सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
Somnath Jyotirlinga
सागर तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग — इतिहास में कई बार ध्वस्त हुआ और हर बार पुनः खड़ा हुआ।

महत्व
सोमनाथ को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। मंदिर अरब सागर के किनारे उस भूमि पर खड़ा है जिसे शास्त्रों में प्रभास कहा गया — "प्रभास" अर्थात् वह स्थान जहाँ खोई हुई कांति लौट आती है। नाम में ही इस तीर्थ का पूरा भाव है।
यहाँ आकर सबसे पहले समुद्र सुनाई देता है, फिर मंदिर दिखता है। यह क्रम अपने आप में कुछ कहता है। जिस तट पर लहरें हर क्षण किनारे को तोड़ती रहती हैं, वहीं यह मंदिर सदियों से खड़ा है — गिरकर, फिर उठकर।
भक्तों के लिए सोमनाथ का महत्व केवल प्राचीनता का नहीं है। यह वह स्थान है जिसने बार-बार आघात सहा और हर बार फिर से खड़ा हुआ। जो मन किसी हानि के बाद टूटा हुआ बैठा हो, उसके लिए यह मंदिर स्वयं एक उत्तर है — कि गिर जाना अंत नहीं होता, न उठना अंत होता है।
- द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।
- अरब सागर के तट पर स्थित — बारह में एकमात्र समुद्रतटीय ज्योतिर्लिंग।
- वर्तमान मंदिर मारू-गुर्जर शैली में बना है; 1951 में इसका पुनर्निर्माण पूर्ण हुआ।
- मंदिर परिसर में प्रतिदिन संध्या को प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम होता है।
कथा
सोमनाथ की कथा एक ऐसे देवता की है जिसकी चमक चली गई थी — और उस स्थान की, जहाँ वह लौट आई।
दक्ष की सत्ताईस पुत्रियाँ
परंपरा कहती है कि चंद्रदेव, जिन्हें सोम भी कहा जाता है, का विवाह दक्ष प्रजापति की सत्ताईस पुत्रियों से हुआ था — वही सत्ताईस जिन्हें हम नक्षत्र कहते हैं।
पर चंद्रमा का मन एक ही पर टिका रहा — रोहिणी पर। शेष छब्बीस उपेक्षित रहीं। पिता के पास उनकी पीड़ा पहुँची तो दक्ष ने चंद्रमा को समझाया। एक बार, दो बार, कई बार। पर व्यवहार नहीं बदला।
शाप और क्षय
अंततः दक्ष ने क्रोध में आकर शाप दे दिया कि चंद्रमा क्षीण होते चले जाएँगे। और वैसा ही हुआ — चंद्रमा की कला घटने लगी, प्रकाश मंद पड़ने लगा।
जिस देवता से रात्रि को शीतलता मिलती थी, वही निस्तेज होने लगा। संसार में इसका असर पड़ा, क्योंकि जब आकाश का दीपक बुझने लगे तो नीचे सब कुछ प्रभावित होता है।
प्रभास में तपस्या
दुखी होकर चंद्रदेव प्रभास क्षेत्र में आए और यहाँ भगवान शिव की कठोर आराधना की। शिव प्रसन्न हुए, पर उन्होंने शाप को पूरी तरह मिटाया नहीं — मिटाते तो दक्ष का वचन झूठा हो जाता।
उन्होंने बीच का मार्ग निकाला। चंद्रमा पंद्रह दिन क्षीण होंगे और पंद्रह दिन बढ़ेंगे। जो घटेगा, वही फिर भरेगा।
यही आज भी होता है — कृष्ण पक्ष में घटना, शुक्ल पक्ष में बढ़ना। और यही इस कथा का मर्म है। शिव ने शाप हटाया नहीं, उसे जीने योग्य बना दिया। जीवन के कष्ट भी प्रायः ऐसे ही होते हैं — मिटते नहीं, पर सहने योग्य हो जाते हैं।
चंद्रदेव ने कृतज्ञता में यहाँ शिवलिंग की स्थापना की, और वही सोमनाथ कहलाया — "सोम के नाथ"।
स्रोत: शिव पुराण (सोमनाथ माहात्म्य); प्रभास क्षेत्र का उल्लेख महाभारत व भागवत पुराण में
इतिहास
सोमनाथ का इतिहास भारत के किसी भी मंदिर से अलग है — यह गिनती ध्वंस की भी है और पुनर्निर्माण की भी, और दोनों बराबर हैं।
आघात और पुनर्निर्माण का क्रम
सन् 1026 में महमूद गजनवी के आक्रमण से यह क्रम आरंभ हुआ। 1169 में राजा कुमारपाल ने मंदिर को पत्थर से पुनः बनवाया। 1299 में उलुग खान के आक्रमण में यह फिर ध्वस्त हुआ, और 1308 में महिपाल प्रथम ने इसे फिर खड़ा किया।
