मणिवेद शक्ति पीठ

maṇiveda

वह पीठ जिसका नाम, विद्वानों के अनुसार, किसी स्थान से नहीं — नक़ल की एक गलती से बना।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
मणिबंध
शक्ति
गायत्री
भैरव
सर्वानंद

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

इक्यावन की सूची में यह सबसे असामान्य नाम है, और उसका कारण भक्ति नहीं, पाठ-विज्ञान है।

पीठनिर्णय यहाँ मणिबंध बताता है — कलाई। देवी गायत्री कहलाईं, भैरव सर्वानंद।

पर विद्वान डी. सी. सरकार अपने एक पाद-टिप्पणी में जो लिखते हैं, वह चौंकाता है: **"मणिबंध" एक भ्रमित पाठ से बना नाम है।** यानी यह किसी स्थान का नाम नहीं — यह नक़ल करते समय हुई एक गलती से निकला।

और उसी टिप्पणी में वे यह भी बताते हैं कि मगध और कर्णाट नाम बाद के संशोधकों ने जोड़े, क्योंकि उन्हें अपने सामने के पाठ से इक्यावन नाम बन ही नहीं रहे थे।

यह बात इस पूरी परंपरा को छोटा नहीं करती। यह केवल दिखाती है कि ये सूचियाँ आकाश से नहीं उतरीं — इन्हें मनुष्यों ने लिखा, सुना और नक़ल किया, और नक़ल करते हुए कहीं-कहीं चूक भी हुई।

फिर भी यह record सूची में रखा गया है, क्योंकि पीठनिर्णय का पाठ इसे देता है और यही इस संग्रह की रीढ़ है। जो पाठ में है वह दिखाया गया है — साथ में यह भी कि विद्वान उसके बारे में क्या कहते हैं।

प्रचलित सूचियाँ इसे पुष्कर के पास मणिबंध से जोड़ती हैं, और वहाँ देवी गायत्री तथा भैरव सर्वानंद के नाम मेल भी खाते हैं।

  • सरकार लिखते हैं कि "मणिबंध" नाम **एक भ्रमित पाठ से बना** है — किसी स्थान से नहीं।
  • उसी टिप्पणी में — मगध व कर्णाट नाम बाद के संशोधकों ने जोड़े, क्योंकि उन्हें 51 नाम नहीं बन रहे थे।
  • सरकार पहचान के लिए "संभवतः मणिपुर" कहते हैं, पर निश्चित नहीं।
  • प्रचलित सूचियाँ पुष्कर के पास मणिबंध बताती हैं, जहाँ देवी-भैरव के नाम मेल खाते हैं।

कथा

इस पीठ की सबसे बड़ी बात कथा में नहीं, पाठ में है — और वह बात असहज है।

सती का मणिबंध

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि यहाँ मणिबंध गिरा — कलाई। देवी गायत्री हुईं, भैरव सर्वानंद।

एक नाम जो गलती से बना

अब वह बात जो कहनी ज़रूरी है, भले असहज लगे।

विद्वान डी. सी. सरकार अपनी एक पाद-टिप्पणी में लिखते हैं कि **"मणिबंध" एक भ्रमित पाठ से बना नाम है** — यानी यह किसी स्थान का नाम नहीं, नक़ल करते समय हुई एक गलती से निकला।

और उसी टिप्पणी में वे यह भी बताते हैं कि मगध और कर्णाट नाम बाद के संशोधकों ने जोड़े, क्योंकि उन्हें अपने सामने के पाठ से इक्यावन नाम बन ही नहीं रहे थे। संख्या पूरी करने के लिए नाम जोड़े गए।

फिर यह पृष्ठ क्यों है

यह प्रश्न स्वाभाविक है। यदि नाम ही गलती से बना, तो इसका पृष्ठ क्यों बनाया गया?

क्योंकि इस संग्रह की रीढ़ पीठनिर्णय का पाठ है, और उस पाठ में यह नाम है। जो पाठ में है वह दिखाया गया है — और साथ में यह भी कि विद्वान उसके बारे में क्या कहते हैं।

दूसरी बात यह कि इससे परंपरा छोटी नहीं होती। यह केवल दिखाता है कि ये सूचियाँ आकाश से नहीं उतरीं। इन्हें मनुष्यों ने लिखा, सुना, दोहराया और नक़ल किया। और जहाँ मनुष्य हैं वहाँ चूक भी है।

प्रचलित सूचियाँ इसे पुष्कर के पास मणिबंध से जोड़ती हैं, और वहाँ देवी गायत्री तथा भैरव सर्वानंद के नाम मेल खाते हैं। सरकार स्वयं "संभवतः मणिपुर" कहते हैं। तीनों बातें यहाँ रखी गई हैं।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पाठ-दोष की टिप्पणी D. C. Sircar (1948) से

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

  • मणिपुर (संभावित)सरकार लिखते हैं कि यह "संभवतः" मणिपुर ही हो सकता है — पर वे निश्चित नहीं। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • नाम स्वयं एक पाठ-दोष से बना हैसरकार अपने footnote में स्पष्ट लिखते हैं कि "मणिबंध" एक भ्रमित पाठ से बना नाम है। यानी यह प्रश्न ही खुला है कि यह किसी वास्तविक स्थान का नाम है भी या नहीं। (D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas (1948), footnote)
  • मणिबंध, पुष्कर (राजस्थान)प्रचलित सूचियाँ इसे पुष्कर के पास मणिबंध से जोड़ती हैं, और वहाँ देवी गायत्री तथा भैरव सर्वानंद के नाम मेल भी खाते हैं। (प्रचलित परंपरा)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "possibly the same as Manipura"; तथा footnote: "Manibandha, a name created out of a confused text"

आसपास के दर्शनीय स्थल

यात्रा सुझाव

प्रमुख पर्व: नवरात्रि

मणिवेद शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न