूल मंदिर ध्वस्त।
1585 ई.
मान सिंह प्रथम व राजा टोडरमल द्वारा पुनर्निर्माण।
1669 ई.
मंदिर पुनः गिराया गया।
1780 ई.
महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण।
1835 ई.
महाराजा रणजीत सिंह द्वारा शिखर हेतु लगभग एक टन स्वर्ण भेंट।
13 दिसंबर 2021
काशी विश्वनाथ धाम गलियारे का लोकार्पण; मंदिर सीधे गंगा से जुड़ा।

दर्शन समय व आरती

मंदिर प्रतिदिन प्रातः 2:30 बजे से रात्रि 11:00 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहता है।

आरतीसमयविवरण
मंगला आरतीप्रातः 3:00 – 4:00इसमें केवल टिकटधारी श्रद्धालु सम्मिलित हो सकते हैं।
सामान्य दर्शनप्रातः 4:00 – 11:00
भोग आरतीप्रातः 11:30 – दोपहर 12:00इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं।
दोपहर दर्शनदोपहर 12:00 – सायं 7:00
सप्तऋषि आरतीसायं 7:00 – 8:30इसके पश्चात रात्रि 9:00 बजे तक दर्शन।
शृंगार/भोग आरतीरात्रि 9:00 से
शयन आरतीरात्रि 10:30 सेदिन की अंतिम आरती।

विशेष दर्शन व बुकिंग

  • सामान्य दर्शन निःशुल्क है। सुगम दर्शन तथा आरती की बुकिंग केवल आधिकारिक पोर्टल shrikashivishwanath.org से करें — कोई अन्य वेबसाइट अधिकृत नहीं है।
  • मंगला आरती में सम्मिलित होने के लिए टिकट आवश्यक है।
  • काशी विश्वनाथ धाम गलियारे से मंदिर सीधे गंगा तट से जुड़ा है; प्रवेश निःशुल्क है।
  • दिसंबर 2021 से पूर्व की समय-सारणी अब लागू नहीं है — पुराने स्रोतों पर भरोसा न करें।

भोग आरती (प्रातः 11:30 – दोपहर 12:00) के समय दर्शन बंद रहते हैं। श्रावण मास, महाशिवरात्रि व देव दीपावली पर व्यवस्था बदल जाती है।

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक मौसम अनुकूल रहता है। महाशिवरात्रि, श्रावण सोमवार और देव दीपावली पर विशेष महत्व, पर भीड़ भी सर्वाधिक।

दर्शन व आरती समय 30 जुलाई 2026 को सत्यापित। श्रावण, पर्व व विशेष अवसरों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि अवश्य करें।

कैसे पहुंचें

हवाई मार्ग

लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, बाबतपुर (वाराणसी)

हवाई अड्डे से मंदिर तक टैक्सी व कैब सहज उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

वाराणसी जंक्शन

बनारस तथा काशी स्टेशन भी विकल्प हैं; तीनों देश के प्रमुख नगरों से जुड़े हैं।

सड़क मार्ग

वाराणसी उत्तर प्रदेश व पड़ोसी राज्यों से नियमित बस सेवा से जुड़ा है।

अंतिम चरण: मंदिर तक अंतिम दूरी पैदल तय करनी होती है — गलियाँ सँकरी हैं और वाहन निकट तक नहीं जाते। गलियारा बनने के बाद गंगा घाट की ओर से भी प्रवेश संभव है।

सुगमता: गलियारे के बनने से परिसर पहले की तुलना में अधिक सुगम हुआ है। वृद्ध व दिव्यांग श्रद्धालुओं हेतु वर्तमान व्यवस्था मंदिर प्रशासन से पूछ लें।

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • दशाश्वमेध घाट — गंगा आरती का प्रमुख घाट; संध्या आरती प्रसिद्ध है।
  • मणिकर्णिका घाट — काशी का प्रमुख महाश्मशान; मोक्ष की मान्यता से जुड़ा।
  • काल भैरव मंदिर — काशी के कोतवाल; परंपरा में इनके दर्शन का विशेष क्रम है।
  • संकट मोचन हनुमान मंदिर — तुलसीदास से जुड़ा प्रसिद्ध मंदिर।
  • सारनाथ — बुद्ध का प्रथम उपदेश स्थल; वाराणसी के समीप।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण सोमवार, देव दीपावली, रंगभरी एकादशी

वस्त्र: शालीन वस्त्र। मंदिर परिसर में मोबाइल व अन्य वस्तुओं पर प्रतिबंध रहता है; जमा कराने की व्यवस्था उपलब्ध है।

प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।

ठहरने की व्यवस्था: वाराणसी में हर बजट की धर्मशालाएँ, गेस्ट हाउस व होटल उपलब्ध हैं। श्रावण, महाशिवरात्रि व देव दीपावली पर बुकिंग पहले से आवश्यक।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न