FAQ
काश्मीर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पीठनिर्णय के अनुसार यहाँ कण्ठ गिरा था, और देवी महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर कहलाते हैं। प्रचलित मान्यता शारदा पीठ को सती के दाहिने हाथ से जोड़ती है — पर उसी पीठनिर्णय में दाहिना हस्त मानसरोवर पर आता है। दोनों बातें इस पृष्ठ पर दी गई हैं।
यह नीलम घाटी के शारदा गाँव में है, मुज़फ़्फ़राबाद से लगभग 150 किलोमीटर दूर, नीलम नदी के किनारे। यह क्षेत्र आज पाकिस्तान-प्रशासित आज़ाद जम्मू-कश्मीर में है और नियंत्रण रेखा से लगभग दस किलोमीटर दूर पड़ता है।
शारदा लिपि का नाम इसी संस्था से पड़ा। छठी से बारहवीं शताब्दी तक यह स्थान मंदिर और विद्या-केंद्र दोनों था, और इसका प्रभाव इतना था कि पूरा कश्मीर "शारदा देश" कहलाने लगा।
मंदिर आज खंडहर है — इक्कीसवीं सदी तक इसकी छत नहीं बची। 1947–48 के विभाजन के बाद से तीर्थयात्रियों की पहुँच अत्यंत सीमित रही है। मार्च 2023 में नियंत्रण रेखा के इस ओर टीटवाल, करनाह में एक शारदा देवी मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसे इस स्थान तक पहुँच बनाने की दिशा में एक क़दम बताया गया।
निर्माण संभवतः ललितादित्य मुक्तापीड़ के काल (724–760 ई.) में हुआ, पर इसका निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे संभावना के रूप में ही लिया जाना चाहिए।
नहीं। मूल सूची केवल "काश्मीर" कहती है, किसी गाँव या मंदिर का नाम नहीं देती। शारदा तक की पहचान डी. सी. सरकार की अनुक्रमणिका की क्रॉस-रेफ़रेंस शृंखला से बनती है — काश्मीर से कामराज, कामराज से शारदा, और शारदा से "आधुनिक सरदी" — और वह शृंखला आईन-ए-अकबरी के हवाले से चलती है, पीठनिर्णय के पाठ से नहीं। इसीलिए यह पहचान निश्चित नहीं, संभावित मानी गई है।
