मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
द्वारकाधीश मंदिर भारत के चार धाम का पश्चिम धाम है। यहाँ कृष्ण की पूजा **द्वारकाधीश** रूप में होती है — द्वारका के राजा के रूप में, न कि वृंदावन के बाँसुरी बजाते ग्वाले के रूप में। यही भेद इस मंदिर के भाव को तय करता है।
मंदिर को **जगत मंदिर** भी कहा जाता है। यह पाँच मंज़िला है और इसका ढाँचा **बहत्तर स्तंभों** पर टिका है। शिखर लगभग 78 मीटर ऊँचा उठता है — गुजरात के तट पर दूर से दिखाई देने वाली आकृति।
शिखर पर जो ध्वज लहराता है वह लगभग पचास फुट लंबा है और तिकोना है। सबसे असामान्य बात यह है कि **वह दिन में चार बार बदला जाता है** — प्रतिदिन, बिना नागा। ध्वज पर सूर्य और चंद्रमा अंकित होते हैं, यह संकेत करते हुए कि जब तक ये दोनों हैं, द्वारकाधीश यहाँ रहेंगे।
मंदिर के दो प्रमुख द्वार हैं और उनके नाम स्वयं बहुत कुछ कहते हैं। उत्तर का द्वार **मोक्ष द्वार** है, दक्षिण का **स्वर्ग द्वार** — और स्वर्ग द्वार से छप्पन सीढ़ियाँ उतरकर गोमती के घाट तक पहुँचा जाता है।
यह मंदिर वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशम में भी गिना जाता है, जहाँ इसका क्रम अट्ठानवेवाँ है।
- चार धाम का पश्चिम धाम; 108 दिव्य देशम में 98वाँ।
- पाँच मंज़िला ढाँचा, 72 स्तंभों पर टिका; शिखर लगभग 78 मीटर (256 फुट) ऊँचा।
- लगभग 50 फुट लंबा तिकोना ध्वज, जो दिन में चार बार बदला जाता है।
- दो द्वार — उत्तर में मोक्ष द्वार, दक्षिण में स्वर्ग द्वार; स्वर्ग द्वार से 56 सीढ़ियाँ गोमती के घाट तक जाती हैं।
- कृष्ण यहाँ राजा के रूप में पूजित हैं — द्वारकाधीश, न कि वृंदावन के ग्वाले के रूप में।
- वर्तमान प्रतिमा 1559 में अनिरुद्धाश्रम शंकराचार्य द्वारा स्थापित बताई जाती है।
पौराणिक कथा
द्वारका की कथा एक ऐसे नगर की है जो समुद्र से माँगकर बनाया गया और अंत में समुद्र को ही लौटा दिया गया।
मथुरा छोड़ना
कथा कहती है कि जरासंध के बार-बार के आक्रमणों से मथुरा की प्रजा त्रस्त थी। कृष्ण ने युद्ध जारी रखने के बजाय एक और रास्ता चुना — वे नगर छोड़कर पश्चिम चले गए।
इस निर्णय पर उन्हें "रणछोड़" कहा गया, यानी रण छोड़कर जाने वाला। यह नाम व्यंग्य के रूप में दिया गया था, पर परंपरा ने उसे सम्मान के रूप में अपना लिया — और आज भी वे उसी नाम से पूजे जाते हैं।
यह कथा का सबसे कम बोला जाने वाला हिस्सा है। पीछे हटना कायरता मान लिया जाता है, पर यहाँ वह प्रजा को बचाने के लिए किया गया। जो लड़ाई जीतकर भी लोगों को नहीं बचाती, उसे छोड़ देना भी एक निर्णय है।
समुद्र से माँगी हुई भूमि
कृष्ण ने समुद्र से भूमि माँगी और उस पर द्वारका नगरी बसाई — सोने की नगरी, जिसका वर्णन कथाओं में विस्तार से मिलता है।
पर कथा वहाँ समाप्त नहीं होती। कृष्ण के देह त्यागने के बाद द्वारका समुद्र में समा गई। जो भूमि माँगकर ली गई थी, वह लौटा दी गई।
परंपरा कहती है कि वर्तमान मंदिर उसी मूल द्वारका के स्थान पर खड़ा है, और उसकी नींव कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने रखी थी।
स्रोत: स्थल-परंपरा व महाभारत/भागवत की द्वारका-कथा; तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Dwarkadhish_Temple से
इतिहास
द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास एक बहुत पुरानी नींव और एक अपेक्षाकृत नए ढाँचे का है।
