काश्मीर शक्ति पीठ

kaśmīra

वह पीठ जो कभी मंदिर भी था और विश्वविद्यालय भी — और जिसके नाम पर एक पूरी लिपि बनी।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
कण्ठ
शक्ति
महामाया
भैरव
त्रिसंध्येश्वर

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन पीठों में शारदा अकेला ऐसा है जिसकी प्रसिद्धि केवल पूजा से नहीं, पढ़ाई से भी थी।

छठी से बारहवीं शताब्दी तक यह स्थान एक साथ दो चीज़ें था — देवी का मंदिर और विद्या का बड़ा केंद्र। इतना बड़ा कि **शारदा लिपि** का नाम ही इस संस्था से पड़ा, और कश्मीर को "शारदा देश" कहा जाने लगा। किसी तीर्थ के नाम पर किसी लिपि का नाम पड़ना असाधारण बात है।

पीठनिर्णय यहाँ कण्ठ बताता है — गला। देवी महामाया कहलाईं, भैरव त्रिसंध्येश्वर।

जिस स्थान से एक लिपि निकली हो, वहाँ का अंग कण्ठ होना — जिससे स्वर निकलता है — एक ऐसा मेल है जिस पर रुकना बनता है। यद्यपि प्रचलित मान्यता यहाँ दाहिना हाथ बताती है, जिससे लिखा जाता है। दोनों में से जो भी लीजिए, बात वाणी और अक्षर तक ही पहुँचती है।

आज यह मंदिर खंडहर है। इक्कीसवीं सदी तक इसकी छत नहीं बची, और भीतर का हिस्सा खुले आसमान के नीचे है।

  • मंदिर और विद्या-केंद्र दोनों — छठी से बारहवीं शताब्दी तक।
  • शारदा लिपि का नाम इसी संस्था से पड़ा; कश्मीर "शारदा देश" कहलाया।
  • कश्मीरी पंडितों के तीन सबसे पवित्र तीर्थों में — मार्तंड सूर्य मंदिर व अमरनाथ के साथ।
  • आज खंडहर — इक्कीसवीं सदी तक छत नहीं बची।

कथा

इस पीठ पर कौन सा अंग गिरा, इस पर दो उत्तर मिलते हैं — और दोनों एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं।

सती का कण्ठ

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि काश्मीर में कण्ठ गिरा। देवी महामाया हुईं, भैरव त्रिसंध्येश्वर।

दूसरा उत्तर

प्रचलित मान्यता कुछ और कहती है — कि शारदा पीठ सती के दाहिने हाथ का स्थान है।

यह पीठनिर्णय से मेल नहीं खाता। उसकी सूची में दाहिना हस्त मानस, यानी मानसरोवर पर आता है, काश्मीर पर नहीं। ऐसा टकराव इस संग्रह में पहले भी मिला है — श्रीपर्वत, करवीर और कांची पर भी नाम या अंग दो परंपराओं में अलग-अलग निकले।

यहाँ दोनों बातें रखी गई हैं। और एक संयोग ध्यान खींचता है: कण्ठ से स्वर निकलता है और हाथ से अक्षर बनते हैं। जिस स्थान से एक पूरी लिपि निकली, उस पर दोनों उत्तर अपनी जगह अर्थ रखते हैं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); प्रचलित मान्यता व पहचान पर D. C. Sircar (1948)

इतिहास

शारदा का इतिहास दो हिस्सों में बँटा है — एक वह जब यह पढ़ने-लिखने का केंद्र था, और एक वह जो उसके बाद आया।

विद्या का केंद्र

छठी से बारहवीं शताब्दी तक यह स्थान मंदिर और शिक्षा-संस्था दोनों के रूप में चलता रहा। इसका प्रभाव इतना था कि शारदा लिपि का नाम इसी संस्था से पड़ा और पूरा कश्मीर शारदा देश कहलाने लगा।

निर्माण संभवतः ललितादित्य मुक्तापीड़ (शासन 724–760 ई.) के समय हुआ, यद्यपि इसका निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है — इसलिए इसे संभावना के रूप में ही लिखा गया है।

आज की स्थिति

मंदिर आज खंडहर है। इक्कीसवीं सदी तक इसकी छत नहीं बची और भीतर का भाग खुले मौसम में है।

यह स्थान नीलम घाटी के शारदा गाँव में है, मुज़फ़्फ़राबाद से लगभग 150 किलोमीटर दूर, नीलम नदी के किनारे, समुद्र तल से लगभग 1,981 मीटर की ऊँचाई पर। 1947–48 के विभाजन के बाद से यह पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्र में है और नियंत्रण रेखा से लगभग दस किलोमीटर दूर पड़ता है। तब से तीर्थयात्रियों की पहुँच अत्यंत सीमित रही है।

मार्च 2023 में नियंत्रण रेखा के इस ओर, करनाह के टीटवाल में एक शारदा देवी मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसे इस स्थान तक पहुँच बनाने की दिशा में एक क़दम बताया गया।

  • 724–760 ई.संभवतः ललितादित्य मुक्तापीड़ के काल में निर्माण (निर्णायक प्रमाण नहीं)
  • 6वीं–12वीं शताब्दीमंदिर व विद्या-केंद्र के रूप में सक्रिय; शारदा लिपि का नाम यहीं से
  • 1947–48 के बादविभाजन के बाद तीर्थयात्रियों की पहुँच अत्यंत सीमित
  • मार्च 2023नियंत्रण रेखा के इस ओर टीटवाल, करनाह में शारदा देवी मंदिर का उद्घाटन

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

शारदा पीठ, शारदा गाँव, नीलम घाटी, आज़ाद जम्मू-कश्मीर (पाकिस्तान-प्रशासित), पाकिस्तान

  • शारदा पीठ, शारदा गाँव, नीलम घाटीसरकार की क्रॉस-रेफ़रेंस शृंखला — काश्मीर से कामराज, कामराज से शारदा, और शारदा से "आधुनिक सरदी" — इसी स्थान पर पहुँचती है। सरदी आज का शारदा गाँव है। कश्मीरी पंडितों की परंपरा में यह तीन सबसे पवित्र तीर्थों में गिना जाता है। (Sircar 1948, Index of Pithas (Kasmira / Kamraj / Sarada); आईन-ए-अकबरी)
  • पीठनिर्णय का पाठ केवल "काश्मीर" कहता हैमूल सूची किसी विशिष्ट मंदिर या गाँव का नाम नहीं देती — केवल क्षेत्र का नाम। ऊपर की पहचान आईन-ए-अकबरी के हवाले से बनी है, पीठनिर्णय के पाठ से नहीं। (D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas (1948))

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "Kasmira … 'Ain (see Kamraj)"; "Kamraj — 'Ain (Sarada); in Kashmir. The reference is to modern Sardi"; "Sarada — modern Sardi in Kashmir"

यात्रा सुझाव

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काश्मीर शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न