मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

Mallikarjuna Jyotirlinga

श्रीशैल पर्वत पर वह विरल स्थान जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ एक साथ विराजते हैं।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग — प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र

महत्व

मल्लिकार्जुन आंध्र प्रदेश के श्रीशैल पर्वत पर, कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। स्थानीय परंपरा में यहाँ की कृष्णा को पाताल गंगा कहा जाता है, और पर्वत को दक्षिण कैलाश।

इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ शिव और शक्ति एक साथ हैं — मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और भ्रमराम्बा देवी शक्तिपीठ, दोनों एक ही परिसर में। बारह ज्योतिर्लिंगों और अठारह महाशक्तिपीठों की सूचियाँ अलग-अलग चलती हैं; वे यहाँ मिल जाती हैं। यह संयोग बहुत कम स्थानों पर है।

नाम भी सुंदर है। परंपरा कहती है कि यहाँ लिंग की पूजा मल्लिका अर्थात् चमेली के फूलों से होती थी, और उसी से नाम बना मल्लिकार्जुन। जिस देवता के नाम में एक फूल हो, उसके पास जाने में डर कम और आत्मीयता अधिक रह जाती है।

  • ज्योतिर्लिंग और महाशक्तिपीठ दोनों एक ही स्थान पर — भ्रमराम्बा देवी यहीं विराजती हैं।
  • श्रीशैल पर्वत को दक्षिण कैलाश कहा जाता है।
  • कृष्णा नदी यहाँ पाताल गंगा कहलाती है।
  • अभिलेखीय प्रमाण मंदिर की उपस्थिति को सातवाहन काल (लगभग दूसरी शताब्दी) तक ले जाते हैं।
  • परिसर लगभग दो हेक्टेयर में; चार गोपुरम तथा लगभग साढ़े आठ मीटर ऊँची प्राचीर।
  • गर्भगृह परिसर का सबसे प्राचीन भाग — सातवीं शताब्दी तक जाता है।

कथा

मल्लिकार्जुन की कथा एक रूठे हुए पुत्र की है — और उन माता-पिता की, जो उसे मनाने स्वयं चले आए।

कार्तिकेय का रूठना

परंपरा कहती है कि जब शिव और पार्वती ने अपने पुत्रों के विवाह की बात चलाई, तो कार्तिकेय को लगा कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ। रुष्ट होकर वे कैलाश छोड़कर क्रौंच पर्वत पर चले आए और वहीं रहने लगे।

माता-पिता का मन नहीं माना। पुत्र को मनाने के लिए शिव और पार्वती स्वयं उस पर्वत पर आए। जहाँ वे ठहरे, वही स्थान आगे चलकर श्रीशैल कहलाया।

चमेली के फूल

परंपरा के अनुसार यहाँ शिवलिंग की पूजा मल्लिका — अर्थात् चमेली — के फूलों से की जाती थी। इसी से भगवान का नाम मल्लिकार्जुन पड़ा।

कुछ आख्यान इसे इस रूप में भी कहते हैं कि मल्लिका पार्वती का और अर्जुन शिव का सूचक है — अर्थात् नाम में ही दोनों साथ हैं। और यह बात इस स्थान पर सचमुच उतरी हुई है, क्योंकि यहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ अलग-अलग नहीं, साथ-साथ हैं।

भ्रमराम्बा देवी

यहाँ शिव अकेले नहीं हैं। उसी परिसर में भ्रमराम्बा देवी विराजती हैं, जिन्हें माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है।

शक्तिपीठों की परंपरा कहती है कि सती के देह-त्याग के पश्चात उनके अंग जिन-जिन स्थानों पर गिरे, वे शक्तिपीठ बने। श्रीशैलम् के विषय में मान्यता है कि यहाँ सती देवी का ग्रीवा भाग गिरा।

