विराट शक्ति पीठ

virāṭa

सूची का अंतिम नाम — और वह भी एक देश का, किसी मंदिर का नहीं।

अंग · शक्ति · भैरव

अंग
पादांगुलि
शक्ति
अंबिका
भैरव
अमृत

स्रोत: Sircar 1948, pp. 35–37 (पीठनिर्णय)

महत्व

पीठनिर्णय की सूची विराट पर समाप्त होती है। यह इक्यावनवाँ और अंतिम नाम है।

यहाँ पादांगुलि गिरी — पैर की उँगलियाँ। देवी अंबिका कहलाईं, भैरव अमृत, जिन्हें अमृताक्ष भी कहा जाता है।

सूची का आरंभ और अंत दोनों ध्यान देने योग्य हैं। पहला नाम हिंगुला है — बलूचिस्तान में, जहाँ ब्रह्मरन्ध्र गिरा, सिर के ऊपर का बिंदु। और अंतिम नाम विराट है, जहाँ पैर की उँगलियाँ गिरीं।

सिर से पैर तक। सूची अपने क्रम में ही एक देह पूरी कर देती है।

पर पहचान यहाँ भी अनिश्चित है। विद्वान डी. सी. सरकार दो बातें कहते हैं। प्राचीन विराट देश जयपुर-अलवर-भरतपुर के क्षेत्र में था — वही विराट नगर जहाँ महाभारत में पांडवों ने अज्ञातवास बिताया। पर परवर्ती मध्यकालीन लेखकों ने इसी नाम का एक और देश उत्तरी बंगाल में रखा।

दोनों दावे "देश" के स्तर पर हैं, किसी मंदिर के नहीं। यह वही कठिनाई है जो नेपाल, गंडकी और लंका पर मिली — नाम इतना बड़ा कि उससे कोई एक बिंदु नहीं बनता।

  • पीठनिर्णय की सूची का अंतिम, इक्यावनवाँ नाम।
  • सूची सिर से शुरू होकर पैर पर समाप्त होती है — हिंगुला में ब्रह्मरन्ध्र, विराट में पादांगुलि।
  • दो दावे, दोनों "देश" के स्तर पर — राजस्थान का विराट क्षेत्र या उत्तरी बंगाल।
  • यह उन आठ नामों में अंतिम है जो कुछ पांडुलिपियों में नहीं मिलते।

कथा

सूची यहाँ समाप्त होती है — और उसका अंत उसके आरंभ से जुड़ा हुआ लगता है।

सती की पादांगुलि

दक्ष के यज्ञ में शिव का अपमान सहकर सती ने देह त्यागी। शिव उनकी देह लेकर निकल पड़े और तीनों लोक काँपने लगे। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से वह देह खंडित की, और जहाँ जो अंग गिरा वहाँ पीठ बना।

पीठनिर्णय कहता है कि विराट में पादांगुलि गिरी — पैर की उँगलियाँ। देवी अंबिका हुईं, भैरव अमृत।

सिर से पैर तक

सूची का क्रम अपने आप में एक चित्र बनाता है।

पहला नाम हिंगुला है, जहाँ ब्रह्मरन्ध्र गिरा — सिर के ऊपर का वह बिंदु जिसे चेतना का द्वार माना जाता है। और अंतिम नाम विराट है, जहाँ पैर की उँगलियाँ गिरीं।

सिर से पैर तक। इक्यावन नामों का यह क्रम अपने भीतर एक पूरी देह समेट लेता है — जो, आख़िर, इस पूरी कथा का विषय भी है।

यह जानबूझकर रचा गया या अपने आप बना, कहना कठिन है। पर पढ़ने में यह ठहर जाता है।

विराट कहाँ था

पहचान यहाँ भी अनिश्चित है, और यह उचित ही लगता है कि सूची का अंतिम नाम भी एक खुले प्रश्न पर समाप्त हो।

विद्वान डी. सी. सरकार दो बातें कहते हैं। प्राचीन विराट देश जयपुर-अलवर-भरतपुर के क्षेत्र में था — वही विराट नगर जहाँ महाभारत में पांडवों ने अपना अज्ञातवास का वर्ष बिताया था। पर परवर्ती मध्यकालीन लेखकों ने इसी नाम का एक और देश उत्तरी बंगाल में रखा।

दोनों दावे "देश" के स्तर पर हैं, किसी मंदिर के नहीं। यह वही कठिनाई है जो नेपाल, गंडकी और लंका पर भी मिली — नाम इतना बड़ा है कि उससे कोई एक बिंदु नहीं बनता।

और एक बात और: विराट उन आठ नामों में अंतिम है जो पीठनिर्णय की कुछ प्रतियों में मिलते ही नहीं। जिस सूची की गिनती पर आरंभ से प्रश्न है, उसका अंतिम नाम भी उसी प्रश्न का हिस्सा है।

स्रोत: पीठनिर्णय (महापीठनिरूपण); पहचान पर D. C. Sircar (1948)

आज यह स्थान कहाँ है

इस पीठ का आधुनिक स्थान विद्वानों में एकमत नहीं है। नीचे दिया गया दावा स्रोत सहित है, पर अंतिम नहीं — अन्य परंपराएँ दूसरा स्थान बताती हैं।

भारत

  • प्राचीन विराट देश — जयपुर-अलवर-भरतपुर क्षेत्र, राजस्थानसरकार लिखते हैं कि प्राचीन विराट देश इसी क्षेत्र में था। महाभारत में पांडवों का अज्ञातवास इसी विराट नगर में बीता था। (Sircar 1948, Index of Pithas)
  • उत्तरी बंगालवे यह भी जोड़ते हैं कि परवर्ती मध्यकालीन लेखकों ने इसी नाम का एक और देश उत्तरी बंगाल में रखा। (Sircar 1948, Index of Pithas)

स्रोत: Sircar 1948, Index of Pithas — "The ancient Virata country lay in the Jaipur-Alwar-Bharatpur region of Rajputana; but another country of that name was placed by late-medieval writers in northern Bengal"

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विराट शक्ति पीठ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न