FAQ
लंका शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ नूपुर — पायल — गिरी। यह उन थोड़े पीठों में है जहाँ जो गिरा वह शरीर का अंग नहीं, आभूषण है। यहाँ की शक्ति इंद्राक्षी और भैरव राक्षसेश्वर कहलाते हैं।
इस पर एक से अधिक दावे हैं। नैनातिवु द्वीप के नागपूषणी अम्मन मंदिर में शिव का नाम राक्षसेश्वर है, देवी इंद्राक्षी भी कहलाती हैं, और परंपरा वहाँ गौरी के सिलम्बु गिरने की बात कहती है — तीनों बातें पीठनिर्णय से मिलती हैं। दूसरी ओर अष्टादश स्तोत्र "लङ्कायां शाङ्करी" कहता है, जो त्रिंकोमाली के कोणेश्वरम् से जोड़ी जाती हैं।
नहीं, और यह इस पीठ की सबसे बड़ी कठिनाई है। विद्वान डी. सी. सरकार लिखते हैं कि "लंका" शब्द का अर्थ ही द्वीप है और वह समुद्र या नदी के किसी भी द्वीप के लिए हो सकता है। वे यह भी बताते हैं कि अष्टादश स्तोत्र लंका और सिंहलद्वीप का अलग-अलग उल्लेख करता है — जिससे यह भी निश्चित नहीं कि उस पाठ की लंका श्रीलंका ही है।
"सहस्र स्तंभों का मंदिर" कहलाने वाला मूल ढाँचा 1622 में पुर्तगाली उपनिवेश-काल में ध्वस्त कर दिया गया और उसका पत्थर एक क़िले के निर्माण में लगा दिया गया।
यह पीठ भारत के बाहर है, इसका स्थान ही निश्चित नहीं, और किसी आधिकारिक स्रोत से जानकारी सत्यापित नहीं हो सकी। बिना पुष्टि के ऐसी जानकारी छापना इस संग्रह के नियम के विरुद्ध है।
