रत्नावली शक्ति पीठ

ratnāvalī

वह पीठ जिसके लिए विद्वान एक ही वाक्य में तीन अलग संभावनाएँ गिनाते हैं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
दक्षिण-स्कन्ध
शक्ति
कुमारी
भैरव
शिव

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन में कुछ पीठ ऐसे हैं जिनकी पहचान पर दो दावे हैं। रत्नावली उनमें नहीं — यहाँ **तीन** हैं, और तीनों एक ही वाक्य में आते हैं।

पीठनिर्णय यहाँ दक्षिण-स्कन्ध बताता है — दाहिना कंधा। देवी कुमारी कहलाईं, भैरव शिव।

पर स्थान की बात आते ही विद्वान डी. सी. सरकार तीन संभावनाएँ रखते हैं और किसी को नहीं चुनते। यह संभवतः काव्यमीमांसा में उल्लिखित रत्नावती नगरी है; या बंगाल का कोई स्थान; या फिर नेपाल में वाग्मती की एक पवित्र सहायक नदी का नाम।

तीन अलग दिशाएँ — एक साहित्यिक संदर्भ, एक क्षेत्र, और एक नदी।

यह अपने आप में एक ईमानदार क्षण है। जहाँ प्रमाण नहीं थे, वहाँ विद्वान ने अनुमान लगाकर कुछ लिख देने के बजाय अपनी अनिश्चितता दर्ज कर दी। ऐसे स्थानों पर पेज छोटा रहेगा, और यह ठीक है — क्योंकि जो पता नहीं, उसे भरना ईमानदारी नहीं होगी।

देवी का नाम कुमारी है — अविवाहित कन्या। और भैरव का नाम सीधे शिव। दोनों नाम इतने सामान्य हैं कि उनसे भी कोई सुराग़ नहीं मिलता।

  • एक ही प्रविष्टि में तीन अलग संभावनाएँ — नगरी, क्षेत्र, और एक नदी।
  • सरकार किसी को नहीं चुनते; तीनों "संभवतः" के साथ आते हैं।
  • देवी कुमारी और भैरव शिव — दोनों नाम इतने सामान्य कि कोई सुराग़ नहीं देते।
  • इसी record की अनुक्रमणिका-प्रविष्टि ने S0 के extraction को जाँचने में मदद की।

कथा

यहाँ कहने को कथा उतनी ही है जितनी सबकी — और पहचान के बारे में जो कहा जा सकता है वह बहुत कम है।

सती का दक्षिण स्कन्ध

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि रत्नावली में दक्षिण-स्कन्ध गिरा — दाहिना कंधा। देवी कुमारी हुईं, भैरव शिव।

ध्यान दीजिए कि बायाँ कंधा मिथिला पर आता है। दोनों कंधे इस सूची में अलग-अलग स्थानों पर हैं।

तीन संभावनाएँ

स्थान के बारे में विद्वान डी. सी. सरकार एक ही वाक्य में तीन बातें कहते हैं, और किसी को नहीं चुनते।

यह संभवतः काव्यमीमांसा में उल्लिखित रत्नावती नगरी है। या बंगाल का कोई स्थान हो सकता है। और वे यह भी जोड़ते हैं कि रत्नावली नेपाल में वाग्मती की एक पवित्र सहायक नदी का नाम है।

तीन अलग दिशाएँ — एक साहित्यिक संदर्भ, एक क्षेत्र, और एक नदी। इनमें से कोई भी दूसरे से अधिक भारी नहीं है।

जो पता नहीं, वह पता नहीं

इस पृष्ठ पर लिखने को अधिक नहीं है, और यह जानबूझकर है।

जहाँ प्रमाण नहीं थे, वहाँ विद्वान ने अनुमान लगाकर कुछ लिख देने के बजाय अपनी अनिश्चितता दर्ज कर दी। वही रुख इस संग्रह ने भी अपनाया है।

देवी का नाम कुमारी है और भैरव का सीधे शिव — दोनों इतने सामान्य नाम हैं कि उनसे भी कोई सुराग़ नहीं मिलता। कहीं-कहीं परंपरा ने वही नाम रख दिए जो सब जगह चलते थे।

इक्यावन की सूची में सब स्थान समान रूप से याद नहीं रखे गए। कुछ नाम केवल नाम रह गए।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); तीनों संभावनाएँ D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

  • रत्नावती नगरी (काव्यमीमांसा में उल्लिखित)सरकार लिखते हैं कि यह "संभवतः" काव्यमीमांसा में उल्लिखित रत्नावती नगरी हो सकती है। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • बंगाल में कोई स्थानवे यह भी जोड़ते हैं कि यह बंगाल का कोई स्थान भी हो सकता है। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • रत्नावली नदी, नेपाल (वाग्मती की सहायक)वे यह भी दर्ज करते हैं कि रत्नावली नेपाल में वाग्मती की एक पवित्र सहायक नदी का नाम है। (Sircar 1948, Index of Pithas)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "possibly the same as the city of Ratnavati mentioned in the Kavyamimamsa, but may also be a locality in Bengal. Ratnavali is the name of a sacred tributary of the Vagmati in Nepal."

आसपास के दर्शनीय स्थल

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि

रत्नावली शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न