कालीघाट शक्ति पीठ

kālīghāṭa

वह कालीघाट जो कोलकाता वाला नहीं है — कटवा के पास एक गाँव, और एक नाम जिसने सदियों भ्रम फैलाया।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
मुण्ड
शक्ति
जयदुर्गा
भैरव
क्रोधीश

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इस पीठ की पहचान इसकी अपनी नहीं, इसके नाम की उलझन है — और वह उलझन जानने लायक है।

पीठनिर्णय की सूची में "कालीघाट" नाम का एक पीठ है, और स्वाभाविक रूप से हर पाठक मान लेता है कि यह कोलकाता वाला प्रसिद्ध कालीघाट होगा। पर विद्वान डी. सी. सरकार स्पष्ट लिखते हैं कि ऐसा नहीं है। पीठनिर्णय का कालीघाट **जुरनपुर** है, कटवा के पास बर्दवान ज़िले का एक स्थान।

कोलकाता वाला प्रसिद्ध कालीघाट उसी सूची में अलग नाम से आता है — **कालीपीठ** (#19)।

सबसे साफ़ प्रमाण अंग और नामों से मिलता है। यहाँ अंग है मुण्ड, देवी जयदुर्गा और भैरव क्रोधीश। जबकि कालीपीठ पर अंग है दाहिने पैर की उँगलियाँ, देवी काली और भैरव नकुलेश। दोनों की तीनों बातें अलग हैं। यदि वे एक ही स्थान होते तो ऐसा न होता।

यह पूरे इक्यावन में नामों की समानता से उपजे भ्रमों का सबसे साफ़ उदाहरण है — और सबसे साफ़ ढंग से सुलझा हुआ भी, क्योंकि यहाँ स्रोत स्वयं दोनों को अलग करके दिखाता है।

  • यह कोलकाता वाला कालीघाट नहीं — वह इसी सूची में "कालीपीठ" नाम से अलग आता है।
  • अंग, देवी और भैरव तीनों अलग हैं — यही प्रमाण कि दो अलग स्थान हैं।
  • शिवचरित इसी नाम से कोलकाता वाले की बात करता है, जिससे भ्रम और बढ़ा।
  • यह उन आठ नामों में है जो पीठनिर्णय की कुछ पांडुलिपियों में नहीं मिलते।

कथा

यहाँ की कथा वही है जो सबकी — पर इस पृष्ठ का असली विषय एक नाम है, जिसने सदियों तक दो स्थानों को एक बना रखा।

सती का मुण्ड

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि यहाँ मुण्ड गिरा। देवी जयदुर्गा हुईं, भैरव क्रोधीश।

दो कालीघाट

अब वह बात जिसके लिए यह पृष्ठ है।

पीठनिर्णय की सूची में "कालीघाट" नाम का यह पीठ कोलकाता वाला प्रसिद्ध कालीघाट नहीं है। सरकार लिखते हैं कि यह जुरनपुर है — कटवा के पास, बर्दवान ज़िले में।

कोलकाता वाला कालीघाट उसी सूची में अलग नाम से है — कालीपीठ। सरकार यह भी बताते हैं कि मूल भाग में कालीघाट को कालीपीठ ही कहा गया है।

भ्रम इसलिए और बढ़ा कि शिवचरित नामक दूसरा ग्रंथ "कालीघाट" नाम से कोलकाता वाले की ही बात करता है। एक नाम, दो ग्रंथ, दो अलग स्थान।

प्रमाण कहाँ है

यह केवल विद्वानों का अनुमान नहीं है। प्रमाण स्वयं सूची में है।

यहाँ अंग है मुण्ड, देवी जयदुर्गा, भैरव क्रोधीश। और कालीपीठ पर अंग है दाहिने पैर की उँगलियाँ, देवी काली, भैरव नकुलेश।

तीनों बातें अलग। यदि दोनों एक ही स्थान होते, तो एक ही सूची में उनके अंग और देवता अलग-अलग क्यों लिखे जाते?

इक्यावन में नामों की समानता ने कई जगह उलझन डाली है — उज्जयिनी दो नगरों पर बैठती है, जालंधर दो पर, कांची दो पर। यह उन सबमें सबसे साफ़ सुलझा हुआ मामला है, क्योंकि यहाँ स्रोत स्वयं दोनों को अलग करके दिखा देता है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान व भ्रम-निवारण D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

जुरनपुर, कटवा के निकट, बर्दवान, पश्चिम बंगाल, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "Pitha refers to the devasthana at Juranpur near Katwa (Burdwan District)"

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यात्रा सुझाव

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कालीघाट शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न