मंदिर का परिचय व धार्मिक महत्व
गरुड़ पुराण के श्लोक में पाँचवाँ नाम **काञ्ची** है — यानी आज का कांचीपुरम्, चेन्नै से लगभग बहत्तर किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में।
**सप्त पुरी में यह अकेली दक्षिण भारतीय पुरी है।** शेष छह — अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, उज्जैन और द्वारका — सब उत्तर या पश्चिम भारत में हैं। एक श्लोक जो सात नगरों को गिनाता है और उनमें से एक इतनी दूर दक्षिण में रखता है, वह अपने आप में बताता है कि यह गणना किसी एक क्षेत्र की नहीं थी।
नगर को **सहस्र मंदिरों का नगर** कहा जाता है, और यह अतिशयोक्ति नहीं लगती। यहाँ **कामाक्षी अम्मन** मंदिर है, **एकाम्बरेश्वर** मंदिर है, **वरदराज पेरुमाल** मंदिर है और **कैलासनाथर** मंदिर भी — यानी शाक्त, शैव और वैष्णव तीनों परंपराओं के प्रमुख मंदिर एक ही नगर में। काञ्ची शक्ति पीठ भी यहीं है।
वैष्णव परंपरा के 108 दिव्य देशम में से **पंद्रह अकेले कांचीपुरम् में हैं** — किसी एक नगर में सर्वाधिक।
नगर की एक और पहचान धार्मिक नहीं है। कांचीपुरम् की रेशम साड़ियाँ विश्व-प्रसिद्ध हैं। यह परंपरा तब शुरू हुई जब राजराज चोल प्रथम (985–1014) ने सौराष्ट्र से बुनकरों को यहाँ बसने के लिए बुलाया — और वह परंपरा आज भी चल रही है।
- सप्त पुरी की पाँचवीं पुरी और उनमें अकेली दक्षिण भारतीय।
- "सहस्र मंदिरों का नगर" — शाक्त, शैव व वैष्णव तीनों परंपराओं के प्रमुख मंदिर एक साथ।
- 108 दिव्य देशम में से 15 अकेले इसी नगर में — किसी एक नगर में सर्वाधिक।
- यहाँ काञ्ची शक्ति पीठ भी है।
- पल्लव काल में नरसिंहवर्मन द्वितीय ने नगर के प्रमुख मंदिर बनवाए।
- रेशम-बुनाई की परंपरा राजराज चोल प्रथम (985–1014) के काल से, जब सौराष्ट्र से बुनकर यहाँ बसाए गए।
पौराणिक कथा
कांचीपुरम् की सबसे प्रचलित कथा कामाक्षी और एकाम्बरेश्वर से जुड़ी है — और वह एक आम के पेड़ के नीचे घटती है।
रेत का शिवलिंग
परंपरा कहती है कि देवी पार्वती ने यहाँ एकाम्बरेश्वर मंदिर के आम के वृक्ष के नीचे तपस्या की। उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाया और उसकी पूजा करने लगीं।
शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए वेगवती नदी में बाढ़ ला दी। जल शिवलिंग को बहा ले जाने लगा।
पार्वती ने उसे अपनी बाँहों में समेट लिया और अपनी देह से ढँककर बचा लिया। वह रेत का लिंग था — बहते जल में उसे बचाने का और कोई उपाय था ही नहीं।
परंपरा कहती है कि उसी क्षण शिव प्रकट हुए और उन्हें स्वीकार किया। एकाम्बरेश्वर का लिंग आज भी रेत का ही माना जाता है, और उस पर जल नहीं चढ़ाया जाता।
जो टिकाऊ नहीं, उसे थामना
इस कथा में जो बात ठहरती है वह यह है कि पार्वती ने किसी मज़बूत चीज़ की रक्षा नहीं की। रेत का लिंग बनते ही टूटने के लिए था।
उन्होंने उसे इसलिए नहीं थामा कि वह टिकेगा। उन्होंने इसलिए थामा कि वह उनका था।
