FAQ
प्रयाग शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ हस्तांगुलि — हाथ की उँगलियाँ — गिरीं। यहाँ की शक्ति ललिता और भैरव भव कहलाते हैं। प्रयाग की अपनी परंपरा भी यही कहती है, और परंपरा इसे दाहिने हाथ की उँगलियाँ बताती है।
इस पर मत बँटे हुए हैं। तीन स्थान इससे जोड़े जाते हैं — मीरापुर का ललिता देवी मंदिर, अलोपीबाग़ का अलोपी देवी मंदिर, और अक्षयवट। कई स्रोत कहते हैं कि प्रयागराज में एक ही शक्ति पीठ है, ललिता देवी मंदिर, और अलोपी वाला दावा विवादास्पद है। नगर पर कोई विवाद नहीं है — केवल मंदिर पर।
वहाँ प्रतिमा के स्थान पर एक काठ की डोली की पूजा होती है। कथा कहती है कि एक बारात को डाकुओं ने घेरा और जब उन्होंने दुल्हन की डोली का परदा हटाया तो भीतर कोई नहीं था — वह लुप्त हो चुकी थी। उसी से देवी का नाम अलोपी पड़ा, जिसका अर्थ है जो लुप्त हो गई।
कुछ विवरण कहते हैं कि हाँ, अलोपी माता ललिता का ही दूसरा नाम हैं और तीनों स्थान एक ही पीठ के रूप हैं। पर यह मत सर्वमान्य नहीं है। इस पृष्ठ पर दोनों बातें रखी गई हैं ताकि पाठक स्वयं देख सके।
हाँ। अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र में "प्रयागे माधवेश्वरी" के रूप में इसका उल्लेख है। यह उन कुछ स्थानों में है जहाँ अष्टादश की परंपरा और पीठनिर्णय के इक्यावन दोनों एक ही नगर बताते हैं।
