जयंती शक्ति पीठ

jayantī

वह पीठ जिसका नाम एक राज्य पर था — और जो राज्य 1947 में दो देशों में बँट गया।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
वाम-जंघा
शक्ति
जयंती
भैरव
क्रमदीश्वर

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

जयंती की कहानी जालंधर जैसी ही है, और उतनी ही सीख देती है।

पीठनिर्णय यहाँ वाम-जंघा बताता है — बाईं जाँघ। देवी जयंती कहलाईं, भैरव क्रमदीश्वर।

विद्वान डी. सी. सरकार इसे सिलहट ज़िले में रखते हैं। पर प्रचलित सूचियाँ इसे मेघालय के जयंतिया हिल्स में नारतियांग का जयंती दुर्गा मंदिर बताती हैं।

दोनों में से किसी को झूठा कहना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि इसका कारण भूगोल में है। जयंतिया राज्य कभी सिलहट के मैदानों और जयंतिया की पहाड़ियों — दोनों पर फैला हुआ था। एक ही नाम, एक ही राज्य, दो भूभाग।

फिर 1947 आया और वह क्षेत्र दो देशों में बँट गया। मैदान एक ओर रह गए, पहाड़ियाँ दूसरी ओर। और उसी के साथ यह पीठ भी दो दावों में बँट गया।

यह तीर्थ-सूचियों की एक साधारण सच्चाई दिखाता है — वे उस भूगोल पर टिकी हैं जो बदलता रहता है। नाम वहीं रह जाते हैं, सीमाएँ खिसक जाती हैं।

  • सरकार इसे सिलहट में रखते हैं; प्रचलित सूचियाँ नारतियांग, मेघालय बताती हैं।
  • दोनों स्थान कभी एक ही जयंतिया राज्य के भाग थे — मैदान और पहाड़ियाँ।
  • 1947 के विभाजन ने उस क्षेत्र को दो देशों में बाँट दिया।
  • जालंधर की तरह यह भी एक क्षेत्र-नाम है जो बाद में दो जगह बैठ गया।

कथा

यहाँ की कठिनाई कथा की नहीं, नक़्शे की है — और वह नक़्शा बीसवीं सदी में बदल गया।

सती की वाम जंघा

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि जयंती में वाम-जंघा गिरी — बाईं जाँघ। देवी जयंती हुईं, भैरव क्रमदीश्वर।

एक नाम, दो भूभाग

स्थान को लेकर दो दावे हैं। डी. सी. सरकार अपनी अनुक्रमणिका में इसे सिलहट ज़िले में रखते हैं। प्रचलित सूचियाँ इसे मेघालय के जयंतिया हिल्स में नारतियांग बताती हैं।

पर यह विरोध उतना गहरा नहीं जितना दिखता है। जयंतिया राज्य कभी सिलहट के मैदानों और जयंतिया की पहाड़ियों — दोनों पर फैला था। एक ही नाम दोनों भूभागों को समेटे हुए था।

जब सीमा खिंची

1947 में वह क्षेत्र दो देशों में बँट गया। मैदान एक ओर रह गए, पहाड़ियाँ दूसरी ओर।

और उसी के साथ यह पीठ भी दो दावों में बँट गया — एक इस ओर, एक उस ओर।

यह तीर्थ-सूचियों की एक साधारण सच्चाई दिखाता है। वे उस भूगोल पर टिकी हैं जो स्थिर नहीं रहता। नाम वहीं रह जाते हैं, सीमाएँ खिसक जाती हैं — और सदियों बाद पढ़ने वाला यह तय नहीं कर पाता कि किस ओर देखे।

इसी कारण यहाँ कोई एक स्थान नहीं चुना गया। दोनों दावे स्रोत सहित रखे गए हैं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान पर D. C. Sircar (1948) व प्रचलित परंपरा

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

  • सिलहट ज़िला, बांग्लादेशडी. सी. सरकार की अनुक्रमणिका स्पष्ट रूप से यही स्थान बताती है। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • नारतियांग, जयंतिया हिल्स, मेघालयप्रचलित सूचियाँ इसे नारतियांग के जयंती दुर्गा मंदिर से जोड़ती हैं, जो मेघालय के जयंतिया हिल्स ज़िले में है। (प्रचलित परंपरा)
  • दोनों एक ही पुराने क्षेत्र के दो छोरजयंतिया राज्य कभी सिलहट के मैदान और जयंतिया की पहाड़ियों दोनों पर फैला था। 1947 में वह क्षेत्र दो देशों में बँट गया — इसलिए दोनों दावे उतने दूर नहीं जितने दिखते हैं। (ऐतिहासिक भूगोल)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "in the Sylhet District, Assam (now East Pakistan)"

आसपास के दर्शनीय स्थल

  • जालंधर शक्ति पीठ — वैसा ही मामला — जालंधर भी मूलतः एक क्षेत्र का नाम था, नगर का नहीं — और वहाँ भी पीठ की पहचान दो जगह बँट गई। दोनों पृष्ठ एक ही तरह की उलझन दिखाते हैं।

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि · दुर्गा पूजा

जयंती शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न