प्रयाग शक्ति पीठ

prayāga

संगम की नगरी का वह पीठ जहाँ सती की उँगलियाँ गिरीं — और जहाँ एक मंदिर में देवी की मूर्ति ही नहीं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
हस्तांगुलि
शक्ति
ललिता
भैरव
भव

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन पीठों में प्रयाग उन थोड़े स्थानों में है जहाँ शास्त्र और परंपरा बिना खींचतान के मिल जाते हैं। पीठनिर्णय यहाँ हस्तांगुलि बताता है — हाथ की उँगलियाँ। देवी ललिता कहलाईं, भैरव भव।

और प्रयाग की अपनी परंपरा भी यही कहती है: उँगलियाँ, ललिता, भवेश्वर। तीन अलग स्रोत, एक ही उत्तर।

जो अंग यहाँ गिरा वह भी सोचने लायक है। उँगलियाँ — शरीर का वह हिस्सा जिससे हम पकड़ते हैं, छोड़ते हैं, छूते हैं। तीन नदियों के संगम पर, जहाँ लोग सदियों से कुछ छोड़ने और कुछ पाने आते रहे हैं, इस अंग का गिरना संयोग हो या न हो — भाव तो बनता ही है।

विवाद केवल इतना है कि नगर के किन मंदिरों को यह पीठ माना जाए। तीन स्थान इससे जोड़े जाते हैं, और उन पर मत अलग-अलग हैं। पर यह विवाद नगर का नहीं है — प्रयाग पर कोई संदेह नहीं।

  • पीठनिर्णय और प्रयाग की परंपरा दोनों एक ही बात कहते हैं — उँगलियाँ, ललिता, भव।
  • अलोपी देवी मंदिर में कोई मूर्ति नहीं — पूजा एक काठ की डोली की होती है।
  • "अलोपी" नाम का अर्थ ही है जो लुप्त हो गई।
  • नगर पर कोई विवाद नहीं; मत केवल इस पर बँटे हैं कि कौन सा मंदिर यह पीठ है।

कथा

यहाँ दो कथाएँ चलती हैं — एक इक्यावन की साझा कथा, और एक इस नगर की अपनी, जो किसी और ही ढंग से शुरू होती है।

सती की उँगलियाँ

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह उठाकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि प्रयाग में हस्तांगुलि गिरी — हाथ की उँगलियाँ। देवी ललिता हुईं, भैरव भव। परंपरा इसे दाहिने हाथ की उँगलियाँ बताती है।

जो लुप्त हो गई

अलोपीबाग़ के मंदिर की अपनी एक कथा है, और वह पौराणिक नहीं, लोक की है।

कहा जाता है कि एक वन-मार्ग से बारात जा रही थी और डाकुओं ने उसे घेर लिया। जब उन्होंने दुल्हन की डोली का परदा हटाया, तो भीतर कोई नहीं था — वह लुप्त हो चुकी थी।

स्थानीय लोगों ने उसी दुल्हन को देवी माना और नाम दिया अलोपी — जो लुप्त हो गई। और आज भी उस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है; पूजा उसी काठ की डोली की होती है।

कौन सा मंदिर

प्रयागराज में तीन स्थान इस पीठ से जोड़े जाते हैं — मीरापुर का ललिता देवी मंदिर, अलोपीबाग़ का अलोपी देवी मंदिर, और अक्षयवट।

कुछ विवरण कहते हैं कि तीनों एक ही पीठ के रूप हैं और अलोपी माता ललिता का ही दूसरा नाम हैं। पर यह मत सर्वमान्य नहीं — कई स्रोत स्पष्ट कहते हैं कि प्रयागराज में एक ही शक्ति पीठ है, ललिता देवी मंदिर, और अलोपी वाला दावा विवादास्पद है।

इस पृष्ठ पर तीनों दावे रखे गए हैं। ध्यान रहे कि यह विवाद नगर का नहीं है — प्रयाग पर कोई संदेह नहीं, केवल मंदिर पर मत बँटे हैं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); अलोपी की कथा स्थानीय परंपरा से

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश, भारत

  • ललिता देवी मंदिर, मीरापुर, प्रयागराजदेवी का नाम पीठनिर्णय से अक्षरशः मिलता है — ललिता। कई स्रोत इसे ही प्रयागराज का एकमात्र शक्ति पीठ मानते हैं, जहाँ सती की उँगलियाँ गिरीं। (प्रचलित परंपरा; नाम-साम्य पीठनिर्णय से)
  • अलोपी देवी मंदिर, अलोपीबाग़ (संगम के निकट)यह मंदिर भी इसी पीठ से जोड़ा जाता है और अलोपी माता को ललिता का ही दूसरा नाम कहा जाता है। पर यह दावा विवादास्पद माना जाता है। (en.wikipedia.org/wiki/Alopi_Devi_Mandir (जो इस दावे को स्वयं विवादास्पद बताता है))
  • अक्षयवटकुछ विवरण इसे भी उन तीन स्थानों में गिनते हैं जो प्रयाग के इस पीठ से जुड़े हैं। (प्रचलित परंपरा)

स्रोत: Sircar 1948 (प्रयाग = इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश); मंदिर पर मतभेद — en.wikipedia.org/wiki/Alopi_Devi_Mandir

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • त्रिवेणी संगम — गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम। अलोपी देवी मंदिर इसी के निकट है।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि · माघ मेला · कुंभ

प्रयाग शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न