FAQ
कांची शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस पर परंपराएँ एकमत नहीं हैं। पीठनिर्णय, जो इस संग्रह का आधार है, यहाँ कंकाल बताता है और देवी को देवगर्भा तथा भैरव को रुरु कहता है। कांचीपुरम की अपनी मान्यता कहती है कि यहाँ नाभि गिरी, जिससे इसे नाभि पीठम् या ओढ्यान पीठम् कहा जाता है। ध्यान रहे कि नाभि उसी पीठनिर्णय में विरजाक्षेत्र (जाजपुर) पर आती है।
पुराने उल्लेख कांचीपुरम की ओर ही जाते हैं और अष्टादश स्तोत्र भी "कामाक्षी काञ्चिकापुरे" कहता है। पर डी. सी. सरकार जोड़ते हैं कि बंगाल में रचे गए कुछ परवर्ती ग्रंथ संभवतः बीरभूम ज़िले में कोपाई नदी के किनारे किसी स्थान की बात करते हैं। दोनों मत इस पृष्ठ पर स्रोत सहित दिए गए हैं।
परंपरा के अनुसार यहाँ कामाक्षी को शिव से भी प्रधान माना गया, इसलिए उत्सव कामाक्षी के स्थान पर शिव का अलग मंदिर नहीं है। देवी-मंदिरों में प्रायः शिव का सान्निध्य रहता है; यहाँ उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई।
कामाक्षी पद्मासन में विराजमान हैं और उनका मुख दक्षिण-पूर्व की ओर है। चार भुजाओं में पाश, अंकुश, ईख का धनुष और पुष्प-बाण हैं। अस्त्रों की यह सूची युद्ध की नहीं लगती — यह शक्ति संहार से नहीं, आकर्षण से काम लेती है।
इस पर उपलब्ध विवरण आपस में मेल नहीं खाते। कुछ इसका आरंभ पल्लव काल (पाँचवीं–आठवीं शताब्दी) में बताते हैं, कुछ चोल काल (चौदहवीं शताब्दी) में, और एक विवरण 1783 की बात करता है जो किंवदंती के रूप में दर्ज है। पुष्टि करने वाले शिलालेख उपलब्ध विवरणों में नहीं मिलते, इसलिए यहाँ कोई एक तिथि तथ्य की तरह नहीं दी गई।
आदि शंकराचार्य को यहाँ कामाक्षी अम्बाल के सम्मुख श्रीचक्र यंत्र की प्रतिष्ठा का श्रेय दिया जाता है। यह परंपरा बहुत प्रचलित है, यद्यपि इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विवरणों में नहीं मिलती — इसे एक जीवित परंपरा के रूप में देखना चाहिए, प्रमाणित इतिहास के रूप में नहीं।
