श्रीहट्ट शक्ति पीठ

śrīhaṭṭa

वह पीठ जिसका एक पाठभेद "श्रीशैल" है — और जिसने आंध्र के श्रीशैलम् के साथ सदियों की उलझन खड़ी कर दी।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
ग्रीवा
शक्ति
महालक्ष्मी
भैरव
संवरानंद

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

श्रीहट्ट यानी आज का सिलहट। पीठनिर्णय यहाँ ग्रीवा बताता है — गला। देवी महालक्ष्मी कहलाईं, भैरव संवरानंद।

पर इस पीठ की असली कहानी इसके एक पाठभेद में छिपी है। पीठनिर्णय की कुछ प्रतियों में इस स्थान का नाम **श्रीशैल** भी लिखा मिलता है।

और यहीं से उलझन शुरू होती है। "श्रीशैल" नाम से प्रचलित परंपरा आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम् को जानती है — भ्रमराम्बा का प्रसिद्ध तीर्थ। पर पीठनिर्णय में आंध्र वाला स्थान अलग नाम से है, श्रीपर्वत, और वहाँ अंग दक्षिण-कर्ण तथा देवी सुंदरी बताई गई हैं।

जबकि जो अंग और देवी श्रीशैलम् पर प्रचलित हैं — ग्रीवा और महालक्ष्मी — वे इसी record की हैं, यानी सिलहट की।

दो स्थान, जो हज़ार किलोमीटर से अधिक दूर हैं, एक मिलते-जुलते नाम के कारण आपस में उलझ गए। यह इस पूरे संग्रह में नामों की समानता से उपजे भ्रमों का सबसे लंबी दूरी वाला उदाहरण है।

  • पीठनिर्णय की कुछ प्रतियों में इसका नाम "श्रीशैल" भी मिलता है।
  • जो अंग और देवी प्रचलित परंपरा श्रीशैलम् (आंध्र) पर बताती है — ग्रीवा व महालक्ष्मी — वे पीठनिर्णय में इसी पीठ की हैं।
  • दो उलझे हुए स्थानों के बीच की दूरी हज़ार किलोमीटर से अधिक है।
  • भैरव के नाम पर पाठभेद — संवरानंद, समरानंद तथा सर्वानंद भी मिलते हैं।

कथा

कथा वही है जो सबकी — पर यहाँ असली विषय एक नाम है, जो बहुत दूर जाकर किसी और पर बैठ गया।

सती की ग्रीवा

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि श्रीहट्ट में ग्रीवा गिरी — गला। देवी महालक्ष्मी हुईं, भैरव संवरानंद।

श्रीशैल नाम की उलझन

पीठनिर्णय की कुछ प्रतियों में इस स्थान का नाम श्रीशैल भी लिखा मिलता है।

और "श्रीशैल" नाम से प्रचलित परंपरा आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम् को जानती है, जहाँ भ्रमराम्बा का प्रसिद्ध पीठ है। दोनों नामों की समानता ने दो बहुत दूर के स्थानों को आपस में उलझा दिया।

प्रमाण अंग और देवी में है

यह उलझन कैसे पकड़ी जाती है, यह देखने लायक है।

प्रचलित परंपरा श्रीशैलम् पर ग्रीवा और भ्रमराम्बा/महालक्ष्मी बताती है। पर पीठनिर्णय में आंध्र वाला स्थान अलग नाम से आता है — श्रीपर्वत — और वहाँ अंग दक्षिण-कर्ण तथा देवी सुंदरी लिखी हैं।

जो ग्रीवा और महालक्ष्मी हैं, वे इसी record की हैं — श्रीहट्ट यानी सिलहट की।

यानी प्रचलित परंपरा ने सिलहट वाली बातें आंध्र के तीर्थ पर लगा दीं, केवल इसलिए कि एक पाठभेद में नाम मिलता-जुलता था। दोनों के बीच की दूरी हज़ार किलोमीटर से अधिक है।

यह पूरे संग्रह में सबसे लंबी दूरी वाला भ्रम है — और उसे सुलझाने में केवल एक बात काम आई: अंग और देवी के नाम मिलाकर देखना।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पाठभेद व पहचान D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

सिलहट, सिलहट, बांग्लादेश

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "modern Sylhet"

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श्रीहट्ट शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न