FAQ
विरजाक्षेत्र शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
परंपरा के अनुसार यहाँ सती की नाभि गिरी थी। पीठनिर्णय यही अंग बताता है और देवी को विमला तथा भैरव को जगन्नाथ कहता है। तंत्रचूड़ामणि भी कहता है कि नाभि उत्कल की भूमि पर गिरी।
नाभि यहाँ गिरने के कारण ही यह भूमि नाभिगया कहलाई। जैसे गया में पितरों के लिए तर्पण किया जाता है, वैसा ही महत्व इस क्षेत्र को दिया जाता रहा है।
बिरजा देवी द्विभुजा हैं, यानी दो भुजाओं वाली — एक हाथ से महिषासुर की छाती में शूल भोंकती हुईं और दूसरे से उसकी पूँछ खींचती हुईं। एक चरण सिंह पर और दूसरा महिषासुर की छाती पर रहता है। उनके मुकुट पर गणेश, चंद्रकला और शिवलिंग अंकित हैं। अधिकांश महिषासुरमर्दिनी प्रतिमाएँ अनेक भुजाओं वाली होती हैं, इसलिए यह रूप विशेष है।
मंदिर ओडिशा के जाजपुर में वैतरणी नदी के पास है, भुवनेश्वर से लगभग 125 किलोमीटर उत्तर। वर्तमान मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी का माना जाता है, यद्यपि स्थान की प्रसिद्धि उससे बहुत पुरानी है।
हाँ। अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में "ओढ्यायने गिरिजा देवी" के रूप में यही स्थान गिना जाता है। यह उन कुछ पीठों में है जहाँ अष्टादश की परंपरा और पीठनिर्णय के इक्यावन दोनों एक ही स्थान बताते हैं।
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