कितना पुराना
मूल संरचना का काल कम से कम ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी तक जाता है। वर्तमान ढाँचा उससे कहीं बाद का है — पंद्रहवीं से सोलहवीं शताब्दी का।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। यह स्थान बहुत पुराना है, पर जो इमारत आज खड़ी है वह उतनी पुरानी नहीं। दोनों बातों को एक मान लेना भूल होगी।
1473 का ध्वंस और पुनर्निर्माण
सन् 1473 में महमूद बेगड़ा ने मूल संरचना को ध्वस्त कर दिया।
इसके बाद सोलहवीं शताब्दी में मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, और वर्तमान प्रतिमा 1559 में अनिरुद्धाश्रम शंकराचार्य द्वारा स्थापित बताई जाती है।
यानी आज जिस मूर्ति के दर्शन होते हैं, वह लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पुरानी है — जबकि जिस स्थान पर वह खड़ी है, वह उससे कहीं अधिक प्राचीन है।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Dwarkadhish_Temple — 2026-08-04 को देखा गया
दर्शन का समय
द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन-समय किसी आधिकारिक मंदिर-प्रबंधन स्रोत पर सत्यापित नहीं हो सके, और उपलब्ध स्रोत आपस में मेल नहीं खाते।
कुछ स्रोत मंदिर प्रातः 6:00 बजे खुलना बताते हैं और कुछ 6:30 बजे; दोपहर में लगभग 1:00 से 5:00 बजे तक विराम रहता है और रात्रि लगभग 9:30 बजे कपाट बंद होते हैं। मंगला आरती दिन की पहली आरती होती है और परंपरा से यहाँ प्रतिदिन छह आरतियाँ होती हैं। आधे घंटे का यह अंतर मंगला आरती जैसे अवसर पर मायने रखता है, इसलिए पहुँचने से पहले स्थानीय पुष्टि कर लेना उचित है।
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
जामनगर हवाई अड्डा
जामनगर से द्वारका तक सड़क मार्ग से लगभग दो से ढाई घंटे लगते हैं। राजकोट भी एक विकल्प है।
रेल मार्ग
द्वारका रेलवे स्टेशन — लगभग 2 किमी
द्वारका अहमदाबाद-ओखा रेल मार्ग पर है और देश के कई नगरों से सीधी गाड़ियाँ आती हैं। स्टेशन से मंदिर तक ऑटो मिल जाते हैं।
सड़क मार्ग
द्वारका
जामनगर, राजकोट व अहमदाबाद से नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
अंतिम चरण: मंदिर नगर के मध्य में है और स्टेशन या बस अड्डे से पैदल अथवा ऑटो द्वारा पहुँचा जा सकता है।
सुगमता: मंदिर तक पहुँच सुगम है। स्वर्ग द्वार से गोमती घाट तक जाने के लिए छप्पन सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं — घुटनों की तकलीफ़ वाले यात्री इसे छोड़ सकते हैं, दर्शन उससे प्रभावित नहीं होते।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च, जब गुजरात के तट पर मौसम अनुकूल रहता है। जन्माष्टमी पर यहाँ बहुत भीड़ होती है और ठहरने की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती है।
प्रमुख त्योहार
- जन्माष्टमी
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- द्वारका — द्वारका, गुजरात
- गोमती घाट — स्वर्ग द्वार से 56 सीढ़ियाँ उतरकर; स्नान की परंपरा है।
- बेट द्वारका — ओखा से नाव द्वारा पहुँचा जाने वाला द्वीप; परंपरा के अनुसार कृष्ण का निवास-स्थान।
- रुक्मिणी देवी मंदिर — नगर से कुछ दूरी पर; उसकी अपनी अलग कथा है।
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग — द्वारका के पास स्थित ज्योतिर्लिंग; अधिकांश यात्री दोनों एक साथ करते हैं।