इसीलिए यहाँ आने वाला श्रद्धालु दोनों के दर्शन करता है — शिव के भी और शक्ति के भी। बारह ज्योतिर्लिंगों में यह संयोग और कहीं इस रूप में नहीं मिलता।

कथा का भाव

इस कथा में न कोई असुर है, न कोई युद्ध। बस एक नाराज़ पुत्र है और उसके पीछे-पीछे चले आए माता-पिता।

शायद इसीलिए श्रीशैल का स्वभाव कोमल है। जो लोग किसी अपने से रूठकर बैठे हों, या जिनका कोई अपना रूठा हो, उनके लिए यह स्थान कुछ कहता है — कि मनाने के लिए चलकर जाना पड़ता है, और उसमें छोटा कोई नहीं होता।

स्रोत: शिव पुराण (मल्लिकार्जुन माहात्म्य); नाम-व्युत्पत्ति en.wikipedia.org/wiki/Mallikarjuna_Jyotirlinga से सत्यापित

इतिहास

श्रीशैल उन थोड़े से तीर्थों में है जिनकी प्राचीनता केवल परंपरा से नहीं, पत्थर पर खुदे अभिलेखों से भी प्रमाणित होती है।

सातवाहन काल के प्रमाण

अभिलेखीय साक्ष्य मंदिर की उपस्थिति को लगभग दूसरी शताब्दी, सातवाहन काल तक ले जाते हैं। इसका अर्थ है कि यह स्थान लगभग दो हज़ार वर्षों से एक जीवंत तीर्थ रहा है।

मध्यकालीन संरक्षण

12वीं–13वीं शताब्दी में रेड्डि राजाओं और आगे 14वीं–15वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के हरिहर प्रथम जैसे शासकों ने मंदिर को संरक्षण दिया। परिसर की प्राचीर और मंडप इसी काल की देन मानी जाती है।

दक्षिण भारत के अनेक बड़े मंदिरों की तरह यहाँ भी निर्माण एक बार में नहीं हुआ — सदियों में परतें चढ़ती गईं, और हर परत किसी न किसी काल की श्रद्धा है।

परिसर और स्थापत्य

मंदिर परिसर लगभग दो हेक्टेयर में फैला है और इसमें चार गोपुरम हैं। चारों ओर की प्राचीर लगभग 183 मीटर लंबी, 152 मीटर चौड़ी और साढ़े आठ मीटर ऊँची है — इतनी ऊँची दीवार अपने आप में बताती है कि यह केवल मंदिर नहीं, एक दुर्ग जैसा परिसर रहा है।

जिस गर्भगृह में मल्लिकार्जुन विराजते हैं, वह परिसर का सबसे प्राचीन भाग माना जाता है और सातवीं शताब्दी तक जाता है। मुख मंडप विजयनगर काल का है, जिसके स्तंभों पर की गई नक्काशी देखने योग्य है।

रेड्डि काल में वीरशिरोमंडपम् तथा पातालगंगा तक उतरने वाली सीढ़ियाँ बनीं। यानी जिस रास्ते से आज श्रद्धालु कृष्णा तक जाते हैं, वह लगभग आठ सौ वर्ष पुराना है।

स्रोत: Mallikarjuna Jyotirlinga — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)

लगभग दूसरी शताब्दी
सातवाहन कालीन अभिलेखों में मंदिर की उपस्थिति के प्रमाण।
12वीं–13वीं शताब्दी
रेड्डि राजाओं का संरक्षण।
7वीं शताब्दी
मल्लिकार्जुन का गर्भगृह — परिसर का सबसे प्राचीन भाग।
12वीं–13वीं शताब्दी
रेड्डि काल में वीरशिरोमंडपम् तथा पातालगंगा की सीढ़ियों का निर्माण।
14वीं–15वीं शताब्दी
विजयनगर साम्राज्य (हरिहर प्रथम आदि) द्वारा संरक्षण व विस्तार; मुख मंडप इसी काल का।

