कांची शक्ति पीठ

kāñcī

दक्षिण का वह पीठ जहाँ देवी इतनी प्रधान हैं कि उनके सामने शिव का अलग मंदिर नहीं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
कंकाल
शक्ति
देवगर्भा
भैरव
रुरु

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

कांचीपुरम की कामाक्षी दक्षिण भारत की तीन प्रमुख देवियों में गिनी जाती हैं — मदुरै की मीनाक्षी और काशी की विशालाक्षी के साथ। तीनों के नाम नेत्रों पर हैं, और यह संयोग नहीं लगता।

पीठनिर्णय यहाँ कंकाल बताता है। देवी देवगर्भा कहलाईं, भैरव रुरु। पर आज जिस रूप में यहाँ पूजा होती है वह कामाक्षी का है — पद्मासन में विराजमान, चार भुजाओं में पाश, अंकुश, ईख का धनुष और पुष्प-बाण।

ईख का धनुष और फूलों के बाण — यह अस्त्रों की सूची किसी युद्ध की नहीं लगती। और यही इस स्वरूप की बात है। जो शक्ति यहाँ पूजी जाती है वह संहार से नहीं, आकर्षण से काम लेती है।

एक बात जो इस मंदिर को अलग करती है वह यह कि यहाँ कामाक्षी को शिव से भी प्रधान माना गया, और उत्सव कामाक्षी के स्थान पर शिव का अलग मंदिर नहीं है। देवी-मंदिरों में प्रायः शिव का सान्निध्य रहता है; यहाँ उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई।

  • यहाँ कामाक्षी को शिव से प्रधान माना गया — इसीलिए उनके साथ शिव का अलग मंदिर नहीं।
  • देवी पद्मासन में विराजमान, दक्षिण-पूर्व की ओर मुख; हाथों में पाश, अंकुश, ईख का धनुष व पुष्प-बाण।
  • आदि शंकराचार्य को यहाँ श्रीचक्र यंत्र की प्रतिष्ठा का श्रेय दिया जाता है।
  • मदुरै की मीनाक्षी व काशी की विशालाक्षी के साथ — तीनों के नाम नेत्रों पर हैं।

कथा

इस पीठ पर जो अंग गिरा, उस पर परंपराएँ एक स्वर में नहीं बोलतीं — और यह इस संग्रह का सबसे उलझा हुआ मामला है।

पीठनिर्णय क्या कहता है

दक्ष के यज्ञ के बाद सती की देह जब सुदर्शन चक्र से खंडित हुई, तो जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कांची पर कंकाल बताता है — अस्थि-पंजर। देवी देवगर्भा और भैरव रुरु। शिवचरित देवी का नाम वेदगर्भा लिखता है।

कांचीपुरम की अपनी मान्यता

पर कांचीपुरम में जो परंपरा चलती है वह कुछ और कहती है — कि यहाँ सती की नाभि गिरी, और इसी से इस स्थान को नाभि पीठम् या ओढ्यान पीठम् कहा जाता है।

यह दावा दो जगह टकराता है। एक तो पीठनिर्णय से, जो यहाँ कंकाल बताता है। और दूसरे, नाभि उसी सूची में विरजाक्षेत्र (उत्कल, आज का जाजपुर) पर आती है — और अष्टादश स्तोत्र का "ओढ्यायने गिरिजा देवी" भी परंपरागत रूप से वही स्थान माना जाता है।

और स्थान भी निश्चित नहीं

इतना ही नहीं। डी. सी. सरकार लिखते हैं कि "कांची" के पुराने उल्लेख तो कांचीपुरम की ओर जाते हैं, पर बंगाल में रचे गए कुछ परवर्ती ग्रंथ संभवतः बीरभूम ज़िले में कोपाई नदी के किनारे किसी स्थान की बात करते हैं।

यानी यहाँ तीन प्रश्न एक साथ खुले हैं — कौन सा अंग, कौन सा स्थान, और कौन सी परंपरा। इस पृष्ठ पर तीनों बातें रखी गई हैं और किसी को चुनकर बाक़ी को मिटाया नहीं गया। जहाँ स्रोत तीन दिशाएँ दिखाते हों, वहाँ एक दिशा चुन लेना पाठक को यह भ्रम देना होगा कि प्रश्न हल हो चुका है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान व मतभेद पर D. C. Sircar (1948)

इतिहास

मंदिर बहुत पुराना है, पर उसकी तिथियों पर उपलब्ध विवरण आपस में मेल नहीं खाते — इसलिए यहाँ कोई एक तिथि नहीं दी गई।

निर्माण की तिथि पर मतभेद

कुछ विवरण इसका आरंभ पल्लव काल (पाँचवीं से आठवीं शताब्दी) में बताते हैं, कुछ चोल काल (चौदहवीं शताब्दी) में। एक और विवरण 1783 की बात करता है, पर वह किंवदंती के रूप में ही दर्ज है।

इन दावों की पुष्टि करने वाले शिलालेख या दस्तावेज़ उपलब्ध विवरणों में नहीं मिलते। इसलिए यहाँ कोई एक तिथि तथ्य की तरह नहीं लिखी गई — तीनों संभावनाएँ बता देना अधिक ईमानदार है।

श्रीचक्र और शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य को यहाँ कामाक्षी अम्बाल के सम्मुख श्रीचक्र यंत्र की प्रतिष्ठा का श्रेय दिया जाता है।

यह परंपरा बहुत प्रचलित है, यद्यपि इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विवरणों में नहीं मिलती। इसे उसी रूप में लिया जाना चाहिए — एक जीवित परंपरा, न कि प्रमाणित इतिहास।

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम, तमिलनाडु, भारत

  • कांचीपुरम, तमिलनाडुसरकार के अनुसार पुराने उल्लेख इसी नगर की ओर जाते हैं, और अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र भी "कामाक्षी काञ्चिकापुरे" कहता है। (Sircar 1948, Index of Pithas; अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र)
  • कोपाई नदी के किनारे कोई स्थान, बीरभूम ज़िला, पश्चिम बंगालसरकार जोड़ते हैं कि बंगाल में रचे गए कुछ परवर्ती ग्रंथ संभवतः इसी नाम से एक बंगाली स्थान की बात करते हैं। (Sircar 1948, Index of Pithas)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "The earlier references are to modern Conjeeveram … but some late works (composed in Bengal) possibly speak of a locality on the Kopai in the Birbhum District, Bengal"

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यात्रा सुझाव

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कांची शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न