त्रिपुरा शक्ति पीठ

tripurā

वह पीठ जिसके नाम पर एक पूरा राज्य है — त्रिपुरा।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
दक्षिण-पाद
शक्ति
त्रिपुरा
भैरव
त्रिपुरेश

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन में यह अकेला पीठ है जिसके नाम पर आज एक पूरा राज्य जाना जाता है।

पीठनिर्णय यहाँ दक्षिण-पाद बताता है — दाहिना चरण। देवी त्रिपुरा कहलाईं, जिन्हें त्रिपुरसुंदरी भी कहा जाता है, और भैरव त्रिपुरेश।

तीनों नाम "त्रिपुर" से बने हैं। और वही नाम राज्य का भी है।

यह ध्यान देने योग्य है कि नाम किधर से किधर गया। कई पीठों पर स्थान के नाम से देवी बनीं — जैसे यशोरेश्वरी। कुछ पर देवी के नाम से स्थान — जैसे नलहाटी। पर यहाँ नाम स्थान और देवी से आगे बढ़कर एक पूरे राज्य तक पहुँच गया।

मंदिर उदयपुर में है, जो त्रिपुरा की पुरानी राजधानी रही है। सरकार अपनी अनुक्रमणिका में उदयपुर और रंगामाटी दोनों का उल्लेख करते हैं।

त्रिपुरसुंदरी शाक्त परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण नामों में है — दस महाविद्याओं में उनका स्थान है, और श्रीविद्या की उपासना उन्हीं से जुड़ी है। इस पीठ पर वही नाम आना इसे शाक्त परंपरा के भीतर विशेष बना देता है।

  • इक्यावन में अकेला पीठ जिसके नाम पर आज एक पूरा राज्य है।
  • पीठ, देवी और भैरव — तीनों नाम "त्रिपुर" से बने हैं।
  • त्रिपुरसुंदरी दस महाविद्याओं में हैं और श्रीविद्या उपासना का केंद्र।
  • मंदिर उदयपुर में, जो त्रिपुरा की पुरानी राजधानी रही है।

कथा

यहाँ एक नाम इतना फैला कि देवी और स्थान से आगे बढ़कर पूरे राज्य पर बैठ गया।

सती का दक्षिण पाद

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि त्रिपुरा में दक्षिण-पाद गिरा — दाहिना चरण। देवी त्रिपुरा हुईं, भैरव त्रिपुरेश। कुछ प्रतियों में देवी त्रिपुरसुंदरी और भैरव त्रिपुराक्ष व नल भी लिखे मिलते हैं।

नाम कहाँ तक गया

इस सूची में नाम अलग-अलग दिशाओं में चले हैं। कहीं स्थान के नाम से देवी बनीं — यशोरेश्वरी, नलहाटेश्वरी। कहीं देवी के नाम से स्थान — बहुला, नंदिपुर।

पर यहाँ नाम और आगे बढ़ गया। पीठ का नाम त्रिपुरा, देवी का त्रिपुरा, भैरव का त्रिपुरेश — और आज एक पूरा राज्य इसी नाम से जाना जाता है।

इक्यावन में यह अकेला ऐसा पीठ है।

त्रिपुरसुंदरी

देवी का दूसरा नाम त्रिपुरसुंदरी है, और यह नाम शाक्त परंपरा में बहुत ऊँचा स्थान रखता है।

वे दस महाविद्याओं में गिनी जाती हैं, और श्रीविद्या की पूरी उपासना-पद्धति उन्हीं से जुड़ी है। यानी यह नाम केवल एक स्थानीय देवी का नहीं — वह पूरी शाक्त साधना का एक केंद्र है।

इस पीठ पर वही नाम आना इसे परंपरा के भीतर विशेष बना देता है, भले ही यह अष्टादश की सूची में न हो।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण)

आज यह स्थान कहाँ है

त्रिपुरसुंदरी मंदिर, उदयपुर, त्रिपुरा, भारत

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "the Tripura (Hill Tipperah) State … Udayapura or Rangamati"

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि · दीपावली

त्रिपुरा शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न