आगे 1395 में मुजफ्फर शाह प्रथम और 1706 में औरंगजेब के आदेश से मंदिर को फिर क्षति पहुँची। 1783 में अहिल्याबाई होल्कर ने पास ही एक छोटा मंदिर बनवाया, ताकि पूजा का क्रम टूटे नहीं।
आधुनिक पुनर्निर्माण
स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल पर वर्तमान मंदिर का निर्माण हुआ और 1951 में यह पूर्ण हुआ। इसे मारू-गुर्जर शैली में बनाया गया।
जो बात इस पूरे इतिहास में सबसे उल्लेखनीय है, वह पत्थर की नहीं है। मंदिर सात बार गिरा और सात बार उठा — और हर बार उठाने वाले अलग लोग थे, अलग सदियों के। किसी एक राजा ने नहीं, एक स्मृति ने इसे खड़ा रखा।
स्रोत: Somnath temple — en.wikipedia.org (2026-07-30 को देखा गया)
दर्शन समय व आरती
मंदिर प्रतिदिन सुबह 6:00 बजे से रात 10:00 बजे तक दर्शन हेतु खुला रहता है।
| आरती | समय | विवरण |
|---|---|---|
| प्रातः आरती | प्रातः 7:00 | — |
| मध्याह्न आरती | दोपहर 12:00 | — |
| संध्या आरती | संध्या 7:00 | — |
विशेष दर्शन व बुकिंग
- प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम रात्रि 8:00 से 9:00 बजे तक — वर्षा ऋतु में स्थगित रहता है।
- दिव्यांग व वरिष्ठ श्रद्धालुओं हेतु मंदिर के मुख्य द्वार पर व्हील चेयर तथा गोल्फ कार्ट उपलब्ध; परिसर के भीतर लिफ्ट की सुविधा है।
- ठहरने हेतु ट्रस्ट के अतिथि गृह — सागर दर्शन अतिथि गृह, लीलावती अतिथि भवन तथा माहेश्वरी अतिथि भवन — की बुकिंग आधिकारिक वेबसाइट से होती है।
- मंदिर परिसर में धूम्रपान पूर्णतः वर्जित है।
प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम वर्षा ऋतु में नहीं होता। पर्व के दिनों में दर्शन व्यवस्था बदल सकती है।
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक तट का मौसम सुहावना रहता है। महाशिवरात्रि व कार्तिक पूर्णिमा पर विशेष महत्व, पर भीड़ भी अधिक।
कैसे पहुंचें
हवाई मार्ग
केशोद हवाई अड्डा — लगभग 57 किमी
दीव हवाई अड्डा लगभग 85 किमी दूर है; बड़े नगरों से जुड़ाव हेतु राजकोट व अहमदाबाद अधिक सुविधाजनक रहते हैं।
रेल मार्ग
सोमनाथ टर्मिनस — लगभग 2.5 किमी
वेरावल जंक्शन लगभग 7 किमी दूर है और अधिक गाड़ियों से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
गुजरात के प्रमुख नगरों से नियमित बस सेवा उपलब्ध; सड़क मार्ग अच्छा है।
- जूनागढ़ — लगभग 85 किमी
- राजकोट — लगभग 200 किमी
- अहमदाबाद — लगभग 400 किमी
अंतिम चरण: रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड से मंदिर तक ऑटो व टैक्सी सहज उपलब्ध हैं।
सुगमता: मुख्य द्वार पर व्हील चेयर व गोल्फ कार्ट तथा परिसर के भीतर लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध है।
आसपास के दर्शनीय स्थल
- भालका तीर्थ — परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण के अंतिम प्रसंग से जुड़ा स्थान।
- त्रिवेणी संगम — हिरण, कपिला व सरस्वती का संगम, जहाँ से सागर मिलता है।
- अहिल्याबाई सोमनाथ मंदिर — 1783 में अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया मंदिर।
- प्रभास पाटन संग्रहालय — पुराने मंदिर के अवशेष यहाँ संरक्षित हैं।
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — गुजरात का दूसरा ज्योतिर्लिंग, द्वारका के पास — प्रायः साथ ही दर्शन किए जाते हैं।
यात्रा सुझाव
प्रमुख पर्व: महाशिवरात्रि, श्रावण मास, कार्तिक पूर्णिमा
वस्त्र: शालीन वस्त्र आवश्यक; मंदिर परिसर में धूम्रपान पूर्णतः वर्जित है।
प्रसाद: प्रसाद मंदिर परिसर की अधिकृत दुकानों से लें।
ठहरने की व्यवस्था: श्री सोमनाथ ट्रस्ट के तीन अतिथि गृह हैं जिनकी बुकिंग आधिकारिक वेबसाइट से होती है। वेरावल में भी होटल उपलब्ध हैं।