जिन चीज़ों से हम प्रेम करते हैं, उनमें से अधिकांश टिकाऊ नहीं होतीं। कथा यह नहीं कहती कि उन्हें छोड़ दो — वह कहती है कि बहते पानी में भी उन्हें अपनी देह से ढँका जा सकता है, और कभी-कभी वही पर्याप्त होता है।
स्रोत: स्थल-परंपरा (एकाम्बरेश्वर व कामाक्षी की प्रचलित कथा); तथ्यात्मक विवरण en.wikipedia.org/wiki/Kanchipuram से
इतिहास
कांचीपुरम् का स्थापत्य मुख्यतः पल्लव काल की देन है।
पल्लव काल
पल्लव काल में नगर एक प्रमुख धार्मिक व सांस्कृतिक केंद्र बना। राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने नगर के महत्वपूर्ण मंदिर बनवाए, जिनमें कैलासनाथर मंदिर सबसे उल्लेखनीय है।
यह वही काल है जिसमें दक्षिण भारत की पत्थर-मंदिर परंपरा अपना रूप ले रही थी, और कांचीपुरम् उस विकास का एक केंद्र था।
रेशम की परंपरा
नगर की बुनाई-परंपरा राजराज चोल प्रथम (985–1014) से जुड़ी है, जिन्होंने सौराष्ट्र से बुनकरों को यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया।
एक हज़ार वर्ष बाद भी वह परंपरा चल रही है, और कांचीपुरम् की रेशम साड़ियाँ आज भी उसी नाम से पहचानी जाती हैं। तीर्थयात्रा और शिल्प का यह साथ-साथ चलना इस नगर की अपनी विशेषता है।
स्रोत: en.wikipedia.org/wiki/Kanchipuram — 2026-08-04 को देखा गया
कैसे पहुँचें
हवाई मार्ग
चेन्नै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
चेन्नै से कांचीपुरम् लगभग 72 किमी दक्षिण-पश्चिम में है; सड़क मार्ग से लगभग दो घंटे।
रेल मार्ग
कांचीपुरम् रेलवे स्टेशन
चेन्नै से नियमित गाड़ियाँ आती हैं। चेंगलपट्टू जंक्शन भी एक विकल्प है।
सड़क मार्ग
कांचीपुरम् — लगभग 72 किमी
चेन्नै व बेंगलुरु दोनों से सड़क मार्ग से सुगमता से पहुँचा जा सकता है।
अंतिम चरण: नगर के मंदिर एक-दूसरे से कुछ दूरी पर बिखरे हैं — ऑटो अथवा एक दिन के लिए टैक्सी लेना सबसे व्यावहारिक रहता है।
सुगमता: नगर समतल है और घूमने में सुगम, पर मंदिरों के बीच की दूरी को देखते हुए वाहन की व्यवस्था कर लेनी चाहिए।
कब जाएँ
सर्वोत्तम समय: नवंबर से फ़रवरी, जब तमिलनाडु में मौसम सबसे अनुकूल रहता है। मार्च से जून तक यहाँ अत्यधिक गर्मी पड़ती है। अक्टूबर-दिसंबर में उत्तर-पूर्वी मानसून की वर्षा होती है।
आसपास के मंदिर व दर्शनीय स्थल
- कांची शक्ति पीठ — कांचीपुरम, तमिलनाडु
- कामाक्षी अम्मन मंदिर — नगर का प्रमुख शाक्त मंदिर; काञ्ची शक्ति पीठ से जुड़ा।
- एकाम्बरेश्वर मंदिर — शिव मंदिर; यहाँ का लिंग परंपरा के अनुसार रेत का है और उस पर जल नहीं चढ़ाया जाता।
- वरदराज पेरुमाल मंदिर — प्रमुख वैष्णव मंदिर; दिव्य देशम में गिना जाता है।
- कैलासनाथर मंदिर — पल्लव काल का सबसे उल्लेखनीय मंदिर; नरसिंहवर्मन द्वितीय द्वारा निर्मित।
- महाबलिपुरम् — यूनेस्को विश्व धरोहर; पल्लव काल के शिल्प के लिए प्रसिद्ध।