दर्शन समय व आरती

मंदिर प्रतिदिन प्रातः 4:30 – दोपहर 1:00 तथा सायं 6:00 – रात्रि 9:00 दर्शन हेतु खुला रहता है।

आरतीसमयविवरण
प्रातःकालीन दर्शनप्रातः 4:30 – दोपहर 1:00दिन का आरंभ सुप्रभात सेवा से होता है।
सायंकालीन दर्शनसायं 6:00 – रात्रि 9:00संध्या आरती व रात्रि पूजा इसी अवधि में।

विशेष दर्शन व बुकिंग

  • स्पर्श दर्शन तथा विभिन्न सेवाओं की बुकिंग देवस्थानम् की आधिकारिक वेबसाइट से होती है।
  • महाशिवरात्रि पर दर्शन का समय बढ़ाकर प्रातः 4:30 से रात्रि 10:00 तक कर दिया जाता है।
  • श्रावण मास तथा सप्ताहांत पर स्पर्श दर्शन हेतु अतिरिक्त समय रखा जाता है।
  • भ्रमराम्बा देवी शक्तिपीठ इसी परिसर में है; श्रद्धालु प्रायः दोनों के दर्शन करते हैं।

दोपहर 1:00 से सायं 6:00 तक दर्शन में विराम रहता है। पर्व व विशेष अवसरों पर समय बदलता है।

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से फरवरी तक पर्वतीय मौसम अनुकूल रहता है। महाशिवरात्रि व उगादि पर विशेष महत्व, पर भीड़ भी अधिक।

दर्शन व आरती समय 30 जुलाई 2026 को सत्यापित। श्रावण, पर्व व विशेष अवसरों पर समय बदलता है — यात्रा से पूर्व मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट से पुष्टि अवश्य करें।

कैसे पहुंचें

हवाई मार्ग

राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद — लगभग 213 किमी

कुरनूल हवाई अड्डा भी एक विकल्प है और दूरी में निकट पड़ता है।

रेल मार्ग

मार्कापुर रोड — लगभग 85 किमी

स्टेशन से श्रीशैलम् तक सड़क मार्ग से आगे जाना होता है।

सड़क मार्ग

हैदराबाद, कुरनूल व विजयवाड़ा से नियमित बस सेवा उपलब्ध है। मार्ग नल्लमला वन क्षेत्र से होकर जाता है।

अंतिम चरण: बस स्टैंड से मंदिर तक ऑटो व स्थानीय वाहन उपलब्ध हैं। मंदिर परिसर पर्वत के ऊपर स्थित है।

सुगमता: परिसर में सीढ़ियाँ हैं; वृद्ध व दिव्यांग श्रद्धालुओं हेतु वर्तमान व्यवस्था देवस्थानम् से पूछ लेना ठीक रहता है।

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • भ्रमराम्बा देवी शक्तिपीठ — अठारह महाशक्तिपीठों में एक; इसी परिसर में।
  • पाताल गंगा (कृष्णा तट) — स्नान हेतु प्रमुख घाट; रोपवे की व्यवस्था रहती है।
  • शिखरेश्वर मंदिर — श्रीशैल शिखर, जहाँ से मंदिर का शिखर दर्शन होता है।
  • नल्लमला वन व श्रीशैलम् बाँध — मार्ग में पड़ने वाला प्राकृतिक क्षेत्र।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, उगादि, श्रावण मास, नवरात्रि (भ्रमराम्बा देवी)

वस्त्र: शालीन एवं पारंपरिक वस्त्र उपयुक्त रहते हैं।

प्रसाद: प्रसाद देवस्थानम् के अधिकृत काउंटर से लें।

ठहरने की व्यवस्था: देवस्थानम् द्वारा संचालित अतिथि गृह तथा श्रीशैलम् में धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं। महाशिवरात्रि पर बुकिंग पहले से आवश्यक।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न